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सोमवार, 16 अप्रैल 2012

बाती का दर्द !

दीप जलाओ 
रोशनी फैलेगी 
तो
बाती रो पड़ी।
पूछा बाती से
रोई तू क्यों ऐसे?
स्त्रीलिंग हूँ न ,
क्या पता कौन सा
विपरीत लिंग मुझे बुझा दे ?
पर तेरे बिना तो
दीप कुछ भी नहीं,
उससे क्या
जब सारी बातियाँ बुझ जायेंगी
धरा घिर जाएगी अँधेरे में
फिर लकड़ियों
अरे ये भी स्त्रीलिंग
फिर आग
मैं फिर भूली
ये आग भी तो वही है.
फिर क्या होगा?
कुछ भी नहीं
ये पुल्लिंग की 
आखिरी खेप होगी।
फिर धरा पर
कोई सृष्टि न होगी,
क्योंकि गर्भ ही न होगा
तो कौन गर्भवती और कैसा प्रजनन ?
इसलिए
अब तैयार रहो
अपने ही किये की
सजा पाने को.
हर वो स्त्रीलिंग
जो ख़त्म कर रहे हो.
यही शाप दे रही है
तुम भविष्य में संतति के लिए तरसो.

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

दीवार कब कैसी?

दीवार
शब्द वही
बस स्वरूप में
उसके अर्थ बदल जाते हें।
दीवार जब
बन जाती है
किसी छत का सहारा ,
तो
कितनी जिन्दगी उसके नीचे पलती हैं।
वो घर का एक अंश बन जाती है।
लेकिन जब ये दीवार
किसी आँगन के बीच खड़ी होती है,
बाँट देती है --
किसी घर के लोगों को
और दो घर बना देती है।
अगर यही दीवार
खिंच जाती है
अनदेखी से स्वरूप में
वह दिलों में
अपनी जगह बना लेती है ,
तो फिर
क्या सहोदर,
क्या सहोदरा,
माँ -बाप और बेटे
तक के
रिश्ते में आकर
एक अनदेखा बंटवारा कर जाती है
कि फिर ये कभी गिरती ही नहीं है।
दो इंसान
एक घर में सही
इस दीवार के रहते
हंसते भी है,
एक दूसरे के सामने होते भी है
लेकिन
वो खून के रिश्ते को
चला नहीं रहे होते
बस ढो रहे होते हें।
ईंट गारे की दीवार तो
फिर भी गिर सकती है
पर ये दीवार
कभी गिरती नहीं है।
वक्त इसको और मजबूत कर जाता है।
ये दीवार की कहानी है।
तेरी और मेरी जुबानी है।

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

ये भावी नेता !

क्यों बदल देते हें लोग
अपनी आस्था को
कपड़ों की तरह,
जहाँ आंच आती दिखी
अपने दमकते भविष्य पर
धीरे से निकल लिए
और शामिल हो लिए दूसरे जुलूस में
वे भविष्य निर्माता बनेगें ,
इस वतन पर शासन करेंगे
उनकी आस्था का क्या विश्वास है?
क्या नहीं कल ये
इस देश और जन के विश्वास को बेचेंगे?
दंभ है उनमें,
धन से तिजोरी जो भरी हें
बस थोड़े समय के लिए
हाथ जोड़ लें,
पैर चुन लें,
विनम्र हो कर झुक लें,
कल जब अपना होगा
ये नजर नहीं आयेंगे
और हम अपने निर्णय पर
सर धुनते नजर आयेंगे
क्योंकि देश हम इनके पास
अगले पांच वर्ष के लिए
गिरवी जो रख चुके हें

रविवार, 29 जनवरी 2012

दीवार !

दीवार
तो एक ही होती है,
चाहे वह
ईंट और गारे की हो
या फिर
अनदेखी दिल के बीच
ईंट गारे की दीवार फिर भी
लांघ कर जा सकते हें,
जब चाहे तोड़ कर फिर
एक हो सकते हें
लेकिन जहाँ द्वार से द्वार
मिल रहे हों,
फासले सिर्फ और सिर्फ
दिलों के बीच दीवार बन गए हों,
वहाँ
उसको फिर तोड़ नहीं सकते,
दो दिल फिर मिल नहीं सकते
इसी लिए
बोलो खूब बोलो
लेकिन
तौल कर बोलो
कि दिल के बीच दीवारें तो बनें
वे चाहे घर में हों,
देश में हों,
जाति में हों,
वर्ग में हों ,
या फिर आदमी और आदमी के बीच में हों
प्रिय बोलो,
मधुर बोलो,
इसमें कुछ नहीं लगता,
बस कुछ मिलता ही है,
प्यार से बोलो,
प्यार मिलेगा
दो बोलों से पूरा संसार मिलेगा

सोमवार, 16 जनवरी 2012

आशा से .....!Aruna



ये दिया

जलाये मकान हूँ,

स्नेह भरा था जीवन का,

ये जीवन दीप भी

अब तक कब तक

जल सकता है ?

