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गुरुवार, 30 जुलाई 2026

अंतरीप !

 

 रे मन तू अंतरीप बन जा
क्यों डूबा रहता है तू 
अंहकार के घोर तिमिर में,
भटक न जाएँ कदम तुम्हारे
जीवन की इस कठिन डगर में ,
शांत, मूक औ' सजग दीप बन जा
रे मन तू अंतरीप बन जा।


भौतिकता के तेज दौड़ का
अनुगामी न होना तू,
पाकर शक्ति धन या जन की
अभिमानी न होना तू,
मोती वाली एक मूक सीप बन जा
रे मन तू अंतरीप बन जा।


सुख हो दुःख हो या हो धूप-छाँव
शीतलता हो या बढ़े उष्णता ,
ज्वार-भाटों के आवेगों में
रखना सदा बनाये दृढ़ता ,
संतापों से दूर सदा शांत द्वीप बन जा
रे मन तू अंतरीप बन जा।


कितना ही सिर मारें लहरें
तूफानों का वेग प्रचंड सहो,
निश्चल, अटल, मध्य सागर के
खड़े सदा ही निर्संवेग रहो,
अंतर के भावों का भी तू महीप बन जा
रे मन तू अंतरीप बन जा। 

बुधवार, 15 जुलाई 2026

कुछ नया करें!

 कुछ नया करें!


दर्द को हाशिये में डालो,

मुस्कानों के 

सिलसिले से 

एक इबारत नयी लिखो,

उनके बीच बस

बिंदियाँ दर्द की हों.

गर मुस्कानें  कम लगें

खोज लो  बचपन में,

निर्दोष, खामोश 

जिंदगियों में और

उनको बाँट लो,

जग के सारे गम

उनके सामने 

बहुत छोटे पड़ जायेंगे.


--रेखा श्रीवास्तव

शनिवार, 11 जुलाई 2026

गंगा का शाप!

 गंगा का शाप! 

मैं पावन हूँ, 

मैं पावन हूँ, 

गिरी धरा पर जब से मैं,

तब से सुना यही मैंने,  

मैं गंगा, गोदावरी, यमुना,

कावेरी, नर्मदा और ब्रह्मपुत्र 

 सब नाम  हमारे पावन हैं।

निर्मल धाराएं मेरी 

हो चुकी आज पंकिल हैं। 

मेरे घाटों की पावनता,

धोते धोते पापों की गठरी,

मुझको पापिन सी लगती है। 

बाँध मेरी धाराओं को 

जहाँ तहाँ है मोड़ दिया,

कब तक सहती मैं यह मनमानी, 

मेरे संयम को तोड़ दिया। 

समेट लूँ अपनी धाराएँ ,

 या बाँध लूँ सारी सीमायें,

फिर रेत किनारे कर लेना 

मेरा तर्पण औ' मेरे जाने पर रो लेना। 

क्षमा करो मैं जाती हूँ।  

अपनी प्रगति के शिखर पर जाकर 

तुम आकाश छुओ या चाँद रचो। 

गंगा न अब शेष रही 

मत क्रोधित कर रे मानव 

फिर तोड़ मर्यादा शिव की भी ,

मैं सर्वनाश ही कर दूँगी ,

जब हाहाकार मचा होगा 

धरा करेगी तांडव तब 

डूबोगे उतराओगे तुम  

कहीं ठिकाना न होगा। 

बस शेष यही शाप होगा। 

बस शेष यही शाप होगा।