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रविवार, 19 जून 2016

पितृ दिवस पर !


बहुत याद आते हो तुम रोने को जब दिल करता  है ,
पापा ऐसा क्यों लगता है ,साथ हमारे आज भी हो। 

अपनी छाया में रखते थे ,अलग कभी भी नहीं किया ,
साया बन कर साथ चले थे ,साथ हमारे आज भी हो। 

कलम मैंने पकड़ी थी दिशा उसे तुमने ही दिखलाई ,
मेरे  शब्दों में अहसास बन, साथ हमारे आज भी हो। 

अपने छोटे घर औ' बड़े से दिल में एक बड़ा संसार रचा ,
आज देखती हूँ घर को जब , साथ हमारे आज भी हो। 

संवेदनाएं दी विरासत में पल पल उनको बोया मुझमें ,
आज वृक्ष बन खड़ी है मुझमें, साथ हमारे आज भी हो। 

क्यों दूर अचानक चले गए , बिना मिले कुछ कहे बिना ,
फिर पापा ऐसा क्यों लगता है,  साथ हमारे आज भी हो।


शुक्रवार, 10 जून 2016

तारणहार !

बेटा
तारणहार
कुल दीपक
और न जाने क्या क्या ?
वर्षों पहले
निकाला था घर से ,
भटकते रहे दर-ब-दर
पनाह दी किसी अनाथ ने ।
अपने अनाथ होने के दुख को
भूल जाने के लिए ,
बहुत प्यार दिया ,
बहुत आशीष लिया ।
इक दिन चल दिये
तो
बेटे को खबर दी ,
आया और संगत में बैठा रहा ।
कांधे औरों ने दिये
बाप की आत्मा
बार बार बाट जोहती रही
अब मेरा बेटा काँधे पर उठायेगा ,
फिर मुखाग्नि देगा ।
आखिर खून है मेरा ,
लेकिन
पता नहीं कब वो तो
रास्ते से वापस हो गया ।

मंगलवार, 7 जून 2016

बेबसी !



कभी कभी सामने से ऐसा गुजर जाता है कि न रोना आता है और न कुछ कर पाते हैं।  ऐसी देखी एक दिन बेबसी और फिर ये कविता रची।

स्वेद बिंदु है 
चमकती माथे पर ,
सिर पर लादे बोझ 
गड़ा गड़ा कर 
रखती हर कदम 
गिर कहीं गया 
तो 
रोटी भी नसीब न होगी। 
बच्चों की खातिर 
जुटी हैं
धूप  से जलती दोपहर में।
आँचल से बहती 
दुग्ध धार को 
छुपा लेती है। 
पेड़ की छाँव में 
भूख से बिलखते लाल को 
छोटी दुलरा रही है --
चुप हो जा भैया 
वो देखो माई आ रही है ,
फिर मिलेगा न दू दू 
मेरा राजा भैया है न। 
उसे क्या पता ?
माई को छुट्टी तभी मिलेगी 
जब घंटी बजेगी। 
आकर वह 
खुद न रोटी खायेगी 
लेकिन 
लाल का पेट भरेगी। 
कानों पड़ती 
आवाज लाल की 
स्वेद अश्रु एक साथ
बहकर चेहरा भिगो रहे थे। 


बुधवार, 9 मार्च 2016

तस्वीरें और यादें !

कुछ धुँधली सी 
यादों पर 
जब पड़ जाती है 
उजली सी तस्वीरों का 
चमकता हुआ सूरज। 
फिर क्यों ?
वापस हम 
जीने लगते हैं 
अतीत के उन 
पीले होते हुए पन्नों को। 
कुछ मधुर 
कुछ तिक्त 
कुछ कटु 
सब गुजरे  हुए पल 
फिर से जीने के लिए 
उन तस्वीरों में घुस जाऊं। 
उन पलों को 
फिर से चुरा लाऊँ। 
कैसे भी ?
बस एक बार 
बच्चों का वही बचपन 
वही भोलापन 
फिर वापस आ जाए
कुछ दिनों के लिए सही।
दुनियां के अलग अलंग 
जगहों पर 
जी रहे बच्चे 
एक बार फिर 
एक साथ  मेरे पास आ जाएँ। 
निहार लूँ जी भर कर ,
दुलार दूँ जी भर कर ,
फिर और फिर 
कुछ भी नहीं 
कुछ भी नहीं चाहिए।




सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

मेरी डायरियां !

