बोनसाई संस्कृति
हर जगह जरूरत बन गई है
भूल गए हैं कि,
बोनसाई सिर्फ सर्वस्व नहीं,
हमारे विकल्प होते हैं।
वृक्ष जब तक जड़ों से जुड़े है,
तो चारों ओर फैलते हैं,
और भी अधिक गहराई में
अपना विस्तार करते है,
बाँध कर रखना चाहते हैं
सदियों तक
अपनी अस्तित्व को धरा से,
वंश फलता फूलता रहे।
अब नये रूप को स्थापित कर,
अपनी ही शाखायें और जड़ें
काट दी जाती है ।
आज बेतरतीबी किसी को पसंद नहीं,
प्रकृति सबको
एक साथ रूप तो नहीं देती।
तभी तराश देते हैं या
खुद कट जाते हैं।
ठीक एक पके फल की तरह
कीमत जो बढ़ जाती है।
अब तक पिता के लिए था -
दो बेटे और एक बेटी एक परिवार।
अपने पिता को कर दरकिनार,
बेटों के घर बसते ही,
तीसरे चरण के बढ़ते ही,
विभिन्न प्रकार के बनाए गए तरीकों से,
बस एक को उखाड़कर
नीचे से तराश दिया।
बाप, चाचा, बुआ, मामा और मौसी तक
अब आवाजें दी नहीं जातीं,
तराश दिया
क्योंकि फैलने के लिए तो विस्तार नहीं
परिसीमन ही होगा न,
अब आगे की शुरुआत है,
इतनों को ढोते ढोते वह दब गये,
अब पीपल या वटवृक्ष नहीं,
छोटे और तराशे गये
बेनबाई बहुत ही खूबसूरत दिखते है,
परिवार भी अब दो या तीन से सजते हैं।
हां बोनसाई परिवार
ऊपर और नीचे से तराश कर
इच्छानुसार बांध कर
नया स्वरूप बन रहा है,
बोनसाई पर अभी शोध चल रहा है।
