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बुधवार, 10 जून 2026

चाह आसमान की !

 

पाकर फल अपने श्रम का, 

होकर पुलकित अंतर्मन से,

नज़रें जमाये हैं निज लक्ष्य पर , 

छूना चाह रहे आसमान।


देख रहे कंटकाकीर्ण धरा को , 

पर्वत खड़े है रोक कर राह , 

धरा से ही छलांग लगा कर,

छूना चाह रहे आसमान।


सपने हैं सागर से अनन्त  ,

हौसलों से माप लेंगे  एक पग में ,

पाँव रख कर हवाओं में,

छूना चाह रहे आसमान। 


धारे आशीष अपने बड़ों का ,

पूरा करने उनके सपनों को,  

पूरी ऊर्जा से चल पड़े हैं ,

छूना चाह  रहे आसमान।  


-- रेखा श्रीवास्तव

कानपुर



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