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शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

हाइकू !

क़ानून तेरा 
मुझे क्या न्याय देगा ?
खुद करूगी।
*******'
चेहरे ढके 
क्या गुनाह छिपेगा ?
धिक्कारते हैं।
*******
मशालें जलीं 
ज्वालामुखी न बनें 
हदें जान लो।
*******
कैद कर दो,
सिफारिशे हो रही 
हदें जान लो। 
*******
हमारे लिए 
इतिहास की बात 
खुद खुदा हैं। 
********
उड़ाते हैं वे 
कीचड हम पर 
सने खुद हैं।
********
वे चाहते है  
हम भटक जाए 
इस जंग से .
*******
इस जंग में 
हौसले से लड़ना 
जीत हमारी।
********


मंगलवार, 8 जनवरी 2013

रक्तबीज और महाकाली !



मैं  "दामिनी "
तुम्हें चुनौती देती हूँ ,
मैंने अपना बलिदान दिया
या फिर तुमने
मुझे मौत के हवाले किया हो ,
तब भी मैं
अब हर उस दिल में
जिन्दा रहूंगी,
एक आग बनकर ,
जब तक कि 
इन नराधम , अमानुषों को
उनके हश्र तक न पहुंचा दूं।
सिर्फ वही क्यों?
उस दिन के बाद से
मेरी बलि के बाद भी
अब तक उन जैसे
सैकड़ों दुहरा रहे हैं इतिहास ,
वो इतिहास जो
मेरे साथ गुजरा था
रोज दो चार मुझ जैसी
मौत के मुंह में जाकर
या फिर
मौत सी यंत्रणा में
जीने को मजबूर हैं।
वे तो अभी दण्ड के लिए
एकमत भी नहीं है ,
और हो भी नहीं पायेंगे .
क्यों?
इसलिए की उनके अन्दर भी
वही पुरुष जी रहा है,
क्या पता
कल वही अपने अन्दर के
नराधम से हार जाएँ ?
और वह भी
कटघरे में खड़े होकर
उस दण्ड के भागीदार न हों।
अभी महीनों वे
ऐसे अवरोधों के चलते
और ताकतवर होते रहेंगे।
अब मैं नहीं तो क्या ?
हर लड़की इस धरती पर
महाकाली बनकर जन्म लेगी
और इन रक्तबीजों के
लहू से खप्पर भरकर
बता देंगी कि
अब वे द्रोपदी बनकर
कृष्ण को नहीं पुकारेंगी।
खुद महाकाली बनकर
सर्वनाश करेंगी।
इन रक्तबीजों के मुंडों की माला
पहन कर जब निकलेगी
तो ये नराधम
थर-थर कांपते हुए
सामने न आयेंगे .
हमें किसी दण्ड या न्याय की
दरकार होगी ही नहीं,
वे सक्षम होंगी
और समर्थ होंगी।
ये साबित कर देंगी।
ये साबित कर देंगी।

सोमवार, 7 जनवरी 2013

सर्द इरादों से आगे !

सर्द दिन और सर्द रातों में
हौंसले सर्द नहीं  दिखते हैं ,
हम अड़े है उनके अंजाम पर
जो आज भी सर्द रातों में भी
 कांपते नहीं है गुनाह करने से.
हम भी अपने इरादों को अब
कमजोर कभी नहीं  पड़ने देंगे
उन्हें उनके गुनाहों की सजा
मुक़र्रर करवा कर ही दम लेंगे .
उनके आका गर ढल बन कर
खड़े हों तो क्या हमारी तलवारें
भय से अब टूटने वाली नहीं है।
उन जैसों का जुर्म सिर्फ एक सजा
मौत ही क्यों न हो नहीं मिटा  सकती  है ,
उन्हें सजा देने  के लिए क्या सोचें ?
तिल तिल मरने की सजा भी कम है।
 न  जाने कितनी "दामिनी " आज भी
तिल तिल मर कर जी रही हैं।
उन सबके गुनाहगार हाजिर हों
चाहे वे कोई भी क्यों न हो?
दंड तो उन्हें एक ही मिलेगा अब
वह न्याय अब उनकी  मर्जी से नहीं
हमारी मर्जी से  ही निर्णीत होगा .

मंगलवार, 1 जनवरी 2013

आगत का हो स्वागत !