मेरी डायरियां 
मेरी संवेदनाओं की साक्षी ,
बचपन से अब तक की साथी ,
उम्र के साथ 
उनकी उम्र नहीं 
उनकी संख्या बढ़ती गयी। 
इनकी कीमत 
मेरे सिवा 
कोई समझ नहीं सकता। 
इस घर में,
मैं अपनी थाती 
सीने से लगा कर लाई थी। 
मुझे मोह नहीं था 
कोई मेरे कपडे ले ले 
कोई गहने भी ले जाए 
पर 
हाथ लगाना उन्हें 
कतई गवारा न था। 
किन्तु 
 हाय रे किस्मत 
मेरी डायरियां 
 उस वृहत  परिवार में 
वे आँख की किरकिरी बनी थी ,
क्योंकि 
वे मुझे उन सबसे अलग 
खड़ा कर रही थी। 
वो इज्जत जो मिली 
जो चर्चा का विषय बना रही थी। 
फिर मेरे घर से जाते ही 
वे बेच दी गयीं रद्दी में ,
कुछ  पेज ही लिखे थे  जिनमें 
फाड़ कर उन्हें 
व्यंजन की डायरी बना दिया। 
मेरे लिखे 
मेरे भाव और संवेदनाएं 
कोडियों के मिल बिक गए। 
पर क्या मुझे 
 कलम से 
कविता से 
भावों की अभिव्यक्ति से 
 कोई वंचित कर पाया ,
शायद नहीं। 
हाँ मैं अपनी डायरियों के लिए 
आज भी रो लेती हूँ. 
उसमें लिखा था 
 अपने किशोर मन के भावों को ,
उसमें लिखा था 
अपने प्रिय स्वर्गीय भाई की यादों को ,
कुछ लोगों ने मिटा दिया। 
वे थी उन दर्द भरे लम्हों 
और  
एक बहन के कष्ट के साक्षी 
सब  ख़त्म कर दिया।  
उनके लिए वह 
सिर्फ कागजों  का पुलिंदा था। 
पर मेरे लिए वे मेरी 
जिंदगी सी थीं,
और मेरी जिंदगी का
एक हिस्सा काट कर 
मुझे अधूरा बना दिया।
 

शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

रिश्तों की बगिया !

हाँ 
मैं रिश्ते बोती हूँ , 
धरती पर उन्हें 
रोपकर 
निश्छल प्यार ,
निस्वार्थ भाव,
और अपनेपन की 
खाद - पानी देकर 
उनको पालती हूँ। 
धूप , पानी और शीत से 
कभी बहा कर पसीना 
कभी देकर सहारा 
कभी पौंछ कर आंसू उन्हीं के 
लगाकर काँधे 
समेत कर सिसकियाँ 
बेटी , बहन और बहू के रिश्ते 
जीवन में संजोती हूँ । 
बेटे , भाई और दोस्त के 
रिश्ते भी उतनी ही शिद्दत से 
बोये और संजोये हैं। 
कहते हैं लोग 
तुम्हरे रिश्ते तो 
दुनियां में पनप रहे हैं। 
कैसे याद रखती हो ?
नहीं ऐसा नहीं है ,
कभी आंधी , तूफान और बाढ़ में 
उड़कर , बहकर और दबकर 
रिश्ते भी कुचल जाते हैं। 
लेकिन वे मरते नहीं 
वक्त उन्हें फिर जीवन देता है। 
जड़ें उनकी इतनी गहरी हैं 
कि छंटते ही बादल 
या फिर दबे हुए 
ढेरों मलबे के नीचे 
सांस फिर भी ले रहे होते हैं। 
वर्षों और दशकों बाद 
जब फिर सर उठाते हैं ,
तो मैंने बोया था 
सुनकर भूले नहीं होते है ,
फिर से लिपट जाते हैं। 
आँखों से गिरते हुए आंसुओं में 
वो अंतराल की दीवार 
ढह जाती है। 
मैं तो वहीँ खड़ी हूँ ,
वटवृक्ष सी 
मेरी लताएँ , पौधे 
औ'
वृक्ष बन 
एक बगीचा बन चुका है। 
उसमें बसी 
फूलों की खुशबू 
महका रही है 
मेरे जीवन की बगिया। 
 हाँ मैं रिश्ते बोती हूँ ,
उनमें जीती हूँ और उनमें रहती हूँ।

बुधवार, 16 सितंबर 2015

मैं हिन्दी हूँ !

अपनी इस कविता को मैंने जानबूझ कर हिंदी दिवस पर नहीं डाला क्योंकि हिंदी हमारे लिए सिर्फ एक दिन अलख जगा कर चिल्लाने की चीज नहीं है।  उसके लिए प्रयागत्नशील हमारे साथियों के प्रयासों में एक निवेदन ये भी समझा जाय।

क्या हम गुनहगार नहीं ?
मुख से 
जो फूटा था 
शब्द प्रथम - वो 'माँ' ही था ,
मदर , मॉम या  मम्मी नहीं। 
अर्थ बहुत हों 
भाव एक हो 
फिर भी क्यों?
अपनी माँ मांगे 
घर में हक़ अपना 
औ'
अपने ही बेटे 
आवाज उसकी सुन न पाएं। 
कानों में ॐ 
जिव्हा पर ॐ 
किस भाषा में लिखा गया था ?
आज वही 
हम बोलने से कतराते हैं ,
बच्चे बोलें तो शर्मिंदगी लगती है। 
अपनी संस्कृति से 
अब परायी प्रिय लगती है। 
शर्म उन्हें नहीं आती है ,
जो जन्मे इस धरती पर 
पैरोकार बने विदेशी भाषा के 
शान से बोलते हैं। 
उनके अपने सुनने वाले 
सिर धुनते हैं। 
नाज तो उन पर है ,
जो विदेशी जमीन पर 
हिंदी का परचम लहर रहे हैं। 
सिखा रहे हैं 
और विश्व में एक महत्वपूर्ण भाषा 
बनाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। 
किस तरह अपने प्रयासों से ,
हम जिसे देश में 
स्वीकार नहीं कर पाये 
राजभाषा तक। 
हिंदी भी अपने हक़ के लिए 
साल में एकबार 
अखबारों ,
जलसों , प्रतियोगिताओं में 
जोर शोर से 
अपनी ही धरती पर 
अपने बारे में 
अपनी महिमा सुनती है। 
फिर पूरे साल 
दफ्तरों में , अदालतों में 
सिसकती रहती है।