अब

आओ सहयोगो तुम,

ये दीप नई पीढ़ी का है।

ये मानवता की माटी से बना,

दया, करुणा की बात है,

विश्व प्रेम का तेल भरा है,

बस इसमें तेल ही भरना है।

ये यूं ही जलता रहेगा,

बस इसके आगे तुम हाथ रखो

अधर्मी अपमान, जेहाद या संत की

तूफ़ान और तूफ़ान से बचाव होगा।

विश्वास यही है

इस दीपक को

जनरेशन दर जनरेशन जलाने वाले

आते रहे हैं और आते रहेंगे।

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

जिन्दगी बनी तस्वीर !

सिर्फ एक सांस का फासला होता है
जुड़ी रही तो जीवन
नहीं तो टूटते ही
जिन्दगी तस्वीर में सिमट जाती है
टूटते ही सांसों के क्रम के
सब पञ्च तत्वों में बिखर जाता है,
हम लिए उस पार्थिव को
कभी थे/थी के साथ
अपनों से जुड़े रहते हें
चढ़ जाती है माला
' दिया जल जाता है,
जिन्दगी का यूँ सफर ख़त्म
हमें तो सिर्फ गम ही दे जाता है
ये सिर्फ सांसों के रिश्ते हें
सांसों का नाता है,
फिर किस से कहें
कौन कब आता है और कब जाता है?

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

मेरी कलम !

अरसे बाद

आज कलम उठाई

स्याही की कुछ बूँदें

पहले टपक पड़ी।

उसके अंतर में झाँका

प्रश्न वाचक नज़रों से

क्या हुआ कहा?

बिफर ही तो पड़ी -

'कितना कुछ घट गया

अच्छा ही था
बहुत अच्छा हुआ

क्यों मैं न लिख सकी?

तवज्जो ही नहीं दी

इतनी दूर रखा अपने से

ख़ुशी मेरी छलकी

देखी नहीं

तिरस्कार , उपेक्षा से

वे आंसूं इस तरह निकले हें।'

मैं चुप थी

अन्याय तो हुआ है

लेकिन

कर्तव्यों, दायित्यों के बोझ से

पुत्री के विछोह ने

इतना आहट कर दिया

कि भाव उमड़े, शब्द बने

फिर

मेरी ही आँखों से

गिरकर सूख गए

किसी कागज़ पर उतार ही नहीं सके।

दूसरे के दर्द को

आसानी से लिखा जाता है,

अपने दर्द में हाथ, मन औ' मष्तिष्क

सब सुप्त से हो जाते हें।

क्षमा करना, क्षमा करना।

सोमवार, 19 सितंबर 2011

कहीं ये तो नहीं?

जीवन के आकाश में
घिरी ये घटायें
छंटती हें
बरसती हें,
इनका गहन अन्धकार
दिन को भी
रात बना देता है
निराशा का जनक बनकर
हताशा का मार्गदर्शक
बनकर खड़ा रहता है
मन का उजाला
कहाँ तक रहें रोशन करे,
हौसले के दियालों को?
कभी कभी तो
वो उजाला भी स्याही में लिपट जाता है
लोग कहते हें
सुबह जरूर आएगी
लेकिन कब?
कहीं इस सुबह का इन्तजार
मौत की घड़ी
तो बन जाएगा?

बुधवार, 7 सितंबर 2011

रिश्तों की माप !

अभी तक
ये समझ नहीं आया
कैसे लोग
रिश्तों को लिबास की तरह
बदल लेते है ?


कुछ रिश्ते
जो खून में घुले होते हैं
माँ से जुड़े होते है
रगों में वे
खून को पानी में
बदल लेते हैं?


कहते हैं जिन्हें
वे दिल के रिश्ते हैं
समझ आते हैं
लेकिन फिर ऊब कर
उनसे भी
किसी और को
अजीज बना लेते हैं
और
उसी रिश्ते में
कैसे बदल लेते हैं?

