चिट्ठाजगत www.hamarivani.com

सोमवार, 16 फ़रवरी 2009

सफर

जीवन का यह सफर
बस
एक परिक्रमा है,
बार-बार शुरू होती है,
सुबह से शाम तक
वही गलियाँ औ' रास्ते ,
छाँव भरे पल कब गुजरे
छाँव में पता नहीं चले,
जब फिर धूप मिली
तो कहीं छाँव नहीं थी।
थकते, लड़खडाते कदम
रुक तो नहीं सकते
सफर अभी बाकी है,
चलना औ' चलते जाना है।
किसी छाँव की आस में
बरसों धूप में गुजरे
मुश्किल से
पत्थरों पर जिए,
घावों पर
पैबंद सिये,
विवशता में
खून के घूँट पिए,
बस यही
घाव अपने दिल में लिए,
चलते ही रहे हम।
पर
हर एक परिक्रमा
वही लाकर खड़ा कर देती है
जहाँ से सफर शुरू किया था।
फिर नया सफर
नए आशियाँ की तलाश में
तिनके-तिनके समेटे किसी पेड़ पर
नया आशियाँ बनाना है
सफर अभी बाकी है
औ' फिर चलते ही जाना है.
मंजिल का पता नहीं।
चलना ही नियति है
चलते ही जाना है.

सोमवार, 22 दिसंबर 2008

कामना ! नव वर्ष

नव वर्ष
नव मुकुलित
कलियों सा
खिलने को तैयार।
इससे पहले
विधाता तू इतना
कर दे --
सद्बुद्धि, सद्चित्त , सद्भावना
उन्हें दे दे,
जिन्हें इसकी जरूरत है।
जिससे
कोई भी दिन नव वर्ष का
रक्त रंजित न हो
मानव की मानव से ही
कोई रंजिश न हो,
भय न छलके आंखों में
मन में कोई शंकित न हो,
एक दीप
ऐसा दिखा दो
जिसके प्रकाश में
मन कोई कलुषित न हो,
नव प्रात का रवि
ऐसा उजाला करे
हर कोना सद्भाव से पूरित हो
सब चाहे, सोचें तो
बस खिलते चमन की सोचें
शान्ति, प्यार और अमन की सोचें,
पहली किरण के साथ
फूटे गीत मधुर
जीव , जगत, जगदीश्वर
सबके लिए नमन की सोचें।
नव वर्ष सबको शत शत शुभ हो।

विडंबना

आज अकेले, बीमार, बेवश
चुपचाप पड़ी पर
छत पर लटके पंखे
के हर कोने को देख रही है।
सारी बत्तियां
बुझ चुकी है कब की,
अब तो बंद हो चुकी है,
रसोई में बर्तनों की
खनक भी ,
वह भूखी
शायद कोई पूछे
खाना लाये,
पर यह क्या?
रात गहराती गई
वह भूखे पेट
करवटें बदलती रही
जिन्हें कभी
उठाकर, जगाकर खिलाया था
ख़ुद न सोकर
उनको सुलाया था
वे ख़ुद खाकर
सबको खाया समझने लगे
सब भूल गए।
वे जो भूखे
रहकर भी
उनको माफ कर गए,
एक लीक बना गए।
हम जनक जननी हैं,
क्षमा बडन को चाहिए.....
वाह री
विडम्बना
क्या सारी
मानवता
मेरे ही हिस्से में आई
ख़ुद माफ करो
दुआ दो
यह किस शास्त्र में
लिखा है।
जब वे बदल गए,
तो हम ही क्यों,
उस लीक को पीटते रहें।
बद्दुआ तो नहीं
पर अब दुआ भी तो
निकलती नहीं।
पेट की ज्वाला में
सब कुछ जल जाता है।
बस शून्य और' एक शून्य ही रह जाता है.

मंगलवार, 2 दिसंबर 2008

प्रार्थना जो सुन ली गई!