आगत का हो  स्वागत , विगत की करें हम  विदाई ,
शांति के पुजारी हम खड़े हैं करने को न्याय की लड़ाई ।

रास्ते अपनी जिन्दगी का , हम सब कर रहे है तलाश 
इंसान में इंसान के प्रति , कुछ तो शेष रहें  अहसास ।

नहीं पता हमको , न्याय की ये जंग कहाँ  तक जायेगी ?
दिलों में लगी ये आग, कब तक जलेगी या बुझ जायेगी।

शक्ति है हमारी आवाज में औ'  बुलंद ही रखें साथ में ,
 मशाल भी अब तो  न्याय पाने तक रहेगी हर हाथ में।

चाहे वो हम टूट जाएँ किसी की सांस की तरह थक कर ,
समझे नहीं वो जज्बे को , सांस भी न लेंगे हम रुक कर ।

न्याय चाहिए बदले केलिए नहीं हम लिए मशाल खड़े हैं ,
अब  और आगे भी न हो कोई दिन ऐसा इस पर  अड़े हैं।

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

मैं ... मेरी चाह ...!

उन सब की  फाँसी 
जिन लोगों ने 
कर तो दी 
मेरी अस्मत तार तार 
मेरी पीडाओं को 
मेरी  इस त्रासदी को 
मेरे टुकडे टुकडे जिस्म को 
फिर से जोड़ पायेंगी  ?
मुमकिन है  कल मैं न रहूँ   
और ये वहशी फिर 
सड़क पर 
भूखे भेड़िये  से 
और शिकार  खोजेंगे 
लेकिन मेरी  मौत के बाद  भी 
ये जंग जारी रखनी होगी 
 मेरी मौत या शहादत 
इस  पर 
विराम तो नहीं लगा सकती 
फिर भी  
मेरे बाद भी 
सैकड़ों, हजारों और लाखों 
बेटियां और बहनें इस धरती पर   
शेष रहेंगी . 
लेकिन
उन्हें बचा लेना ,
ऐसी कोई  घटना फिर न हो,
ऐसे  नराधमों को 
ऐसा दण्ड देना 
कि कोई और न 
मेरी तरह  से फिर बलिदान हो।
इनकी हवस का  शिकार  हो। 
अभी  बाकी है 
जिजीविषा मेरे मन में 
अब जियूंगी भी  
पर  कैसे और कैसे ?
न मैं जानती हूँ ,
और न वे 
जो मुझे बचाने में
दिन रात जुटे हैं .
मैं रहूँ न रहूँ ,
फिर किसी को 
जिजीविषा के रहते 
 मरना न पड़े ,
 ख़त्म हो सके 
गर ये कुकृत्य 
तो फिर मेरी  शहादत 
एक नयी सुबह के लिए 
याद की  जायेगी। 
नहीं  चाहती कि 
गीता ,  अरुणा के साथ मैं भी 
आहुति की समिधा  बन कर 
यज्ञ  को  पूरा  न कर पाऊं .
समिधा मैं  बन जाऊं 
यज्ञ तुम लोगों को पूरा करना है .
 करोगे न , फिर वादा करो 
अब कोई नहीं  मेरी तरह से।


शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

आप ?

कीचड़ में पत्थर फ़ेंक कर भी 
खुद को पाक कह रहे हैं आप ?

दूसरों पर अंगुली उठाये हुए देखा  ,
तो फिर निर्दोष भी कब रहे हैं आप ?

बहुत आसन है तोहमत लगा देना 
बेकुसूर इससे भी कब रहे हैं आप ? 

वे गुनाह किये थे ये  किस्मत में था ,
गुनाहगार बताकर क्या कर रहे हैं आप ? 

बहुत गम है दुनियां में रोने के लिए 
दूसरों को ग़मगीन क्यों कर रहे हैं आप? 

लफ्जों के तीर जहरीले बहुत होते हैं,
दूसरों को घायल क्यों कर रहे हैं आप ?

कुछ तो ऐसा कीजिये जिन्दगी में 
सुकून औरों को जैसे दे रहे हों आप  ?

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

हाईकू !

ज्ञानशून्य है 
आरक्षण की माया 
खुद देख लें।
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अब मिलती 
मानवता धरा पे 
दम तोड़ती .
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आरक्षण दे 
संविधान है पंगु 
वे शक्तिमान .
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कुछ यथार्थ 
इतने कटु होंगे 
फंसे गले में 
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ये बचपन 
रस्सियों के सहारे 
झूल रहा है .
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पेट के लिए 
गिरवी बचपन  
भूखा सो गया . 
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भीख माँगते 
बाप बेटे बेटियां 
धंधा जो है न 
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