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मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

दोहे!

दोहे !

1. बदरी छाई जगत में, विपदा की चहुँ ओर । 

   रैना कटे न दिन कटे, कब होगी नव भोर ।।

2. माणिक माला कर गहे, नजर भरी मन मैल।
कलयुग का यह धर्म है, खड़े कुटिल बन शैल ।
 
3. सागर हृदय विशाल है, रखता है यह ज्ञान।
 नदियाँ कितनी जा मिले, रखता सबका मान।।

4. सारा जगत है जल रहा, भड़की झूठी शान। 
    मनुज न समझे मनुज को, चाहे संपत्ति खान। 
 
5. विदा करें इस बरस को , भूलें कटु अघात ।
नया साल गुलजार हो ,  देकर कल को मात ।।
 
6. धरती ढकी है धुंध से, साँस थमी सी जाय।
तड़पे जीवन घुटन से , साथी नजर न आय ।।

7. मन काजर की कोठरी, तन जो उजरा होय। 
विश्लेषण सब ही करें, मन को  पढ़े न कोय।।

8. झूम झूम बरसे बदरा, तड़ित न माने हार।
नदिया उफनी वेग से, पड़ी गरीब पर मार।।

9. सीता जो देती रही , जगत को बारम्बार।
प्रमाण शुचिता के लिए, मगर गयी वो हार।।

10. छली गयी सीता सदा, जीता छल हर बार।
राम भटकते आज भी,  कलयुग ले अवतार ।।

11. प्रीति कीजिए राम से, पार ये नौका  होय।
भव सागर के पंक से, इस विधि मनवा धोय ।।

12. राम नाम दीपक बने, मिटा अँधेरा जान ।
जगमग हो जीवन सदा, रोशन मन को मान ।।

 13. सागर हृदय विशाल है, रखता है यह ज्ञान।
 नदियाँ कितनी जा मिलें, रखता सबका मान।।

 14. साँस साँस में हरि बसे, जीवन उनके नाम।
 धड़कन हरदम ये कहे, प्रभु लो मुझको थाम ।।

15. राम तुम्हारे राज में , बिछड़ गई सन्तान।
मात-पिता निर्बल भये, छोड़ दिये हैं प्रान।।
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शनिवार, 31 जनवरी 2026

 खामोशी भी

कुछ कहती हैं, 

कभी आंखों से,

कभी चेहरे के भावों से

औ' कभी उतर कर कागजों पर।

हां उसको पढ़ना 

सबके वश की बात नहीं।

करें भी अगर कोई सवाल उनसे,

जवाब भी वहीं से आयेगा

कभी आंखों में समायी नीरसता,

कभी चेहरे की नीरवता।

मौन टूटता ही नहीं 

कभी मुखरित नहीं होता

गहराता ही जाता है।

इसको पढ़ना 

आसान नहीं होता।

-- रेखा

बुधवार, 13 नवंबर 2024

समय की बात!

 उम्र खर्च हो गयी

बिना सोचे-समझे,

बहुत पैसे कमाने के लिए।

धनी आज बहुत हैं,

रखने की जगह नहीं,

बस चुप हो गया।

वक़्त ही नहीं मिला संभालें,

जैसे भी थे, कुछ तो करीब थे।

कम अमीर थे,

लेकिन दिल से अनमोल थे,

तब शायद हम खुशनसीब थे।

©रेखा

शनिवार, 2 नवंबर 2024

स्वयंभू !

 स्वयंभू 

बनने की होड़ में 

सर्वनाश पर तुले हैं 

सब कुछ मिटा कर,

हम किसको दिखाएंगे अपने वर्चस्व?

कौन करेगा हमारी जय जयकार?

एक आम इंसान क्या चाहता है ?

पूछा है किसी से 

नहीं तो 

फिर लड़ क्यों रहे हैं ?

मर वो रहे हैं , जिनको कुछ लेना देना नहीं है। 

फिर दुहरा रहे इतिहास हैं 

हम क्या सीख कुछ न पाए ?

इंसान बनने की बजाय हम 

हत्यारे बन चुके हैं ?

क्या फिर महाभारत अपने को दुहरायेगा?

कौन किस पर राज करेगा?

कौन कौन बच कर फिर चैन से जियेगा?

