खून ही रचता है साजिशें, जिन्हें खून की जरूरत ही नही,
वर्ना पड़ोसियों को तो अपने से फुरसत ही नहीं।
इल्जाम कैसे-कैसे लगाये शर्म से झुका है सिर ,
अपनों पर इल्जाम लगाने की तो फ़ितरत ही नहीं।
हमने तो उनको अपना मान गले से लगाया,
जगह दिल में दी , उन्हें देखने की फुरसत ही नहीं ?
दर और दीवारें रंगीन है अपनों के ही खून से ,
वे समझ लें कीमत इतनी अच्छी मेरी किस्मत ही नहीं ?
जिंदगी में कदम-कदम पर साथ निभाया हमने,
नज़र में उनकी इस साथ की कोई अहमियत ही नहीं।

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