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शनिवार, 18 अगस्त 2012

बहुत भाव खाते हैं !

 



न  जाने कहाँ,
खो जाते हैं वो भाव 
कभी यूं ही चलते चलते 
नींद  में जागते से 
अलसाये से मन में 
जो उमड़ आते है।
मन ही मन 
शब्दों में ढल जाते हैं।
लेकिन 
गर उन्हें तुरत 
शब्दों को लिपिबद्ध न किया 
तो 
फिर वे उन बादलों की तरह 
स्मृति से फिसल जाते हैं,
जो आकाश में उमड़ते हुए 
अपना आकार  बदल लेते हैं।
फिर विलीन हो जाते हैं 
लाख खटखटाओ 
स्मृति के द्वार 
वे वापस नहीं आते 
निराकार से 
फिर साकार नहीं हो पाते 
और हम 
उन्हें चाहे जितने बार 
आवाज दिया करें
 वे भाव भी न 
बहुत भाव खाते हैं 
और 
हमें धता बता कर 
खो जाते हैं।

बुधवार, 15 अगस्त 2012

हाइकू !

 बदल गए 
आज़ादी के मायने 
गुलाम ही हैं 
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आज़ादी  की लौ 
जलाई किसी ने थी 
मशालें बनी।
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शहीदों को ही 
भूल गए जब वे 
आज़ादी कैसी? 
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आज़ाद देश 
बचपन गुलाम 
युवा  नाकाम .
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बेलगाम हैं  
सत्ता के  ये चमचे 
शांति कैसे हो?
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राजनीति की 
पहली पाठशाला 
छात्र संघ है। 
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आज़ादी  नहीं 
 शेष रहने दी तो 
कैसे जियेंगे 
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आजादी मिली 
शोषण की आजादी
सर्वप्रथम . 
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शोषण किया 
देश की संपत्ति का 
अमीर हुए  
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 संसद बनी  
 अखाडा नेताओं की 
 फौज खामोश ..
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शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

हाइकू !

राजनीति में

मुखौटा पहने हैं

नीचे झाँका क्या?

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संसद में हों

संविधान जेब में

स्वयंभू वे  हैं .

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जुबां फिसली

जीभ में हड्डी कहाँ

कुछ भी बोलो?

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मेहनत से

काम करो तो चोरी

हक ही होगा .

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बच्ची मिली है

सड़क के किनारे

क्रूर कौन है?

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उपदेश तो

औरों के लिए होते

घर में नहीं.

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आँसू न रुके

शक्ल बेटी की देख

श्राद्ध कैसे हो?

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पत्थर पूजे

सोचा बेटा ही होगा

बेटी निकली.

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मूर्ति गढ़ी है

इतिहास के लिए

तोड़ो न इन्हें.

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कुर्सी पे बैठ

क्यों बौरा जाते है वे

जमीं न भूलो. .

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सोमवार, 6 अगस्त 2012

कैसी रचनाधर्मिता ?


कलम
जब उगलती है आग
तो बड़े बड़े
जलने लगते है.
फिर शुरू होती  है
कलम और रसूख की जंग.
वे चल देते हें
मिटाने को उसे
जो कलम
सिर्फ और सिर्फ
लिखना जानती है.
सच लिखा  तो
तोड़ दिया उसको
अगर किया
प्रशस्ति गान तो
नवाजा गया उसे
झूटी कसीदाकारी पर.
अब कोई धर्म
इससे नहीं जुड़ा है.
कोई मर्यादा इसमें नहीं बची.
लिखो ऐसा
जो बिक जाए
मालामाल करने वाले
उसको लिखने के पहले ही
खरीद लें
या कलम ही बेच दी .
वह लिखो
जो खरीदार कहे.
फिर काहे का धर्म
और कैसा धर्म ?
कैसी रचनाधर्मिता ?
उनकी क़ुरबानी व्यर्थ हुई
जो लिखते रहे
अन्याय और अनाचार के खिलाफ
ख़त्म कर दिए गए.
आज लिखो
और जिओ शान से,
कलम वह तलवार है
जो जिन्दा को मार देता है
नैतिक पतन
मृत्यु से कम तो नहीं.
वे मुँह छिपा कर
खुद को ख़त्म कर देते हें.
अब कलम
हत्यारी भी हो चुकी है.
उसका धर्म बदल गया,
उसकी स्याही
अब नीली या काली नहीं
लाल हो चुकी है.
किसी के खून से लाल.
किसी की जान से लाल.

शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

हाइकू !

वृद्धाश्रम में
कोई माँ बाप नहीं
सब निरीह .
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सुनामी आई
सब कुछ बिखरा
खंडहर है.
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जो जी रहे है
दोहरा व्यक्तित्व
यकीन नहीं.
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जघन्य पाप
निर्णय संतान का
मत अपना.
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तू देवता है
मत बिक पैसों में
जीव आने दो.
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वही साँसें है,
धड़कन भी वही
कोई हो जीव.
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उनके हाथ
फैले है सामने
कुछ तो दे दो.
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अर्थ के अर्थ
बदल गए हें न
अर्थहीन हैं
********

बुधवार, 1 अगस्त 2012

अनुबंध - प्रतिबन्ध !

शब्दों पर पहरे,
कलम पर पहरे,
कहाँ देखे?
किसने देखे?
उसके  जख्म गहरे .
जुबां वह बोले
जो उन्हें पसंद हो,
जो उनके अहम् को
बनाये रखने का अनुबंध हो।
फिर क्या समझे ?
एक रोबोट ही न
काम सारे , दायित्व सारे,
अधिकारों पर प्रतिबन्ध हो।
क़ानून बने और बनते रहेंगे,
इस चारदीवारी में
वही क़ानून और वही दंड है।
अकेले बंद कमरे में
वह क्यों चढ़ जाती है फांसी ?
कोई गला घोंटे भावनाओं और संवेदनाओं का
अहसास में जीती रहे
जीवन एक अहसान है
तो क्यों न?
उससे खुद को मुक्त कर लूं,
इस अहसास  से
जैसे चुपके चुपके
जीवन में
अपनी वेदनाओं को
कागजों पर लिखती रही
कुछ बोझ हल्का किया
लेकिन शब्दों के प्रतिबन्ध ने
कलम के अनुबंध ने
मजबूर कर दिया
औ'
चिंदी चिंदी कर
छत से हवा में उडा  दिया।
उस पल तक का बोझ
उतर गया,
 दिल हल्का कर गया।
ऐसे कितने बोझ
उतारती रही ,
ढोती रही,
फिर आखिर कब तक?
साहस कर लिया बगावत का
लेकिन किससे बगावत?
अपनी जिन्दगी से
और झूल गयी फांसी,
सारे  प्रतिबंधों - अनुबंधों से मुक्त
उन्मुक्त जीवन जीने को
फिर आएगी एक बार
कैसे  जिया जाता है जीवन
फिर जीकर देखेगी
जब सारी भावनाएं, वेदनाएं और संवेदनाएं
सब अपनी होंगी
उन्हें सहेजने को
शब्द अपने होंगे.
उन्हें सहेज कर  
और वह खुल कर जियेगी 
अतब वह मुक्त होगी
मुक्ति उसका अधिकार।