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सोमवार, 29 अगस्त 2022

इतिहास बन गए!

 गुजरे साल के वो भयावह दिन ,

किस तरह एक तारीख़ बन गए। 

 

समेट  कर जो कुछ रखा था यादों में ,

कुछ ज़ख्म  कुछ फाहे बन गए। 

 

नहीं जानते कौन कब बेगाने हुए ,

कौन दिल से जुड़े और साये बन गए। 

 

जिया था जीवन साथ जिनके उम्र भर ,

गर्दिश  में देखा तो अनजाने बन गए।

रिश्तों की सिलन!

 रिश्तों में सिलन

जन्म से होती है,

तभी तो

सब मिलकर बनता है

परिवार परिधान।

सबका अलग अलग अस्तित्व

फिर भी जुड़े होते है ।

सारे अवयव

जुड़े होते है सिर्फ माँ से,

और माँ संतुलन बनाये

सबको धारे रहती है।

समय के साथ

आकार बढ़ता है फिर

अपने ही सामने 

जब टूटने लगती है वह सिलन,

फिर नहीं सिल पाती है

सिल भी ले तो

नहीं हो पाते हैं

सब एक साथ , एक आकार में।

खुद सुई तागा लिए

कभी इसको सुधारती है

और कभी उसको

लेकिन खुद दोषी बना दी जाती है

और एक किनारे बैठा दी जाती है।

कहीं कॉलर,

कहीं आस्तीन,

कहीं बाँधने वाला फीता,

शेष बचा भाग उड़ जाता है हवा में,

वो देखती रहती है बेबसी से,

उस सिलन की सूत्रधार ।

शुक्रवार, 19 अगस्त 2022

सावन!

 सावन लिखा

तो

मायका याद आया,

इस घर से वहाँ जाना,

नीम पर पड़ा झूला,

सारी सहेलियों की टोली,

हफ्तों पहले से सपने

तैरने लगते थे।

कितनी तैयारी होती थी?

छोटी बहनों के लिए

कुछ लेकर तो जाना है,

भाई की पसंद की राखी

पसंद की मिठाई,

भाभी की चूड़ियाँ, कंगन

सब इकट्ठा करके चलते थे।

आज 

वहाँ न माँ-पापा रहे

न बहनें - सब अपने घर

अब नहीं मिल पाते वर्षों,

और भाई भी रूठ गये,

फिर कैसा सावन, राखी, चूड़ियाँ, कंगन

सब बेमानी हो गये।

खो गये सब मायने

और मायका भी तो बचा कहाँ?

न माँ, न पापा और न भाई हों जहाँ।

ऐसा भी घर !

 उस मकान से

कभी आतीं नहीं 

ऐसी आवाजें

जिनमें खुशियों की हो खनखनाहट।

खामोश दर,

खामोश दीवारें, 

बंद बंद खिड़कियाँ,

ओस से तर हुई छतें

शायद रोई हैं रात भर ।

कोई  इंसान भी नहीं 

हँसता यहाँ,

मुस्कानें रख दी हैं गिरवी। 

उनके यहाँ 

खुशियाँ ने भी

न आने की कसम खाई है।

शायद इसीलिए

हर तरफ मायूसी छाई है।

 

गुरुवार, 4 अगस्त 2022

माँ : एक भाव!

 

माँ 
क्या 
एक इंसान भर होती है
फिर क्यों लोग 
सगी और सौतेली का ठप्पा लगा देते हैं।

माँ 
एक भाव है,
जरूरी नहीं कि उसने
हर बच्चे को जन्म दिया हो,
फिर भी संभव है 
कि बहुतों को प्यार दिया हो।

माँ
जो प्यार बाँटती है,
अपने बच्चों में, 
पराये बच्चों में भी,
वह न देवकी होती है न यशोदा
फिर भी वह माँ होती है।

माँ
ऐसी भी होती है,
समेट लेती है,
उन बच्चों को भी
जो आँखों में आँसू लिए 
नजर आ जाते है।

माँ
वह इंसान है 
जिसे हर बच्चे में
अपना ही अंश दिखाई देता है
और प्यार तो वह अपरिमित बाँटती है।

हाँ 
माँ 
एक भाव ही होती है,
अपने पराए से परे
आँचल पसारे , दिल खोले,
आँखों में प्यार लिए होती है।

शनिवार, 25 जून 2022

कितना बदल गया संसार !

