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गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

क्या भूलूं क्या याद करूँ ?

जीवन के इस मुकाम पर
क्या भूलूं क्या याद करूँ?

कल की बात रही हो जैसे,
आँखों के बिखरे सपनों जैसे,
तैर रहे हैं सब मन दर्पण में,
लौटा दो ये किससे फरियाद करूँ?

समझ नहीं aआता है अब भी,
क्या भूलूं क्या याद करूँ?

मन में छिपा कर रख छोड़ा है,
यादों के तिनके तिनके को
नजर बचा कर झाँक लिया हैं,
क्यों नाहक कोई विवाद करूँ?

जीवन तो गुज़रा है झूले में,
क्या भूलूं क्या याद करूँ?

आँखों के सुंदर सपनों को
तुमने ही धुंआ धुंआ किया,
किससे पूछूं रास्ता इसका ,
फिर दुनियाँ से जेहाद करूँ?

 याद है हर मील का पत्थर
क्या भूलूँ क्या याद करूँ?

यादों के कुछ पैबंद बचे हैं
कुछ उजले कुछ धुंधले से,
गीतों के टुकड़ों में लिखे थे
पर अब कैसा प्रतिवाद करूँ?

जीवन दोराहे पर खड़ा है

क्या भूलूँ क्या याद करूँ?

सोमवार, 14 फ़रवरी 2011

सिर्फ अहसास !

प्यार वो अहसास है
जिसको सिर्फ और सिर्फ
दिल महसूस करता है,
फिर वो दिल
जरूरी तो नहीं कि
सिर्फ 
प्रेम करें जिससे उसका ही हो.
प्यार माँ की ममता में बसा है,
भाई भाई भी प्यार में बंधा है. 
प्यार बहन के स्नेह में बसा है,
प्यार तो 
 दोस्त की उस दोस्ती में भी निहित है 
जो हर सुख दुःख में साथ होता है.
फिर क्यों आज,
उस प्यार को बांधने के लिए
हदें बनायीं जा रही हैं.
क्यों इल्जाम उनके नाम जा रहा है? 
जो उम्र की उस दहलीज पर खड़े हैं
जिसे युग ने सदा 
संदेह के नजर से देखा है.
ये सिर्फ आत्मा से जुड़ा है,
दिल से रिश्ते तो बाद में बनते हैं.
वो कल टूट भी सकते हैं 
लेकिन 
वो प्यार जो सिर्फ अहसास है
कभी टूटता नहीं है,
दूर हों या पास 
मिलें या फिर बिखर जाएँ,
उस अहसास से मुक्त 
कभी नहीं होते हैं.
बस वही अहसास जो कभी 
मरता नहीं है, 
इसी लिए कहते हैं कि 
प्रेम अजर अमर है. 
हर युग में
हर काल में
हर देश में
हर मजहब में
अगर इंसान हैं तो
ये अहसास वही होता है
उसी रूप में पलता है.
रिश्तों का नाम से
इसको इल्जाम न दो.
अगर प्यार दोगे तो मिलेगा.
मुफ्त में तो कोई
भीख भी नहीं देता. 

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

बदनसीबी !



जब बहुत पास से  
गुजरे तुम
तुम्हारी खुशबू 
मेरे चारों तरफ फैल गयी.
गहरी श्वास भरी
और अहसास तुम्हारा होते ही,
आवाज दी -- कहाँ हो तुम?
आवाज तो निकली 
लेकिन फिर वो 
टकरा के बादलों से
चारों तरफ  गूँजने लगी .
गूँजती रही
फिजां में बहुत देर तक
बस 
मिलने की घड़ी न आई
आँखों में 
आँसू लिए अफसोस के
जा बैठी खिड़की में
फिर
मायूस , खामोश मेरी आवाज
वापस मेरे पास आ गयी
तुमसे मिले बगैर
शायद मिलना नसीब में न था.

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

क्या कर रहे हैं आप?

बहुत आसान है कीचड़ औरों पर उछालना,
छींटे से अपने दामन को क्यों रंग  रहे हैं आप?

इंसानियत नहीं है  तोहमत लगाना किसी पर,
बेकुसूर इस तरह से  भी कब बन  रहे है आप? 

