चिट्ठाजगत www.hamarivani.com

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

बाती का दर्द !

दीप जलाओ 
रोशनी फैलेगी 
तो
बाती रो पड़ी।
पूछा बाती से
रोई तू क्यों ऐसे?
स्त्रीलिंग हूँ न ,
क्या पता कौन सा
विपरीत लिंग मुझे बुझा दे ?
पर तेरे बिना तो
दीप कुछ भी नहीं,
उससे क्या
जब सारी बातियाँ बुझ जायेंगी
धरा घिर जाएगी अँधेरे में
फिर लकड़ियों
अरे ये भी स्त्रीलिंग
फिर आग
मैं फिर भूली
ये आग भी तो वही है.
फिर क्या होगा?
कुछ भी नहीं
ये पुल्लिंग की 
आखिरी खेप होगी।
फिर धरा पर
कोई सृष्टि न होगी,
क्योंकि गर्भ ही न होगा
तो कौन गर्भवती और कैसा प्रजनन ?
इसलिए
अब तैयार रहो
अपने ही किये की
सजा पाने को.
हर वो स्त्रीलिंग
जो ख़त्म कर रहे हो.
यही शाप दे रही है
तुम भविष्य में संतति के लिए तरसो.

हाईकू !

कभी कुछ मन नहीं करता है और कलम उतावली होती है पेज रंगने को क्योंकि उसमें तो भाव भरे होते हें फिर ऐसे ही रच जाती है कुछ हाईकू । पहली बार लिखा है सो क्षमा याचना के साथ।


ईमान बेचा
खरीदार तो होगा
पाक साफ है.
* * *
अपने छूटे
सारे भ्रम ही टूटे
अकेले अब .
***
दर्द छलका
आँखें बोल रही थी
खामोश जुबां.
***
दुर्जन कौन
सफेद कपड़ों में
काले मन का.
***
धरा उदास
आसमान से झाँका
सुनसान था।
***
दीप जलाया
रोशनी फैलेगी तो
बाती रो पड़ी।
***

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

दीवार कब कैसी?

दीवार
शब्द वही
बस स्वरूप में
उसके अर्थ बदल जाते हें।
दीवार जब
बन जाती है
किसी छत का सहारा ,
तो
कितनी जिन्दगी उसके नीचे पलती हैं।
वो घर का एक अंश बन जाती है।
लेकिन जब ये दीवार
किसी आँगन के बीच खड़ी होती है,
बाँट देती है --
किसी घर के लोगों को
और दो घर बना देती है।
अगर यही दीवार
खिंच जाती है
अनदेखी से स्वरूप में
वह दिलों में
अपनी जगह बना लेती है ,
तो फिर
क्या सहोदर,
क्या सहोदरा,
माँ -बाप और बेटे
तक के
रिश्ते में आकर
एक अनदेखा बंटवारा कर जाती है
कि फिर ये कभी गिरती ही नहीं है।
दो इंसान
एक घर में सही
इस दीवार के रहते
हंसते भी है,
एक दूसरे के सामने होते भी है
लेकिन
वो खून के रिश्ते को
चला नहीं रहे होते
बस ढो रहे होते हें।
ईंट गारे की दीवार तो
फिर भी गिर सकती है
पर ये दीवार
कभी गिरती नहीं है।
वक्त इसको और मजबूत कर जाता है।
ये दीवार की कहानी है।
तेरी और मेरी जुबानी है।

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

हाँ मैं गुनाहगार हूँ ! purvai (8 aug 26)

मुझ पर इल्जाम है
कि मैंने अपना ईमान बेचा है,
मैं स्वीकारता हूँ
ये सच है,
लेकिन कभी किसी ने
मेरे चारों ओर खड़े
उन खरीदारों की ओर देखा है,
जो मोटे मोटे थैले लिए खड़े हैं।
क्या वे गुनाहगार नहीं?
जब खरीदार नहीं होगा,
तो कौन बिकेगा और कौन बेचेगा?
कब तक बच कर रहता?
क्या माँ बाप को
दम तोड़ते देखता रहता?
दवा के पर्चों पर
अपनी बेबसी की मुहर लगा कर
कूड़े में फ़ेंक देता
या फिर
उन्हें मरते हुए देखता
या फिर किसी वृद्धाश्रम में
डाल कर हाथ धो लेता।
बच्चों के पेट भरने को
पत्नी के तन ढकने को
कहाँ से लाता पैसे?
मिलता तो कम
देने वाले ही छीन लेते हैं।
कहाँ तक खुद को न बेचता?
ईमान बेच कर
माँ बाप को तो बचा लिया,
बच्चों को तो पढ़ा लिया,
जब सारी दुनियाँ बेईमान है,
कर रही है कुकृत्य 

