गंगा का शाप!
मैं पावन हूँ,
मैं पावन हूँ,
गिरी धरा पर जब से मैं,
तब से सुना यही मैंने,
मैं गंगा, गोदावरी, यमुना,
कावेरी, नर्मदा और ब्रह्मपुत्र
सब नाम हमारे पावन हैं।
निर्मल धाराएं मेरी
हो चुकी आज पंकिल हैं।
मेरे घाटों की पावनता,
धोते धोते पापों की गठरी,
मुझको पापिन सी लगती है।
बाँध मेरी धाराओं को
जहाँ तहाँ है मोड़ दिया,
कब तक सहती मैं यह मनमानी,
मेरे संयम को तोड़ दिया।
समेट लूँ अपनी धाराएँ ,
या बाँध लूँ सारी सीमायें,
फिर रेत किनारे कर लेना
मेरा तर्पण औ' मेरे जाने पर रो लेना।
क्षमा करो मैं जाती हूँ।
अपनी प्रगति के शिखर पर जाकर
तुम आकाश छुओ या चाँद रचो।
गंगा न अब शेष रही
मत क्रोधित कर रे मानव
फिर तोड़ मर्यादा शिव की भी ,
मैं सर्वनाश ही कर दूँगी ,
जब हाहाकार मचा होगा
धरा करेगी तांडव तब
डूबोगे उतराओगे तुम
कहीं ठिकाना न होगा।
बस शेष यही शाप होगा।
बस शेष यही शाप होगा।

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