क्या बात है!
इन शब्दों को अक्सर सुना जाता है,
लेकिन
ये वाक्य जेहन में ही आता है,
जब वास्तव में कुछ फ़र्क पड़ता है।
अपने मन बदलने को,
औरों को दिखाने को,
टूट कर सिमटने के भ्रम में जीने को,
या
फिर उस दुख को जीने की हिम्मत बढ़ जाती है।
क्या फ़र्क पड़ता है!
बहुत गहरा अर्थ रखता है।
फ़र्क पड़ने पर,
या कि
एक रिश्ते की नींव दरकने पर,
किसी रिश्ते की चोरी पर,
साथ छूटने पर,
या
रिश्तों में औरों के विष बोने पर
फ़र्क पड़ता है।
हम किसको समझाते हैं,
हम किसको दिखाते हैं,
किस लिए डालते हैं,
एक झूठ का आवरण।
शायद खुद के लिए
क्योंकि
कोई और को वास्तव में कोई फ़र्क नहीं पड़ता है।
सच स्वीकारो
हाँ हम वहाँ कहते हैं
कि
कोई फ़र्क नहीं पड़ता है!
जहाँ हम केवल इस फ़र्क को जीतते हैं।
इसमें घुला हुआ जहर भी पीते हैं।
इन शब्दों को अक्सर सुना जाता है,
लेकिन
ये वाक्य जेहन में ही आता है,
जब वास्तव में कुछ फ़र्क पड़ता है।
अपने मन बदलने को,
औरों को दिखाने को,
टूट कर सिमटने के भ्रम में जीने को,
या
फिर उस दुख को जीने की हिम्मत बढ़ जाती है।
क्या फ़र्क पड़ता है!
बहुत गहरा अर्थ रखता है।
फ़र्क पड़ने पर,
या कि
एक रिश्ते की नींव दरकने पर,
किसी रिश्ते की चोरी पर,
साथ छूटने पर,
या
रिश्तों में औरों के विष बोने पर
फ़र्क पड़ता है।
हम किसको समझाते हैं,
हम किसको दिखाते हैं,
किस लिए डालते हैं,
एक झूठ का आवरण।
शायद खुद के लिए
क्योंकि
कोई और को वास्तव में कोई फ़र्क नहीं पड़ता है।
सच स्वीकारो
हाँ हम वहाँ कहते हैं
कि
कोई फ़र्क नहीं पड़ता है!
जहाँ हम केवल इस फ़र्क को जीतते हैं।
इसमें घुला हुआ जहर भी पीते हैं।