बटोर रही है तालियाँ और वाहवाही, 

जिनके चरित्र पर पुती है स्याही।  
मैंने किसी की हत्या तो नहीं की?
मैंने किसी का घर तो नहीं उजाड़ा?
किसी दिये की रोशनी तो नहीं छीनी?
फिर मैं गुनाहगार क्यों?
मेरे पास इमारतें नहीं,
मेरे पास गाड़ियाँ नहीं,
पत्नी के पास जेवरों का ढेर भी नहीं,
बच्चों ने किराये की साइकिल लेकर
स्कूल जाना सीखा है। 
फिर भी
गुनाहगार हूँ मैं
अदालत का तलबगार हूँ
मैं,
क्योंकि गरीब का ईमान
चर्चा का विषय होता है।
जो सरेआम बेच रहे हैं,
इस देश को
उनकी ओर अँगुली उठाकर तो देखो
अँगुली ही नहीं
पूरा हाथ ही नहीं रहेगा।
जबान खोलकर तो देखो,
खामोश कर दिए जाओगे,
क्योंकि
उनका ईमान मँहगा है
उनकी इज्जत पर भारी है।
कीमत तो बस कम
इस दुनियाँ में हमारी है
और
इसी जगह
मैं और मेरी आत्मा हारी है। 

-- रेखा  

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

मैं शिव नहीं !


जन्म लिया
फिर होश संभाला
कुछ आदर्श औ' मूल्य
मेरे लिए अमूल्य थे
शायद प्रकृति ने भरे थे
जिया उनको
पिया हलाहल
इस जगत के विषपायी
शायद देख न पाए,
दंश पर दंश दिए
औ'
मैं जीवन भर
लक्ष्य के सलीब
काँधे पे धरे
चलता ही रहा।
पत्थरों की चोट भी
चुपचाप सहता रहा
व्यंग्य और कटाक्षों से
छलनी हुआ बार बार
विष बुझे वचनों के तीर
आत्मा में चुभते रहे
पर
अब तक शिव नहीं बन पाया।
अब
वो हलाहल कंठ से
नीचे उतरने लगा
तब लगा कि
मैं शिव नहीं हूँ
न अब बनाकर जीना है
जिनका दिया विष है
उन्हें ही
अब वापस करना है ,
मैं शिव नहीं हूँ
और हो भी नहीं सकता हूँ।

मंगलवार, 6 मार्च 2012

होली ! होली ! होली!




बुरा न मानो होली है !

रंग की पिटारी बंद रखी है,
हाथ में लिए गुलाल और रोली है।

बुरा न मानो होली है।

मंहगी शक्कर , मंहगी खोया ,
करें क्या गुझिया बनी कुछ पोली है।

बुरा न मानो होली है !

बजे ढोल और बजे मृदंग,
नाच रही थापों पर हुरिआरों की टोली है।

बुरा न मानो होली है !

होली में लगे ससुर भी देवरा ,
डाल रंग घूंघट में बहुरिया बोली है।

बुरा न मानो होली है !

बैठी भौजी राह देखती
देवरा ने कहाँ ठंडाई घोली है।

बुरा न मानो होली है !




शुक्रवार, 2 मार्च 2012

मेरी यायावरी !

यायावरी ने

मुझको इंसान बना दिया।

दुनियाँ के देखे maine

रंग इतने सारे

ki kadam कदम पर

हर इंसान का नया चेहरा दिखा दिया,

यायावरी ने

मुझको संजीदा बना दिया।

रिश्तों के बीच में

परिभाषा क्या होती है?

janma से mile rishte

अर्थ के जाते

kaise badal जाते hain

नए अर्थों को सिखा दिया,

यायावरी ने

मुझको duniyandar बना दिया।

maataaon के chehre kee

geelee see jhurriyan,

दर्द को पीते पिता की

माथे की लकीरों को

परवरिश की कमियों में छुपाते हुए देखा

यायावरी ने

मुझको हकीकत छिपाना सिखा दिया।

बचपन को सड़कों पर

कुछ खोजते हुए देखा

बीमार जननी-जनक की

बीमारी कि खातिर

बोझा उठते बचपन को

बुढ़ाते हुए देखा,

यायावरी ने

मुझको बूढा बचपन दिखा दिया।

बेटियों वाले घर में

बेटा नहीं तो क्या?

बेटियों ने खुद को

बेटा बनाकर दिखा दिया

बेटे के फर्ज को

उन्होंने मुखाग्नि देने तक निभा दिया,

यायावरी ने

मुझको जीवन का नया रंग दिखा दिया।