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कुछ खो गया!
इस सफर में
कुछ खो गया, या छूट गया,
हर तरफ उँगली उठी -
'दोषी तुम हो,
ध्यान कहाँ रहता है?
कहाँ खोई रहती हो?
गाढ़ी कमाई का पैसा है।'
आँखें बंद किए,
मींच कर ओंठ,
आँसू घुटकती गले के नीचे,
रसोई में खड़ी रोटी सेंक रही थी।
पी गई, सब आरोप, कटाक्ष
जो छोटे और बड़ों ने दिए थे।
एक सवाल उठा जेहन में -
कभी सोचा है मैंने अपना क्या क्या खोया है?
अपनी बेबाक आवाज़ खोई है,
अन्याय के खिलाफ उठती हुई हुँकार खोई है,
वे शब्द खोए,
जिन पर पहरा लगा हुआ है,
अपना सच कहने का हौसला खोया है,
मेरा सच आग के हवाले हो गया,
सच का हुआ पोस्टमार्टम तो
कलम, कागज,शब्द खो गये,
तब भी नहीं पूछा जब -
माँ खो गई,
पापा खो गये,
भाई भी तो खो दिए।
नहीं पूछा किसी ने कि - क्या खो दिया?
मत रो सब मौजूद है।
वो दिखा नहीं जो खोया मैंने,
अपना देख स्यापा मना रहे हैं।
उसको दोषी बना रहे हैं,
जिसने अपराध किया ही नहीं।
अपराधी खुद उँगली उठा रहे हैं।
बेगुनाह पर तोहमत लगा रहे हैं।