*मैंने भगवान् से माँगी शक्ति
उसने मुझे दी कठिनाइयाँ
हिम्मत बढ़ाने के लिए।

*मैंने भगवान् से माँगी बुद्धि
उसने मुझे दी उलझनें
सुलझाने के लिए।

*मैंने भगवान् से माँगी समृद्धि
उसने मुझे दी समझ
काम करने के लिए।

*मैंने भगवान् से माँगा प्यार
उसने मुझे दिए दुखी लोग
प्यार करने के लिए।

*मैंने भगवान् से माँगी हिम्मत
उसने मुझे दीं परेशानियाँ
उबर पाने के लिए।

*मैंने भगवान् से माँगा वरदान
उसने मुझे दिए अवसर
उन्हें पाने के लिए।

*वो मुझे नहीं मिला , जो मैंने माँगा था,
उसने मुझे वह दिया, जो मुझे चाहिए था।

***यह पंक्तियाँ मेरी बेटी ने किसी मन्दिर में देखि थीं और वहां से लाकर मुझे दी। देखिये कितनी अच्छी और अर्थपूर्ण पंक्तियाँ है। इनको आप दूसरों तक पहुंचिए। आज सोचा इनकी जगह यही सही है।

गुरुवार, 27 नवंबर 2008

गुमनामी के अँधेरे!

गोली, बारूद और धमाकों
की राजनीति कराने वालो
गुमनाम रहने वालो
कहते हो की हम धर्म के लिए
लड़ रहे हैं ladai।
मत सताओ हमारे वर्ग को
अपने वर्ग का पता तो बताओ
वे कब तुम्हें अपना मानते हैं।
क्यों अपनी कुंठाओं और वहशत को
धर्म और वर्ग का नाम देते हो।
खून के रंग से बता सकते हो
तुम्हारे वर्ग के खून का रंग
कौन सा है?
तुम्हारे धर्म के लोगों
के खून का रंग कैसा है?
तुम्हारी गोलियों से मरे
सिर्फ इंसान होते हैं।
रोते बिलखते परिवार
कोई अपना खोते हैं।
जब देने को कुछ नहीं
तुम्हारे पास उनको
क्यों छीनते हो -- साया उनका
उनकी रोटियों को जुटाने वाला
तुम्हारा क्या बिगड़ा है।
तुम्हारा जो भी धर्म हो
एक तरफ खड़े हो जाओ
खुदा या ईश्वर की दुहाई देने वाले
aavaaz दो
उनको देखना है कि
कितने लोग तुम्हारी जमात में आते हैं।
ये हैवानियत का खेल
इंसानियत को
इस जहाँ से मिटा नहीं सकता है।
खौफ दे सकता है
रुला सकता है
पर किसी के आंसू
पोंछ नहीं सकता है
munh छिपा कर बाहर निकलते हो
नाम तक नहीं है तुम्हारा
दूसरों के इशारे पर
गोली चलने वालो
कभी तुम्हारे भी शिकार होंगे
तुम्हारी ही गोलियों के।
ये धमाके तुम्हारे लिए शगल
घी के दिए जलने सा
जश्न मनाने का दिन
रोटी बिलखती इंसानियत
हिलाकर रख दिया
विश्व के जनमानस को
कहाँ है ये हत्यारे
शायद हममें ही छुपे हैं
वे मानव हो ही नहीं सकते है
सिर्फ हत्यारे हैं
और हत्यारों की कोई जाति नहीं होती
कोई धर्म नहीं होता।

बुधवार, 26 नवंबर 2008

अभिव्यक्ति!

जो कुछ जिया
भावों से लिया
औ' अंकित किया
बंद पृष्ठों की धरोहर
किसने देखी, किसने सुनी।

दिशा मंच की
मुखर अभिव्यक्ति ही
हस्ताक्षर के नाम की
पहचान बन गई,
सबने सुनी सबने पढ़ी।

नहीं पता सराही गई
या फिर आलोचित हुई,
मौन रही या मुखरित हुई
छुआ मर्म या असफल रही
अंतर्वेदना मेरी हर किसी ने सुनी।

औरों की पीड़ा जीकर
शब्दों में ढाल दी
सबसे बाँट ली
कुछ तो दिया उनको ,
कुछ तो लिया उनसे.

धन्य मेरी अभिव्यक्ति हुई
एक प्रश्न बन
मजबूर कर गई मनों को
जो सबने देखी सबने सुनी।

एक अभिव्यक्वी!