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बुधवार, 10 जून 2026

भावों का दरिया !

बंद आँखें 

दिखती बंद भले ही हों,

मन की आँखें कब बंद हुई हैं ?

भावों का दरिया, 

अंर्त में निर्बाध बहा है, 

नहीं लिखा मसि से कागज़ पर, 

अंकित होकर मन के पट पर,

हर कोना रंग चुका कभी का, 

रोज भरती रही जगह पर,

फिर भी 

शेष अभी हैं कुछ आँसू, 

कुछ सदमे जो मन में छिपे हैं। 

बाँट सके न जो दुःख अपना,

पीते रहे वो गरल समझ कर,

नीलकंठ बन जीवन भर,

सागर भर संताप पिया है।

समझो, एक अभिशाप  जिया है। 


- रेखा श्रीवास्तव 

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