चिट्ठाजगत www.hamarivani.com

शनिवार, 11 जुलाई 2026

गंगा का शाप!

 गंगा का शाप! 

मैं पावन हूँ, 

मैं पावन हूँ, 

गिरी धरा पर जब से मैं,

तब से सुना यही मैंने,  

मैं गंगा, गोदावरी, यमुना,

कावेरी, नर्मदा और ब्रह्मपुत्र 

 सब नाम  हमारे पावन हैं।

निर्मल धाराएं मेरी 

हो चुकी आज पंकिल हैं। 

मेरे घाटों की पावनता,

धोते धोते पापों की गठरी,

मुझको पापिन सी लगती है। 

बाँध मेरी धाराओं को 

जहाँ तहाँ है मोड़ दिया,

कब तक सहती मैं यह मनमानी, 

मेरे संयम को तोड़ दिया। 

समेट लूँ अपनी धाराएँ ,

 या बाँध लूँ सारी सीमायें,

फिर रेत किनारे कर लेना 

मेरा तर्पण औ' मेरे जाने पर रो लेना। 

क्षमा करो मैं जाती हूँ।  

अपनी प्रगति के शिखर पर जाकर 

तुम आकाश छुओ या चाँद रचो। 

गंगा न अब शेष रही 

मत क्रोधित कर रे मानव 

फिर तोड़ मर्यादा शिव की भी ,

मैं सर्वनाश ही कर दूँगी ,

जब हाहाकार मचा होगा 

धरा करेगी तांडव तब 

डूबोगे उतराओगे तुम  

कहीं ठिकाना न होगा। 

बस शेष यही शाप होगा। 

बस शेष यही शाप होगा।  

 

बुधवार, 10 जून 2026

भावों का दरिया !

बंद आँखें 

दिखती बंद भले ही हों,

मन की आँखें कब बंद हुई हैं ?

भावों का दरिया, 

अंर्त में निर्बाध बहा है, 

नहीं लिखा मसि से कागज़ पर, 

अंकित होकर मन के पट पर,

हर कोना रंग चुका कभी का, 

रोज भरती रही जगह पर,

फिर भी 

शेष अभी हैं कुछ आँसू, 

कुछ सदमे जो मन में छिपे हैं। 

बाँट सके न जो दुःख अपना,

पीते रहे वो गरल समझ कर,

नीलकंठ बन जीवन भर,

सागर भर संताप पिया है।

समझो, एक अभिशाप  जिया है। 


- रेखा श्रीवास्तव 

चाह आसमान की !

 

पाकर फल अपने श्रम का, 

होकर पुलकित अंतर्मन से,

नज़रें जमाये हैं निज लक्ष्य पर , 

छूना चाह रहे आसमान।


देख रहे कंटकाकीर्ण धरा को , 

पर्वत खड़े है रोक कर राह , 

धरा से ही छलांग लगा कर,

छूना चाह रहे आसमान।


सपने हैं सागर से अनन्त  ,

हौसलों से माप लेंगे  एक पग में ,

पाँव रख कर हवाओं में,

छूना चाह रहे आसमान। 


धारे आशीष अपने बड़ों का ,

पूरा करने उनके सपनों को,  

पूरी ऊर्जा से चल पड़े हैं ,

छूना चाह  रहे आसमान।  


-- रेखा श्रीवास्तव

कानपुर



चाहत !

 ये उम्र भी न 

बदल देती है सब कुछ 

कब

एक कोंपल को 

पेड़ की शाखाओं का बना के हिस्सा

जीवन का बोझ बढ़ा देती है। 

अपने ऊपर 

बढ़ते हुए 

बोझ को तो ढो लेता है 

मजबूत शाखों के लिए 

लेकिन 

सब कुछ खो देता है। 

और फिर 

खुद जर्जर होकर 

आश्रित हो जाता है उन पर।

वो दबंगई और आँख के इशारे पर 

चलता था सब कुछ 

आज शांत हो गया। 

कभी सिर उठाती है वही आदत 

तो जल्द ही  

सिर ही झुका देती है। 

उम्र लम्बी हो

तब माँ देती थी आशीष 

अब 

जब तक जिओ अपने दम पर 

नहीं तो दूसरों की मर्जी पर 

जीने से अच्छा है कि 

वो नया जन्म ले और फिर कोंपल बने। 

-- ©रेखा श्रीवास्तव 

सोमवार, 8 जून 2026

बोनसाई का असर!

