पाकर फल अपने श्रम का,
होकर पुलकित अंतर्मन से,
नज़रें जमाये हैं निज लक्ष्य पर ,
छूना चाह रहे आसमान।
देख रहे कंटकाकीर्ण धरा को ,
पर्वत खड़े है रोक कर राह ,
धरा से ही छलांग लगा कर,
छूना चाह रहे आसमान।
सपने हैं सागर से अनन्त ,
हौसलों से माप लेंगे एक पग में ,
पाँव रख कर हवाओं में,
छूना चाह रहे आसमान।
धारे आशीष अपने बड़ों का ,
पूरा करने उनके सपनों को,
पूरी ऊर्जा से चल पड़े हैं ,
छूना चाह रहे आसमान।
-- रेखा श्रीवास्तव
कानपुर

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें