सरिता तीरे
धीरे धीरे
मंद प्रवाहित
सुखद समीरे ,
लहरें थामें अपनाआँचल
साक्षी हैं
ये लहरें औ' जल।
जीवन क्रम भी
उदित सूर्य
तप्त सूर्य
या फिर
शांत रक्तवर्ण सूर्य से
जुड़ा जो रहता है।
ये सरिता
अपने जल में
जीवन के हर आश्रम को
चाहे वो
ब्रह्मचर्य , गृहस्थ ,वानप्रस्थ और संन्यास हों
हर एक को
एक दिन के सूर्योदय से
सूर्यास्त तक जी लेती हैं।
रोज जीती है
पर कभी क्षरित नहीं होती.
मानव जीवन की
समरस , समतल , सम्प्रवाह लिए
देती है एक सन्देश
सब कुछ समाहित करो,
अपने अंतर में
सत्य - असत्य ,
क्षम्य - अक्षम्य,
और पाप और पुण्य भी।

