दोहे !
1. बदरी छाई जगत में, विपदा की चहुँ ओर ।
जीवन में बिखरे धूप के टुकड़े और बादल कि छाँव के तले खुली और बंद आँखों से बहुत कुछ देखा , अंतर के पटल पर कुछ अंकित हो गया और फिर वही शब्दों में ढल कर कागज़ के पन्नों पर. हर शब्द भोगे हुए यथार्थ कीकहानी का अंश है फिर वह अपना , उनका और सबका ही यथार्थ एक कविता में रच बस गया.
दोहे !
1. बदरी छाई जगत में, विपदा की चहुँ ओर ।
उम्र खर्च हो गयी
बिना सोचे-समझे,
बहुत पैसे कमाने के लिए।
धनी आज बहुत हैं,
रखने की जगह नहीं,
बस चुप हो गया।
वक़्त ही नहीं मिला संभालें,
जैसे भी थे, कुछ तो करीब थे।
कम अमीर थे,
लेकिन दिल से अनमोल थे,
तब शायद हम खुशनसीब थे।
©रेखा
स्वयंभू
बनने की होड़ में
सर्वनाश पर तुले हैं
सब कुछ मिटा कर,
हम किसको दिखाएंगे अपने वर्चस्व?
कौन करेगा हमारी जय जयकार?
एक आम इंसान क्या चाहता है ?
पूछा है किसी से
नहीं तो
फिर लड़ क्यों रहे हैं ?
मर वो रहे हैं , जिनको कुछ लेना देना नहीं है।
फिर दुहरा रहे इतिहास हैं
हम क्या सीख कुछ न पाए ?
इंसान बनने की बजाय हम
हत्यारे बन चुके हैं ?
क्या फिर महाभारत अपने को दुहरायेगा?
कौन किस पर राज करेगा?
कौन कौन बच कर फिर चैन से जियेगा?
इतने विनाश और हत्याओं के बाद
नींद किसको आएगी ?
सर्वशक्तिमन होने का परचम लेकर कौन खड़ा होगा अकेला ?
और कौन स्वीकारेगा?
आज विश्व बारूद के ढेर पर नहीं,
अपने ही उन्नति के शिखर पर खड़े होकर
खुद सागर में डूब मरेगा।
क्या इंसान एक रोबोट ही रह क्या है ?
न संवेदनाए और न ही कोई आत्मा और दिल बचा है ,
फिर किस पर शासन करने को आतुर है।
क्या लाशों के ढेर पर
लगाएगा अपना सिंहासन और कोर्निश करेंगे
चंद चापलूसों की प्रजाति।
सर्वनाश की नीति में कौन खुश रहेगा ?
कभी तो अशोक की तरह
इनकी भी आत्मा रो देगी
और फिर
सब त्याग कर फिरेंगे बंजर हुई धरती पर
अश्वस्थामा की तरह।
#हारा हुआ वजूद!
वह चल दिया ,
जब दुनिया से,
कुछ तो रोये,
लहू के आँसू दिल से बहे
खारे आँख से।
एक हारा हुआ इंसान था वो
सब कुछ दे गया,
जो अपने साथ गया
वो उसके काम थे।
दिया था सब कुछ
जो लिया था जिंदगी से,
कर्ज़ तो उतार कर वह चल दिया।
लज्जित हुआ था,
अपनी निगाह में
जश्न जीत की मनाया था गैर ने।
देते रहे दिलासा
जो कुछ अपने न थे,
जिनके लिए जिया
वह जन्म से अपने थे,
ले लिया मुनाफा वज़ूद से
मैय्यत किसी की काम नहीं आती।
दो मुट्ठी मिट्टी भी हम क्यों डालें?
अब तो वह किसी काम न आयेगा।
रोज उठाती हूँ कलम,
कुछ नया रचूँ,
शुरू होती है जंग,
शब्दों और भावों में,
नहीं नहीं बस यही रुकूँ,
समझौता तो हो जाए।
शब्दों का गठबंधन
भावों का अनुबंधन,
एक नहीं हो पाता।
जो रचता ,
रच न पाता।
कैसा है संशय मन में?
आखिर कैसा हो?
जो लिखूँ?
कभी झाँकती सूनी आंखों में,
कभी पढ़ूँ उन कोरे सपनों को,
रंग भरूँ क्या नए रूप से
साकार करूँ उन सपनों को
कोई ऐसा गीत रचूँ क्या?
आशा का दीप बनाकर
रोशन उनकी आशा कर दूँ,
या
फिर प्रेरणा भरकर
उसमें उसके अंर्त में
एक ज्योति जलाऊँ,
इससे पहले स्याही सूखे,
कुछ तो सार्थक रच जाऊँ।
रेखा श्रीवास्तव