 बोनसाई संस्कृति 

हर जगह जरूरत बन गई है

भूल गए हैं कि,

बोनसाई सिर्फ सर्वस्व नहीं,

हमारे विकल्प होते हैं।

वृक्ष जब तक जड़ों से जुड़े है,

तो चारों ओर फैलते हैं,

और भी अधिक गहराई में

अपना विस्तार करते है, 

बाँध कर रखना चाहते हैं

सदियों तक

अपनी अस्तित्व को धरा से,

वंश फलता फूलता रहे।

अब नये रूप को स्थापित कर,

अपनी ही शाखायें और जड़ें 

काट दी जाती है ।

आज बेतरतीबी किसी को पसंद नहीं,

प्रकृति सबको 

एक साथ रूप तो नहीं देती।

तभी तराश देते हैं या

खुद कट जाते हैं।

ठीक एक पके फल की तरह 

कीमत जो बढ़ जाती है।

अब तक पिता के लिए था -

दो बेटे और एक बेटी एक परिवार।

अपने पिता को कर दरकिनार,

बेटों के घर बसते ही,

तीसरे चरण के बढ़ते ही,

विभिन्न प्रकार के बनाए गए तरीकों से,

बस एक को उखाड़कर

नीचे से तराश दिया।

बाप, चाचा, बुआ, मामा और मौसी तक 

अब आवाजें दी नहीं जातीं,

तराश दिया 

क्योंकि फैलने के लिए तो विस्तार नहीं 

परिसीमन ही होगा न,

अब आगे की शुरुआत है,

इतनों को ढोते ढोते वह दब गये,

अब पीपल या वटवृक्ष नहीं,

छोटे और तराशे गये 

बेनबाई बहुत ही खूबसूरत दिखते है,

परिवार भी अब दो या तीन से सजते हैं।

हां बोनसाई परिवार 

ऊपर और नीचे से तराश कर

इच्छानुसार बांध कर

नया स्वरूप बन रहा है,

बोनसाई पर अभी शोध चल रहा है।


शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

एक नदिया सी !

 

एक नदिया सी !


हाँ मैं जिंदगी हूँ,

किसी की भी होऊं,

एक अनचाही इबारत 

जिसे लिखा किसी और ने है, 

और कहलाई वो मेरी है।

लिखना मैंने भी चाहा 

लेकिन 

खुद को निर्वस्त्र करने जैसा लगा,

कुछ अपराधबोध भी हुआ,

प्रबुद्ध, विचारशील फिर भी 

क्यों जीती रही ? 

औरों के लिए उनके इशारे पर 

हाँ एक कठपुतली सी है ये जिंदगी ,

कोई नचाता रहा और नाचती मैं रही ,

किसने कहा कि ये मेरी है? 

थोपी हुई है मुझ पर ,

इसमें तो साँसे भी अपनी नहीं होती,

जिसकी मर्जी पर चल रहीं है, 

वही तो रचयिता है। 

मैं तो एक नदिया सी बह रही हूँ, 

जाकर सागर में मिल जाना है।  

टाइम कैप्सूल

                                 

                                 टाइम कैप्सूल


                                अक्सर उठाती हूँ कलम 

                                  लिख देती हूँ कोई इबारत पन्नों पर 

                                   कुछ पलों में, 

                                  गर रख दी कलम कभी 

                                  बदल जाती है मन में इबारतें 

                                  औ' 

                                  फिर काट दिया पन्ने पर  लिखा हुआ। 

                                  बंद डायरी रखी रही कई कई दिन,

                                   फिर उठाया और देखा 

                                    अरे ये मैंने ही लिखा था ,

                                     फिर छोड़ क्यों दिया अधूरा ? 

                                     शायद वक़्त के साथ 

                                      सोच, पहुँच और तजुर्बा 

                                      हर रोज कुछ नया सिखा जाता है। 

                                       बेमानी सा होने लगता है ,

                                      वह सब जो देख आये हैं ,

                                       बदल रही हैं परिभाषाएं भी -

                            रिश्तों, जिन्दगी और प्रेम की तहजीब में,

                                         कुछ नया स्वीकारने की 

                                         शायद उम्र नहीं रही 

                                         क्योंकि 

                               पुराने ख़्याल अब पत्थर बन चुके हैं। 

                              कागज़ नहीं कि लिखा और फाड़ दूँ, 

                                         गुजारे हुए उस वक़्त को 

                                   एक काल-पत्र (टाइम कैप्सूल) में 

                                इतिहास बना कर धरती में गाड़ दूँ।