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गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

नदी का जीवन सन्देश !


 




सरिता तीरे
धीरे धीरे
मंद प्रवाहित
सुखद समीरे ,
लहरें थामें अपनाआँचल
साक्षी हैं
ये लहरें औ' जल।
जीवन क्रम भी
उदित सूर्य
तप्त सूर्य
या फिर
शांत रक्तवर्ण सूर्य से
जुड़ा जो रहता है।
ये सरिता
अपने जल में
जीवन के हर आश्रम को
चाहे वो
ब्रह्मचर्य , गृहस्थ ,वानप्रस्थ और संन्यास हों
हर एक को
एक दिन के सूर्योदय से
सूर्यास्त तक जी लेती  हैं।
रोज जीती है
पर कभी क्षरित नहीं होती.
मानव जीवन की
समरस , समतल , सम्प्रवाह लिए
देती है एक सन्देश
सब कुछ समाहित करो,
अपने अंतर में
 सत्य - असत्य ,
क्षम्य - अक्षम्य,
और पाप और पुण्य भी।

शनिवार, 29 नवंबर 2014

रिश्तों की परिभाषा !(Aruna(

रिश्ते बनते हैं
बिगड़ते हैं और
और फिर ख़त्म हो जाते हैं।
कहते हैं
खून के रिश्ते
ऊपर वाला बनाता है
वे अमिट होते हैं
खून के रंग से
गहरे और रगों में
बहते हैं।
वक़्त ने रिश्तों की
परिभाषा बदल दी ,
लक्ष्मी ने खून को
पानी कर दिया।
स्वार्थ ने अपने को
पराया कर दिया।
बस एक रिश्ता आज भी
जिन्दा है उसी तरह
वो  रिश्ता है
दर्द का रिश्ता।
भुक्तभोगी समझ लेता है
अपने से पीड़ित का दर्द
फिर अपने सा दर्द समझ कर
उसके काँधे पर रख कर हाथ
जो सहारा देता है ,
उसको लिख कर बयान करना
नामुमकिन है। 

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

हाइकू !


नवरात्रि में
कन्या पूजन किया
फिर की हत्या .
*******
या देवि कहो
या फिर देखो उसे
भोग्या का रूप .
*******
पूजिता तो है
वह हर हाल में
जननी है वो.
*******
तुम जन्म दो
हम पालेंगे उसे
हमें दे देना।
******
जिस  घर में
पसरा है अँधेरा
बेटी जन्मी है।
******
 

सोमवार, 8 सितंबर 2014

ऐसा भी होता है !

कितने अजीब 
होते हैं ये भाव 
मन में उमड़े बादल से 
जल्दी से उठी 
सोचा दर्ज कर लूँ ,
कागज और कलम 
जब तक हाथ में आई 
वो कपूर की तरह 
काफूर चुके थे। 
बहुत सोचा 
वो शब्द क्या थे ?
वो बात क्या थी ?
शब्दों में से कोई एक 
पकड़ में नहीं आया 
और फिर 
कलम रख दी। 
कुछ  लिखने को था ही कहाँ ?

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

कठपुतली से पर्दानशीं तक !

जिंदगी अपनी
जन्म से
जिनके हाथों में ,
जिनकी मर्जी पर
और जिनके लिए
जीते रहे ,
 उस  रूप को
हम आज कठपुतली का
नाम देते हैं।
शास्त्रों ने जिसे
शास्त्रोक्त बताया
उसी तरह जिया हमने।
चाहे वह
,बेटी  बहन , पत्नी या फिर माँ रही हो।
सात पर्दों में रखा ,
 फिर भी साया
और शासन पुरुष का रहा।
वक़्त बदला
धीरे धीरे
खुद को संभाला
कदम से कदम मिलाने की
शक्ति और शिक्षा पायी
खुद को आज़ाद किया।
लेकिन आधी आबादी
खुली हवा में सांस लेती
शेष आधी आबादी का
दम घुटने लगा
फिर कुछ ऐसा करने लगे।
बंदिशे उसको खुद ओढनी पड़ें।
कभी खींचा , कभी घसीटा
कभी तार तार कर दी अस्मत,
 कभी सूरत बिगाड़ दी ,
सोचा चलो फिर से 
पर्दानशीं हो जाएँ। 
वे खुश रहें और हमें भी रहने दें।

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

दर्द पेड़ों का !


दर्द पेड़ों का
समझ नहीं सकते ,
 बदलते हुए मौसम ने
उन्हें पत्तों से जुदा  कर दिया .
मेरे आँगन में खड़े
वो दो अमरूद के पेड़
जिनके आंसुओं की जगह
पत्ते गिर रहे हैं
पतझड़ गुजरे
 महीनों हो गए।
फिर से फूलने के दिन हैं
और वे भादों में
लहलहाने और फूलों से लदे होने के
अहसास को भूल गए।
अगहन में
जब बच्चे घर आएंगे
तो उनको क्या मुंह दिखाएंगे ?
न पात हैं ,
न फल होंगे ,
अपने नाम पर
शर्म आएगी हमें।
प्रकृति बदली ,
 हम  वहीँ खड़े हैं।
इस  दर्द को जी रहे हैं .

गुरुवार, 17 जुलाई 2014

जला घर किसी का !

अंतर की ज्वालामुखी 
जब पिघलती है 
लावा बन 
वो कलम से 
आग उगलती है। 
वाह ! वाह ! 
सुनकर वो 
सिर पटक कर 
रो देती है - 
दर्द सहा उसने ,
जहर पिया  उसने ,
मन की तपिश में झुलसी 
क्या उसकी 
तपिश को 
किसी ने महसूस किया ?
नहीं बची संवेदनाएं 
जो उसकी कलम से निकले 
लफ्जों की 
तपिश , बेबसी और खामोश बगावत को 
समझा तो होता ,
रोता नहीं फिर भी 
काँधे पर हाथ रखा तो होता। 
सहने का और साहस मिलता। 
लेकिन वो वह बहरूपिया बनी। 
जो खुद रोता था 
अपनी बेबसी पर 
लोगों ने उसे तमाशे का हिस्सा जाना।