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सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

ग़ज़ल!

 खून ही रचता है साजिशें, जिन्हें खून की जरूरत ही नही,

वर्ना पड़ोसियों को तो अपने से  फुरसत ही नहीं।


इल्जाम कैसे-कैसे लगाये शर्म से झुका है सिर  ,

अपनों पर इल्जाम लगाने की तो फ़ितरत ही नहीं।


हमने तो उनको अपना मान गले से लगाया,

जगह दिल में दी , उन्हें देखने की फुरसत ही नहीं ?


दर और दीवारें रंगीन है अपनों के ही खून  से ,

वे समझ लें कीमत इतनी अच्छी मेरी किस्मत ही नहीं ?


जिंदगी में कदम-कदम पर साथ निभाया हमने,

नज़र में उनकी इस साथ की कोई अहमियत ही नहीं।

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