नदी के किनारे
लाशें मछलियों की
करुण कहानी
सुनाती है अपनी.
यही हैं मानव
करते हैं विषैला
ये जीवन हमारा.
घुट घुट निकलता
जब दम हमारा
टूटती हुई साँसे हमारी
बहुत शाप देती हैं इनको ,
कहाँ तक बचोगे?
इसी जल के कारण
तुम्हें में से कितने
अपंग हो रहे हैं,
रोगों से लड़ते ,
घिसट घिसट कर
जीवन से अपने तंग हो रहे हैं.
हम तो तड़प कर
जहाँ से गए हैं,
तुम तड़प तड़प कर
जीते रहोगे.
सिन्धु है विषैला,
सरिता भी विष भरी है,
कूपों में जीवन
लाओगे कहाँ से?
कर्मों से तुम्हारे
प्रकृति भी हारी है,
खुद के लिए जीवन
खरीदोगे कहाँ से?
खनकते हुए सिक्के तो होंगे,
लेकिन वे जीवन
इस बेजान धरा पर
लाकर के तुमको देंगे कहाँ से?
उजाडा है आँचल तुमने
धरा का ,
जीवन था इस पर
बेजुबां प्राणियों का भी
चीखे बहुत थे
मगर ये इंसानों
कानों पे तुम्हारे हैडफोन लगे थे,
संगीत में उसके
चीखें हमारी सुनी ही कहाँ थी?
अपने ही हाथों से
करते हो पाप तुम
मुक्ति उनसे मिलेगी कहाँ से?
उन मौन आत्माओं का शाप
सुना तो नहीं है,
इसका खामियाजा
तुम्ही तो भरोगे.
उजाड़ कर वंश हमारे
अपने वंश की
सलामती चाहते हो.
स्वयं भू हो तुम
इस अखंड धरा के,
मत भूलो
तुमसे भी कोई बड़ा बैठा वहाँ है.
इस प्रकृति से खेल कर
अमन खरीदोगे कहाँ से?
सब कुछ पैसे से मिलता नहीं है,
बना कर खुद तुम पानी
धरा के गर्भ में
कहाँ से भरोगे?
अट्टालिकाओं के छत पर
बैठ निहारोगे पत्थर ,
क्षुधा मिटाने को कुछ तो चाहिए
मगर फसलें तुम लाओगे कहाँ से?
चाहे रच डालो इतिहास तुम हजारों
समुद्र, वृक्ष, सरिता के विनाशक
कीमत तो इसकी चुकानी पड़ेगी.


