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शनिवार, 18 अगस्त 2012

बहुत भाव खाते हैं !

 



न  जाने कहाँ,
खो जाते हैं वो भाव 
कभी यूं ही चलते चलते 
नींद  में जागते से 
अलसाये से मन में 
जो उमड़ आते है।
मन ही मन 
शब्दों में ढल जाते हैं।
लेकिन 
गर उन्हें तुरत 
शब्दों को लिपिबद्ध न किया 
तो 
फिर वे उन बादलों की तरह 
स्मृति से फिसल जाते हैं,
जो आकाश में उमड़ते हुए 
अपना आकार  बदल लेते हैं।
फिर विलीन हो जाते हैं 
लाख खटखटाओ 
स्मृति के द्वार 
वे वापस नहीं आते 
निराकार से 
फिर साकार नहीं हो पाते 
और हम 
उन्हें चाहे जितने बार 
आवाज दिया करें
 वे भाव भी न 
बहुत भाव खाते हैं 
और 
हमें धता बता कर 
खो जाते हैं।

6 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

सार्थक रचना!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

भाव, शब्द और मेरी कलम - चलती है आंखमिचौली .... कभी भाव गुम,
कभी शब्द
... कभी मैं

Udan Tashtari ने कहा…

उम्दा अभिव्यक्ति!!

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

ham bhi bahut bhaw khate hain:))
bahut umda di:)

vandan gupta ने कहा…

ये तो आपने सटीक आकलन किया है हम सभी ऐसी परिस्थितियों से गुजरते हैं।

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

वो तो मुझे पता है कि मुकेश बहुत भाव खाता है , लेकिन उस भाव को नीचे लाना मुझे आता है.