ये रिश्ते हो चुके हैं
अब शतरंज के मोहरों की तरह
दूसरों की जगह पर
रखते हैं नजर
औ'
अपने खाने जरूरत पर
बदल लेते हैं?

एक की जगह लेने को
हर मोड पर
दो दो खड़े हैं
जरूरत पड़ी तो
चेहरे की रंगत को भी
बदल लेते हैं?

बुधवार, 17 अगस्त 2011

दोहरा सत्य !

वो दर्द का एक सैलाब दिल में लिए,
यूं ही सबकी ख़ुशी में मुस्कराती रही,
आँखों में बसी उदासी औ' नमी को ,
झुका कर नजरें दुनियाँ से छुपाती रही।

रोका उसे औ' झांक कर आँखों में उसकी,
एक दिन मैंने पूछ ही लिया उससे कि ,
क्यों तुम बाहर से खुश दिखने के लिये,
इस तरह अपनाकलेजा जलाती हो तुम?

छूते ही मर्म बह निकला दर्द शिद्दत से,
उमड़ते हुए गुबार उसमें सब बहने लगे,
हंसती हूँ तो लोग शामिल भी कर लेते हैं
रोई हूँ जब तक कतरा कर निकल गए।

ab to समझ ली है रीत दुनियाँ की,
गर उनकी ख़ुशी में हंसों तो ठीक है,
वो तुम्हारे ग़मों को बाँट कर कभी
तुम्हारे साथ रोने कोई नहीं आता।

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

मेरी कलम से !

मेरी कलम

मेरी सबसे बड़ी हमराज है।

कितनी प्यारी सी सहेली है,

बताऊं कैसे ?

इससे खास

शायद कोई नहीं,

ये जानती है

मेरे ग़मों और

मेरे सदमों को,

किन शब्दों में

उजागर करना है।

आंसुओं की स्याही

कहाँ गहरी औ'

कहाँ हल्की रखनी है।

टपकते हुए आंसुओं को

जज्ब  कर

कब कितनी शिद्दत से

उगलना है जहर

एक ऐसा जहर

जो खुद को ही

मार दे ,

दूसरे से मिले दर्द को

सह सके

औ' मन  से उन्हें

बुरा न कहे

मेरे जख्मों को

खुद ही

कागज पर उतार कर
मरहम बना देती है
और फिर
हल्का दिल लिए ,
मैं उसको हाथ में लिए
तकिये पर सर रखे
शांति से सो जाती हूँ.
मेरे सारे गम
उसने कागजों पर
उतार जो दिए थे
.

बुधवार, 10 अगस्त 2011

कलयुग के आदर्श !

मैं
आदर्शों और सिद्धांतों की
ढाल लिए
जीने का सपना लेकर
खुद को बहुत
सुरक्षित समझ
जीवन समर में उतरी।
नहीं जानती थी तब
कि
यहाँ षडयन्त्रो,
झूठ, फरेब , चालाकी के
अस्त्र शास्त्रों से
ये ढाल बचा नहीं पायेगी
जिनके बीच रहना है।
वे बहुत शातिर हैं,
खड़े खड़े तुम्हें
सच होने पर भी
गीता की कसम लेकर
झूठा साबित कर देंगे।
और फिर
इल्जामों की सलाखों में
कैद होकर
अपने निर्दोष होने की
गवाह अपनी आत्मा से कहोगी
तुम्हें पता है न,
मैंने कुछ कभी गलत
किया ही नहीं
फिर ऐसा क्यों?
आत्मा सर झुका कर
कहेगी
ये कलयुग है
त्रेता में सीता भी
ऐसे ही
फिर तुम तो कलयुग में
तुम सी
बहुत झूठ साबित की गयी
मैं हूँ न
तुम्हारी आत्मा
तुम्हारे निर्दोष और निष्पाप
होने की गवाह
और क्या चाहिए?
याद रखो
कलयुग में
सच हमेशा रोता है
औ'
झूठ फरेब सुख से सोता है।

गुरुवार, 4 अगस्त 2011

आह्वान !

