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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

एक नदिया सी !

 

एक नदिया सी !


हाँ मैं जिंदगी हूँ,

किसी की भी होऊं,

एक अनचाही इबारत 

जिसे लिखा किसी और ने है, 

और कहलाई वो मेरी है।

लिखना मैंने भी चाहा 

लेकिन 

खुद को निर्वस्त्र करने जैसा लगा,

कुछ अपराधबोध भी हुआ,

प्रबुद्ध, विचारशील फिर भी 

क्यों जीती रही ? 

औरों के लिए उनके इशारे पर 

हाँ एक कठपुतली सी है ये जिंदगी ,

कोई नचाता रहा और नाचती मैं रही ,

किसने कहा कि ये मेरी है? 

थोपी हुई है मुझ पर ,

इसमें तो साँसे भी अपनी नहीं होती,

जिसकी मर्जी पर चल रहीं है, 

वही तो रचयिता है। 

मैं तो एक नदिया सी बह रही हूँ, 

जाकर सागर में मिल जाना है।  

टाइम कैप्सूल

                                 

                                 टाइम कैप्सूल


                                अक्सर उठाती हूँ कलम 

                                  लिख देती हूँ कोई इबारत पन्नों पर 

                                   कुछ पलों में, 

                                  गर रख दी कलम कभी 

                                  बदल जाती है मन में इबारतें 

                                  औ' 

                                  फिर काट दिया पन्ने पर  लिखा हुआ। 

                                  बंद डायरी रखी रही कई कई दिन,

                                   फिर उठाया और देखा 

                                    अरे ये मैंने ही लिखा था ,

                                     फिर छोड़ क्यों दिया अधूरा ? 

                                     शायद वक़्त के साथ 

                                      सोच, पहुँच और तजुर्बा 

                                      हर रोज कुछ नया सिखा जाता है। 

                                       बेमानी सा होने लगता है ,

                                      वह सब जो देख आये हैं ,

                                       बदल रही हैं परिभाषाएं भी -

                                        रिश्तों, जिन्दगी और प्रेम की तहजीब में,

                                         कुछ नया स्वीकारने की 

                                         शायद उम्र नहीं रही 

                                         क्योंकि 

                                         पुराने ख़्याल अब पत्थर बन चुके हैं। 

                                         कागज़ नहीं कि लिखा और फाड़ दूँ, 

                                         गुजारे हुए उस वक़्त को 

                                         एक काल-पत्र (टाइम कैप्सूल) में 

                                         इतिहास बना कर धरती में गाड़ दूँ।  


गुरुवार, 19 मार्च 2026

दो शब्द!

 दो शब्द !


          अक्सर देखती हूं कि सोशल मीडिया पर कुछ मित्रों की शिकायत होती है कि लोग सुप्रभात, शुभ रात्रि भेजते रहते हैं और हमें इस बात से बहुत ही चिढ़  होती है।  अगर  इसे भेजने की जरूरत को समझा जाय तो  इस जीवन की आपाधापी  में हम न तो अपने बहुत करीबियों से  रोज कॉल कर पाते हैं और न हीं रूबरू मिल पाते हैं।  एक शहर में रहकर भी हम अपने मित्रों से भले ही न मिल पाये,  न हीं बात कर पाए, यह दो शब्द हमें एक कुशलता का समाचार देने के लिए पर्याप्त होते हैं। रोज न सही कम से कम सप्ताह में एक और दो बार संदेश हम देते हैं, पाते हैं तो एक संतोष होता है कि  सब कुशल है।  कुछ अधिक गैप होने पर हमें खटकने लगता है कि क्या बात है उत्तर नहीं मिल रहा है या कॉल करने ही पूछ लिया जाए। 

          यह आवश्यक है कि एक नज़र उनके संदेशों पर डाल दी जाए। मेरी एक कजिन हम सबसे जुड़ी थी, हर रिश्ते को निभा रही थी।  भले ही इन शहर में ही प्रमुख अवसरों पर मुलाकात होती हो और मैसेंजर पर संदेश भी भेजती थी। 

       एक करीब एक महीने कुछ समारोहों के चलते,  कुछ स्वास्थ्य के चलते मैं मैसेंजर पर नहीं जा पाई। जब घर वापस आई तो सूचना मिली कि इंदु नहीं रही। एकदम से आघात लगा बरसों से सब ठीक चल रहा था, बरसों से हम जुड़े थे और यह जुड़ाव एक अकेले को भी एक संबल देता है। वह अकेली सबको मैसेज भेज कर और पढ़कर अपने अकेलेपन का एक साथी पाती थी।

