बेटा
तारणहार
कुल दीपक
और न जाने क्या क्या ?
वर्षों पहले
निकाला था घर से ,
भटकते रहे दर-ब-दर
पनाह दी किसी अनाथ ने ।
अपने अनाथ होने के दुख को
भूल जाने के लिए ,
बहुत प्यार दिया ,
बहुत आशीष लिया ।
इक दिन चल दिये
तो
बेटे को खबर दी ,
आया और संगत में बैठा रहा ।
कांधे औरों ने दिये
बाप की आत्मा
बार बार बाट जोहती रही
अब मेरा बेटा काँधे पर उठायेगा ,
फिर मुखाग्नि देगा ।
आखिर खून है मेरा ,
लेकिन
पता नहीं कब वो तो
रास्ते से वापस हो गया ।
तारणहार
कुल दीपक
और न जाने क्या क्या ?
वर्षों पहले
निकाला था घर से ,
भटकते रहे दर-ब-दर
पनाह दी किसी अनाथ ने ।
अपने अनाथ होने के दुख को
भूल जाने के लिए ,
बहुत प्यार दिया ,
बहुत आशीष लिया ।
इक दिन चल दिये
तो
बेटे को खबर दी ,
आया और संगत में बैठा रहा ।
कांधे औरों ने दिये
बाप की आत्मा
बार बार बाट जोहती रही
अब मेरा बेटा काँधे पर उठायेगा ,
फिर मुखाग्नि देगा ।
आखिर खून है मेरा ,
लेकिन
पता नहीं कब वो तो
रास्ते से वापस हो गया ।