सृष्टि का आधार हो तुम
इस जगत की पालनहार हो तुम
तुम्हें नमन करूँ
फिर भी ये तो कहना ही है ----
तुम शांत धीर गंभीर
सरिता सी शीतल
आँचल में छिपाए
दर्द दुनियाँ का
रोज मरती हो सौ सौ बार
इस तरह शांत रहो
कुछ तो कहो
हो तुम सागर सी विशाल
तट फैला कर मीलों तक
संहारिणी भी बनना सीखो
काँप जाए हाथ उनके
थर्रा उठे आत्मा उनकी
विवश बेचारी मत बनो
कुछ तो कहो
सब कुछ कलुषित
तेरी लहरों में बिखरा कर
वे पवित्र हो गए
आँचल छू कर तेरा
कलुषित तुझे कर गए
फ़ेंक दो बाहर उन्हें
करो बगावत ऐसे लोगों से
अब शांत मत बहो
कुछ तो कहो
मूक नाद तेरा
मूक गिरा तेरी
मौन स्वीकृति मान कर
कर जाते हैं तिरस्कार तेरा
पापनाशिनी बनकर
मत समेटो त्याज्य उनका
तुम पवित्र हो गंगा सी
बोलो कुछ तो बोलो
अब इतना मत सहो
कुछ तो कहो

सोमवार, 25 जुलाई 2011

फासले !


फासले नहीं बनते
मीलों और कोसों से
तार मन के
जहाँ जुड़ते हैं
सारे फासले ख़त्म हो जाते हैं।
ये तार ही तो है -
रोते हुए के आँसू,
पोंछते हैं बार बार ,
सिर पर हाथ फिरा कर
दिलासा दे जाते हैं।
दूर क्यों जाएँ?
देखिये न
जहाँ मिलती हैं
दीवार से दीवारें
औ द्वार द्वार जुड़े हैं
फासले मीलों तक पसरे हैं,
मुँह घुमा कर गुजर जाते हैं,
सिसकियों पर मुस्कराते हैं,
ये फासले
होते हैं कितने लम्बे
इंसान के दिलों को तक तोड़ जाते हैं।

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

जीत का जश्न !

एक गरीब और विकलांग बच्चे की जीत का जश्न कुछ इस तरह मनाया हमने की आँखें तो भरी हीकुछ कलम भी कह उठी



राहों में बिछे
काँटों की चुभन
'
पैरों से रिसते लहू
से निकली
घावों की पीड़ा,
हौसलों की राह में
रोड़े बन जाती है?
नहीं
हौसले जमीन पर
कब चलने देते हैं,
यही तो
मन के पर बनकर
आकाश में उड़ान
भरते हुए
कहीं और ले जाते हैं
जहाँ पहुँच कर
छलक पड़ती हैं आँखें
अभावों के पत्थर
विरोध के स्वर
कटाक्षों के तीरों से
आहट अंतर्मन
मंजिल पर पहुँच कर
आखिर रो ही देता है
लेकिन ये आँसू
औरों को
रुला जाते हैं
फिर ढेरों
आशीष और
सर पर रखे हाथ
जीत का जश्न मनाते हैं

गुरुवार, 23 जून 2011

माटी और खम्भे !


घर कभी
माटी के हुआ करते
थे,
माटी के ऊपर माटी की परतें
सब मिलकर एक हो जाती थीं।

उनमें बसने वाले लोग,
उनमें बसता था प्यार,
वे एक ही रहते थे
क्योंकि माटी का एक ही रूप होता है।
अगर तोडा तो पूरी दीवार ढह जाती थी ,

क्योंकि
उसमें और कुछ होता ही नहीं था।
तब मंजिलें नहीं होती थी,
तभी तो सब
एक ही जमीन पर
एक ही सतह पर
एक साथ जिया करते थे।
फिर मंजिले बनने लगी

जब तक दीवारों पर छत रही
शुक्र था
क्योंकि वे दीवारें तो एक थीं।
ब खम्भों पर
खड़ी बहुमंजिली इमारतें
उनका कोई अस्तित्व नहीं

कोई छत किसी की नहीं
सिर्फ फर्श अपना है।
ऊँचाइयों पर चढ़ने वाले
किसी के भी नहीं रहे
सिर्फ 'मैं' और 'मेरा'
बचा रह गया है।
मकान खरीद लेते हैं,
कल बेच देते हैं
लेकिन घर कभी नहीं बन पाता,
सिर्फ सोने की जगह है। ( चित्र गूगल के साभार )
जहाँ बच्चे , माँ -बाप
पति-पत्नी एक दूसरे के सानिंध्य को
तरसते रहते हैं।
अगर यही हमारी प्रगति है
तो हम इंसान से
मशीन बन चुके हैं.
और मशीनों में
संवेदनाएं नहीं हुआ करती।
सोचा वापस झाँक लूं
उन माटी के घरों में
जहाँ पुरखे रहा करते थे।
पर यह क्या?
पुरखों के साथ ही
माटी का चलन ख़त्म हुआ
क्योंकि अब
यहाँ भी
खम्भों के बीच जुड़ी दीवारों का
चलन आ गया है।

सोमवार, 6 जून 2011

लोकतंत्र की हत्या!