 

कितना बदल गया संसार !


दर वही,

द्वार वही,

बाड़ी भी वही

बस कुछ दीवारें बढ़ गईं।


कुछ दरवाजे,

कुछ खिड़कियाँ,

पत्थरों औ' रोशनी की 

चमक बस कुछ और बढ़ गई।


आँगन वही,

चेहरे मोहरे वही,

जमीन भी वही

बस मन   की दूरियाँ बढ़ गईं।


जीवन वही,

रिश्ते भी वही,

रगों में बहता खून वही,

बस ज़िन्दगी में तल्खियाँ बढ़ गईं।

ये साठ साला औरतें!

ये साठ साला औरतें !


ये कल की साठ साला औरतें,

घर तक ही सीमित रहीं,

बहुत हुआ तो

मंदिर, कीर्तन और जगराते में,

पहन कर हल्के रंग की साड़ी,

चली जाती थीं।

चटक-मटक अब कहाँ शोभा देगा उन्हें

और कभी कभी तो उनकी 

आने-जाने की कुछ साड़ियाँ वर्षों तक

चलती रहती थी,

कहीं गईं तो पहन लिया 

और 

आकर उतार कर बक्से में धर दिया।

ये कल की साठ साला औरतें - 

हाथ पकड़ कर पोते-पोतियों के

पड़ोस में जाकर बैठ आती,

कुछ अपने मन की कह कर, 

 कुछ उनके मन की सुन आती।

वही तो हमराज होती थीं।

पति के साथ बैठकर बतियाने का रिवाज भी ही कम था,

जरूरत पर बतिया लो, 

पैसे माँग लो या 

कहीं बुलावे में जाना है, की सूचना दे दो।

ये थी कल की साठ साला औरतें।

और 

आज की साठ साला औरतें-

लगती ही नहीं है कि साठ साला हैं,

आज तो जिंदगी शुरू ही अब होती है,

रिटायरमेंट तक दौड़ते भागते, 

घर बनाते, बच्चों के भविष्य को सजाते निकल जाता है।

कब सजने का सोच पाईं,

अब किटी पार्टी का समय आया है,

अब सखी समूह में घूमने का समय आया है,

नहीं बैठती है, अब बच्चों को लेकर पार्क में,

खुद योग में डूब कर स्वस्थ रहना सीख जाती हैं।

तिरस्कार नयी पीढ़ी का क्यों सहें?

अपने को अपनी उम्र में ढाल लेती हैं।

अपने गुणों को डाल कर नेट पर समय बिताती हैं,

अपने गुणों से ही पहचान बनाती हैं।

जिंदगी जिओ जब तक,

जिंदादिली से जिओ , 

जो संचित अनुभव है, बाँटो और खर्च करो,

पुरानी तोड़कर अवधारणा फैल रहीं है दुनिया में।

ये साठ साला औरतें लिख रहीं इतिहास नया।

ये आज की साठ साला औरतें, 

युवाओं से भी युवा है।

जीना हमें भी आता है,

कहकर मुँह चिढ़ा रहीं हैं नयी पीढ़ी को,

वह पहनतीं हैं जो सुख देता है,

सुर्ख़ रंगों में सजे परिधान संजोती हैं,

लेकिन अब भी लोगों की आँखों में किरकिरी की तरह 

खटक जाती है इनकी जिंदादिली 

क्योंकि

आज की साठ साला औरतें  

सारी बेड़ियाँ तोड़ना चाहती है ।