जो जीता किताबों में
वो कभी तन्हा नहीं होता।
किताबों की इबारत
होती है जुबान पर,
किरदारों में खोजते हें खुद को,
फिर करके मंथन
ऐसा नहीं ऐसा?
खुद ही देते हें दिशाएं,
लिखने पर किसी के
प्रश्न उठाते हें,
और फिर
खुद भी उत्तर भी सुझा देते हें।
तौलते हैं तराजू में
कीमत आँका करते हें।
खुद ही देकर
उन्हें कीमत खरीदा और बेचा करते हें।
जीते हें उन्हीं किरदारों में
उनके जुमले बदला करते हें।
कितने संवाद लिखते और मिटाते रहते हैं
किताबों में जो जीते हैं
वो कभी तन्हा नहीं होते हैं।
