ये उम्र भी न
बदल देती है सब कुछ
कब
एक कोंपल को
पेड़ की शाखाओं का बना के हिस्सा
जीवन का बोझ बढ़ा देती है।
अपने ऊपर
बढ़ते हुए
बोझ को तो ढो लेता है
मजबूत शाखों के लिए
लेकिन
सब कुछ खो देता है।
और फिर
खुद जर्जर होकर
आश्रित हो जाता है उन पर।
वो दबंगई और आँख के इशारे पर
चलता था सब कुछ
आज शांत हो गया।
कभी सिर उठाती है वही आदत
तो जल्द ही
सिर ही झुका देती है।
उम्र लम्बी हो
तब माँ देती थी आशीष
अब
जब तक जिओ अपने दम पर
नहीं तो दूसरों की मर्जी पर
जीने से अच्छा है कि
वो नया जन्म ले और फिर कोंपल बने।
-- ©रेखा श्रीवास्तव

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