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सोमवार, 8 सितंबर 2014

ऐसा भी होता है !

कितने अजीब 
होते हैं ये भाव 
मन में उमड़े बादल से 
जल्दी से उठी 
सोचा दर्ज कर लूँ ,
कागज और कलम 
जब तक हाथ में आई 
वो कपूर की तरह 
काफूर चुके थे। 
बहुत सोचा 
वो शब्द क्या थे ?
वो बात क्या थी ?
शब्दों में से कोई एक 
पकड़ में नहीं आया 
और फिर 
कलम रख दी। 
कुछ  लिखने को था ही कहाँ ?

3 टिप्‍पणियां:

sushmaa kumarri ने कहा…

बेहतरीन अभिवयक्ति.....

दिगम्बर नासवा ने कहा…

होता है कई बार ऐसा ... भाव आते हैं और उतनी ही टी से निकल जाते हैं ...

palash ने कहा…

good post