हम कहते हैं
देश में लोकतंत्र की
हत्या हो चुकी है,
क्यों हो?
सत्ता का मद
बहुत गहरा होता है
उसके लिए कुछ भी करेंगे,
जहाँ चुनावी सरगर्मी में
लोक के भूखे पेट की आग पर
राजनीति का तवा चढ़ा कर
वोटों की रोटियां सेकी जाती हैं
पेट तो सिर्फ भूख जानता है,
वे रोटियां कैसे सिकीं
इससे नहीं मतलब
मतलब तो इससे है कि
वे रोटियां मिली
और पेट की अग्नि बुझी,
फिर जिसने जो कहा
कर दिया
फिर क्या लोकतंत्र और क्या राजतन्त्र
उन्हें रोटियां चाहिए
रोटियां देने वाले शैतान भी
उन्हें देवता नजर आते हैं,
कल नहीं आज की
उदराग्नि बुझाने वाले
भगवान समझे जाते हैं,
भले भी वे कुत्ते समझ कर
टुकड़े डाल दें
और उनके कल पर काबिज हो जाएँ
देखा नहीं
भूख से बिलबिलाते जन को
पैसे दिखाई देते हैं
चाहे जुलूस में ले जाएँ
या फिर
जिंदाबाद ही तो कहना है
फिर पेट भर खाने की
तृप्ति उन्हें बिकाऊ बना देती है
अब लोक कहाँ और तंत्र कहाँ?

गुरुवार, 2 जून 2011

आभार करो !

विनम्र हो इतना
कि जिसमें शेष रहे
आत्मसम्मान तुम्हारा
दीनता का भाव धरो,
झुको इतना कि
गरिमा तुम्हारी बनी रहे,
गर वे करें कोशिश
बिछाने की
टूटने की दशा में
मान लो वे इस काबिल नहीं
भाषा उन्हें
समझ आती है अपशब्दों की
अपशब्द सीखो नहीं
बस उस रास्ते को छोड़ दो
मानव की कई श्रेणियां होती हैं
तुम जहाँ हो
वहीं से चल पड़ो
वे रास्ते कहीं जाते नहीं
पतन के आगे
कोई रास्ता होता नहीं,
गर्त में गिरो तो
कोई थाह होती नहीं
मन क्रम वचन से
धीर धर कर
तुम आचरण करो
आगे देखो पीछे
अपने रास्ते तुम खुद चुनो
मंजिल तुम्हें मिल जाएगी,
इस पथ का राही कभी
भटक कर विचलित होता नहीं
कुछ मिले मिले
हर लेकर द्वार पर
संतोष खड़ा मिलेगा
मूँद कर आँखें स्वीकार करो
ईश को नमन कर आभार करो

शुक्रवार, 27 मई 2011

एक टुकड़े साए की तलाश


कड़ी धूप और तपिश में

ऊपर देखते हुए
इसी तरह चलते रहना है
एक टुकड़े साए की तलाश में

सूखते हलक '
पपड़ाये होंठों को
तर करने की चाहत सिमटी है,
इस खुले हुए नीले आकाश में

भटक रही हैं निगाहें
दूर दूर तक
मिलेगा कोई दरिया
प्यास बुझाने के लिए
बढ़ रहे हैं कदम इसी विश्वास में

रेगिस्तान की तपती रेत
सुखा देती है
आशा की बूंदों को
जिन्दगी ही तब्दील हो रही है
सांस चलती हुई इस जिन्दा लाश में

रविवार, 22 मई 2011

भटकन !

मनुष्य
जीवन सत्य से
आँखें मूँद कर
जब चलने लगता है

किस गुमान में
बुरी तरह से
विकृत भावों से
जब घिरने लगता है

मूल्य खो जाते हैं,
आस्थाएं दम तोड़ देती हैं,
विश्वास भी टुकड़े टुकड़े
होकर गिरने लगता है

मानवता रोती है,
गिड़गिड़ाते हैं सुजन
दर्प और दंभ के साए में
खुद ही जलने लगता है

शेष कुछ नहीं,
विवेक भी मूक
खुली आँखों से
अंधत्व की ओर जाते
रास्तों को देखने लगता है