इतने विनाश और हत्याओं के बाद 

नींद किसको आएगी ? 

र्वशक्तिमन होने का परचम लेकर कौन खड़ा होगा अकेला ?

और कौन स्वीकारेगा?

आज विश्व बारूद के ढेर पर नहीं,

अपने ही उन्नति के शिखर पर खड़े होकर 

खुद सागर में डूब मरेगा। 

क्या इंसान एक रोबोट ही रह क्या है ?

न संवेदनाए और न ही कोई आत्मा और दिल बचा है ,

फिर किस पर शासन करने को आतुर है। 

 क्या लाशों के ढेर पर 

लगाएगा अपना सिंहासन और कोर्निश करेंगे 

चंद चापलूसों की प्रजाति। 

सर्वनाश की नीति में कौन खुश रहेगा ?

कभी तो अशोक की तरह 

इनकी भी आत्मा  रो देगी 

और फिर 

सब त्याग कर फिरेंगे बंजर हुई धरती पर 

अश्वस्थामा की तरह।  

मंगलवार, 15 अक्टूबर 2024

हारा हुआ वजूद!

 #हारा हुआ वजूद!


वह चल दिया ,

जब दुनिया से,

कुछ तो रोये,

लहू के आँसू दिल से बहे

खारे आँख से।

एक हारा हुआ इंसान था वो

सब कुछ दे गया,

जो अपने साथ गया 

वो उसके काम थे।

दिया था सब कुछ

जो लिया था जिंदगी से,

कर्ज़ तो उतार कर वह चल दिया।

लज्जित हुआ था,

अपनी निगाह में 

जश्न जीत की मनाया था गैर ने।

देते रहे दिलासा 

जो कुछ अपने न थे,

जिनके लिए जिया

वह जन्म से अपने थे,

ले लिया मुनाफा वज़ूद से

मैय्यत किसी की काम नहीं आती।

दो मुट्ठी मिट्टी भी हम क्यों डालें?

अब तो वह किसी काम न आयेगा।


मंगलवार, 3 सितंबर 2024

यादों का प्रवाह!

यादें 
बस एक प्रवाह होती हैं,
बहते हुए समंदर में 
जीवन के गुजर गए 
वक्त की गवाह होती हैं। 

एक आती है 
तो 
उसी से जुड़ी सैकड़ों 
यादें एक सैलाब की तरह 
कभी दिमाग में उमड़ कर 
सिमट नहीं सकती हैं ,
वे इन आँखों से जिया 
एक जीता हुआ ख़्वाब होती हैं। 

अच्छी होती हैं 
या फिर बुरी , 
कटु होती लेकिन 
गुजरे हुए पलों का बहाव होती हैं। 

ठहरती कब हैं? चाहे जैसी भी हों 
जीवन का एक लगाव होती हैं। 
छूटे हुए वापस 
अदृश्य ही सही 
वापस लाने का एक घुमाव होती हैं। 
वक्त वक्त पर उभर कर जेहन में 
मथ कर मन को फिर 
भूल जाने का एक दुर्भाव होती हैं। 
यादें 
सिर्फ एक प्रवाह होती हैं। 

संशय मन का!

रोज उठाती हूँ कलम, 

कुछ नया रचूँ, 

शुरू होती है जंग,

शब्दों और भावों में,

नहीं नहीं बस यही रुकूँ, 

समझौता तो हो जाए।

शब्दों का गठबंधन 

भावों का अनुबंधन,

एक नहीं हो पाता।

जो रचता ,

रच न पाता। 

कैसा है संशय मन में? 

आखिर कैसा हो? 

जो लिखूँ?

कभी झाँकती सूनी आंखों में, 

कभी पढ़ूँ उन कोरे सपनों को, 

रंग भरूँ क्या नए रूप से 

साकार करूँ उन सपनों को 

कोई ऐसा गीत रचूँ क्या? 

आशा का दीप बनाकर 

रोशन उनकी आशा कर दूँ, 

या 

फिर प्रेरणा भरकर 

उसमें उसके अंर्त में 

एक ज्योति जलाऊँ,

इससे पहले स्याही सूखे, 

कुछ तो सार्थक रच जाऊँ।


रेखा श्रीवास्तव