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बुधवार, 5 अगस्त 2026

नम आँखों के प्रश्न !

 

 
औरत की आँखों को
 कभी झील कहा उनको,
कभी सागर की गहराई नापी 
नील गगन  की विशालता से
उनकी फिर ऊँचाई मापी,
अनुसुइया सी ममता देखी,
राधा का प्रेम छलका उनमें
सीता सी सादगी समाई 
दुर्गा सी दृढ़ता देखी।
 
कुछ कवियों की कल्पना थी,
कुछ पौराणिक ग्रंथों की बातें,
हम झाँके जब उन आँखों में,
 रूप हमने कुछ ऐसा देखा --

झाँका नम आँखों में हमने
वे एक माँ की आँखें थीं
छलकी थी ममता उनमें  
अपने सब लालों पर,
पर आज
वे भी नम थीं 
अपनी ममता के तिरस्कार
औ'
बिखरे सपनों से।
 
उसकी ममता औ' त्याग
उसका फर्ज़ करार दिए थे,
बेटों ने फर्ज़ अपने
लालों में समेट लिए थे। 
फिर भी
दिल में लिए दुआएँ 
बैठी थी मंदिर के द्वारे
बच्चों के हित में डूबी थी। 

झाँका नम आँखों में
वे एक पत्नी की आँखें थी 
करके समर्पित जीवन अपना 
धारण कर कुछ चिह्न 
बनी थी कन्या से वो नारी 
बदले में जो कुछ पाया, 
अपने घर के तानों से वो 
कभी मुक्त न हो पाई 
फिर भी 
तन मन से रही समर्पित 
नम आँखें कहती  हैं 
मुझे बता दो कोई 
मेरा अपना अस्तित्व कहाँ हैं?
 
मैं कौन हूँ?
किसी की बेटी,
बहन किसी की ,
पत्नी हूँ मैं, बहू बनी 
 माँ बनकर हुई इति,
मेरा अपना व्यक्तित्व कहाँ है ? 
बस इतनी सी परिभाषा है 
या कुछ शेष अभी भी है ,
जिसमें खोजूँ 
मेरा अपना अस्तित्व कहाँ है ?  

झाँका उन नाम आँखों में 
वे एक बेटी की आँखें थी।
हाय लड़की हुई !
फिर लड़की !
बड़ा भार  है?
लड़की है दबा कर रखो 
सुना सभी कुछ 
सह न पाई 
उन नम आँखों की पीड़ा 
किसने पढ़ी है?
किसने जानी?
पूछ रही वे नम आँखें 
आखिर ऐसा क्यों है?
हम अनचाहे क्यों हैं?
 अपने घर में अपनों को 
अपनापन देकर ही जाना 
फिर भी इतने पराये क्यों हैं ? 
 
जीकर भी क्या मिला हमें? 
उपेक्षा, तिरस्कार और बंदिशोंं ने
आत्मा की हत्या ही कर दी,
जिया भी तो किस तरह से 
देकर अपना जीवन 
फिर भी 
उसने कभी आत्महत्या कर ली।  

पूछ रही है वही 
वो कैसी नारी थी?
पूजा था जिसको सबने 
नमन किया संसार ने
औ' 
फिर क्यों हम रहे अधूरे 
सपने भी न कर पाए पूरे 
आज भी  
मुकाम अपना खोज रहे हैं।   

नम आखों के 
उठते प्रश्नों को 
उत्तर कौन है देगा?
उत्तर कौन है देगा?