       अपनों से जुड़े रहिए उम्र की एक पड़ाव पर सबके रहते हुए भी इंसान अकेला होता है, तो फिर साथ बने रहिए न, अगर मैं आपको पसंद न हो तो शालीनता से मना कर दीजिए, लेकिन उपहास बिल्कुल भी मत कीजिए। आपकी उपेक्षा से बेहतर यही है कि अगर अगला समझदार हैं तो उपेक्षा  मिलने पर समझ जाता है और स्वयं बंद कर देगा।  यह सोचकर कि आप संबंध रखना पसंद नहीं करते या जुड़े रहना नहीं चाहते हैं तो आपको स्पष्ट कह देना बहुत अच्छा होगा, लेकिन जिनके लिए यह एक सहारा होता है या जिनके लिए ही एक समाचार पाने का साधन होता है उनके लिए एक सुप्रभात या एक शुभ रात्रि बहुत मायने रखती है इस बात को सोचिएगा।

सोमवार, 23 फ़रवरी 2026

किसी के लिए!

 

किसी के लिए!
 
जीवन एक अग्नि परीक्षा
शेष रहे थे ये पल
जो कर्ज हैं मेरे ऊपर
किस जन्म के कर्मों का भुगतान
या फिर था
देना पावना इस जन्म के रिश्तों से।
कोई कहीं भी
नहीं किसी में
देखी कोई मलिनता
जो समझें,
बोझ इस जीवन को।
जिजीविषा बनी हुई है
किसी ऋषि के जीवन सी,
अभी शेष हैं जितने पल
उनको तो जी लूं मैं,
मुक्त आत्मा हो न सकेगी,
शेष जहर भी पी लूं मैं।
--रेखा

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

दोहे!

दोहे !

1. बदरी छाई जगत में, विपदा की चहुँ ओर । 

   रैना कटे न दिन कटे, कब होगी नव भोर ।।

2. माणिक माला कर गहे, नजर भरी मन मैल।
कलयुग का यह धर्म है, खड़े कुटिल बन शैल ।
 
3. सागर हृदय विशाल है, रखता है यह ज्ञान।
 नदियाँ कितनी जा मिले, रखता सबका मान।।

4. सारा जगत है जल रहा, भड़की झूठी शान। 
    मनुज न समझे मनुज को, चाहे संपत्ति खान। 
 
5. विदा करें इस बरस को , भूलें कटु अघात ।
नया साल गुलजार हो ,  देकर कल को मात ।।
 
6. धरती ढकी है धुंध से, साँस थमी सी जाय।
तड़पे जीवन घुटन से , साथी नजर न आय ।।

7. मन काजर की कोठरी, तन जो उजरा होय। 
विश्लेषण सब ही करें, मन को  पढ़े न कोय।।

8. झूम झूम बरसे बदरा, तड़ित न माने हार।
नदिया उफनी वेग से, पड़ी गरीब पर मार।।

9. सीता जो देती रही , जगत को बारम्बार।
प्रमाण शुचिता के लिए, मगर गयी वो हार।।

10. छली गयी सीता सदा, जीता छल हर बार।
राम भटकते आज भी,  कलयुग ले अवतार ।।

11. प्रीति कीजिए राम से, पार ये नौका  होय।
भव सागर के पंक से, इस विधि मनवा धोय ।।

12. राम नाम दीपक बने, मिटा अँधेरा जान ।
जगमग हो जीवन सदा, रोशन मन को मान ।।

 13. सागर हृदय विशाल है, रखता है यह ज्ञान।
 नदियाँ कितनी जा मिलें, रखता सबका मान।।

 14. साँस साँस में हरि बसे, जीवन उनके नाम।
 धड़कन हरदम ये कहे, प्रभु लो मुझको थाम ।।

15. राम तुम्हारे राज में , बिछड़ गई सन्तान।
मात-पिता निर्बल भये, छोड़ दिये हैं प्रान।।
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शनिवार, 31 जनवरी 2026

 खामोशी भी

कुछ कहती हैं, 

कभी आंखों से,

कभी चेहरे के भावों से

औ' कभी उतर कर कागजों पर।

हां उसको पढ़ना 

सबके वश की बात नहीं।

करें भी अगर कोई सवाल उनसे,

जवाब भी वहीं से आयेगा

कभी आंखों में समायी नीरसता,

कभी चेहरे की नीरवता।

मौन टूटता ही नहीं 

कभी मुखरित नहीं होता

गहराता ही जाता है।

इसको पढ़ना 

आसान नहीं होता।

-- रेखा

बुधवार, 13 नवंबर 2024

समय की बात!

 उम्र खर्च हो गयी

बिना सोचे-समझे,

बहुत पैसे कमाने के लिए।

धनी आज बहुत हैं,

रखने की जगह नहीं,

बस चुप हो गया।

वक़्त ही नहीं मिला संभालें,

जैसे भी थे, कुछ तो करीब थे।

कम अमीर थे,

लेकिन दिल से अनमोल थे,

तब शायद हम खुशनसीब थे।

©रेखा