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सोमवार, 20 अगस्त 2012

हाइकू !

आज  की थीम है प्रकृति !



तपती धरा 
ओजोन में छेद तो 
हमने किया .
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गंगा मैली है 
गंदगी हमारी है 
पाप धोये हैं।
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बादल फटा 
पृथ्वी की तपन को 
मिटा न सका।
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कुल्हाड़ी पड़ी 
रो दिए हरे पेड़ 
वे तो खुश हैं।
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उन्नत हम 
आकाश में रहेंगे 
धरती कहाँ?
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मिले कहीं तो 
हम आकाश ले लें 
मोल कुछ हो।
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ठूंठ के नीचे 
छाँव नहीं मिलती 
संभल जाओ .
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कभी सोचा है 
ए सी में बैठ कर 
लू फेंकते हो। 
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पैसे में बेचीं 
आकाश की आजादी 
टावर रोपे। 
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घुटता दम 
जलती हुई हवा 
सांस कैसे लें ?
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रविवार, 19 अगस्त 2012

हाइकू !

 हाइकू लिखना कविता से अच्छा लगता है और अब इसको मैं पूरे हाइकू एक विषय को लेकर ही लिखने का प्रयास कर रही हूँ एक विषय को लेकर लिखना और पढ़ना उसके विभिन्न पहलू प्रस्तुत कर देता है। प्रयास है आप लोगों को कितना सही लगेगा नहीं जानते , लेकिन अगर उचित न लगे तो स्पष्ट बतलाइएगा . आज नारी को ही लिया है.............


इज्जत तेरी 
समझें दो कौड़ी की 
गिरे लोग हैं  .
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सीख ले अब 
वार करना तू  भी  
खुद को बचा .
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हाथ वही है 
जरूरत है अब 
फौलाद बने।
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भ्रष्ट चरित्र 
श्वेत परिधान है  
मन  काले हैं।
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बेटी जन्मी है 
मुखाग्नि भी देगी वो 
जंजीरें तोड़ो .
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आरक्षण दो 
संरक्षण का वादा  
पूरा करेंगे 
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सुरक्षित हैं 
धरती  पर कहाँ 
कोई बताये 
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भोग्या  का रूप 
क्यों नजर आता है 
बहन भी हैं।
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परदा डाला 
 करनी पे उनकी 
दोषी वही हैं। 
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आधी आबादी 
अब तो जागो तुम   
अस्तित्व रहे।
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आहत मन 
कटाक्षों  के तीरों  से 
छलनी हुआ।
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मन की पीड़ा 
हौसलों की राह में 
रोड़ा न बनें .
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दृढ निश्चय 
आकाश में उड़ान 
भरो जरूर। 
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शनिवार, 18 अगस्त 2012

बहुत भाव खाते हैं !

 



न  जाने कहाँ,
खो जाते हैं वो भाव 
कभी यूं ही चलते चलते 
नींद  में जागते से 
अलसाये से मन में 
जो उमड़ आते है।
मन ही मन 
शब्दों में ढल जाते हैं।
लेकिन 
गर उन्हें तुरत 
शब्दों को लिपिबद्ध न किया 
तो 
फिर वे उन बादलों की तरह 
स्मृति से फिसल जाते हैं,
जो आकाश में उमड़ते हुए 
अपना आकार  बदल लेते हैं।
फिर विलीन हो जाते हैं 
लाख खटखटाओ 
स्मृति के द्वार 
वे वापस नहीं आते 
निराकार से 
फिर साकार नहीं हो पाते 
और हम 
उन्हें चाहे जितने बार 
आवाज दिया करें
 वे भाव भी न 
बहुत भाव खाते हैं 
और 
हमें धता बता कर 
खो जाते हैं।