वे गुनाह किये हैं ये किस्मत की बात थी,
गुनाहगार बताकर ये क्या कर रहे हैं आप?

अंगुली तो उठी है बेकुसूरों पर भी,
अपनी तरफ अंगुलियाँ क्यों उठा  रहे हैं आप?

बहुत गम है दुनियाँ में रोने के लिए,
दूसरों को ग़मगीन  क्यों बना रहे हैं आप ?

लफ्जों के तीर जहरीले बहुत होते हैं,
दूसरों को घायल उनसे क्यों कर रहे हैं आप? 

सोमवार, 17 जनवरी 2011

मानव और मानवता

मानव औ' मानवता
सिर्फ भाषण में अच्छे लगते हैं.
या फिर  किताबों की नीति कथा के
उपदेशों में ही सोहते हैं.
अखबारों की सुर्ख़ियों तक
सीमित अच्छे होते हैं.
मैं देखा है -
मानवता के पुजारियों को
दया और करुणा की मूर्तियों को
जहाँ जरूरत होती
प्राण - पण से लगते देखा है.
दूसरे के दर्द को
अपना समझ कर हरते  देखा है.
लोगों को उनका
फायदा उठाते देखा है.
क्या फर्क पड़ता है?
काम निकाल कर
दो शब्द 'वाह वाह ' कह देने में.
ऐसा लोगों को कहते देखा है.
ऐसा नहीं इंसान वह भी है,
अपेक्षा तो नहीं की ,
फिर भी
जब खुद वक्त की चपेट में आया
हौसला तो नहीं खोया था
अकेले ही उसने
अपने का शव ढोया था.
कोई नहीं आया उनमें से
वक्त भी निकल गया.
जिसने फिर कहीं देखा उसको
'यार सुना तो था , पर बहुत बिजी' था.'
'मुझे खबर बाद में मिली.'
'बाहर था कैसे आता?'
'मैं बीमार था आ नहीं सकता था.'
कोई बात नहीं
अब तो वक्त गुजर गया
बस जेहन में
एक सवाल ठहर गया -
लोग मानव को बेवकूफ समझ कर
फायदा उठाते हैं.
मानवता की छाया में बैठ कर
लोग धूप से बच सकते हैं,
किन्तु इस छायादाता को
कोई छाया नहीं मिलती है.
कौन सी छत मिलेगी?
इससे बड़ा मानव नहीं
तो मानवता किससे चाहेंगे ?
बस कहने की बाते हैं
भला करो भला होता है,
अच्छा करो अच्छा मिलता है.
पर यहाँ तो
करने वाला ही सब कुछ खोता है
बाकी जग चैन से सोता है.
अब जरूरत है कि
इन दोनों शब्दों को
फिर से परिभाषित किया जाए,
मानव और मानवता को
मानव के जीवन के
शब्दकोष से
हमेशा के लिए मिटा दिया जाए.

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011

खोया अतीत !

हम साथ ही चले थे,
रहना भी साथ ही था,
मगर 
वक्त की बेरहम आंधी 
कहाँ से कहाँ ले गयी?
हम फिर चल दिए 
नए रास्ते पर 
जो नियति ने हमें दिए थे.
हम बेखबर हो गए,
तुम हमसे औ'
हम तुमसे 
पता नहीं कैसी नियति थी?
एक मुकाम पर
फिर मिले हम
आँखें झपकाकर बार बार
देखा था - एक दूसरे को 
एक युग के अन्तराल ने 
सब कुछ बदल दिया था.
जब देखा एक दूसरे को
आँखें डबडबा आयीं.
शायद ये आत्माओं का अहसास था.
समझ गए हम दोनों,
दोस्त तुम वही हो
जिसको हमने खोया था.
आँखें पोछी, हाथ हिलाए
और चल दिए अपने रास्तों पर.
एक सुकून सिर्फ देखने का
पता नहीं कितनी शांति दे गया.
सकुशल तो हो
सब कुछ बदल गया
बस याद कहीं शेष थी अंतर में.
होंठ मुस्करा दिए,
सलामत रहो
ये दुआ है हमारी,
मिलेंगे फिर कभी
इसी तरह राहों में
क्योंकि जिन्दगी के रास्ते 
मुस्तकिल नहीं होते.
ठिकाने भले दूर हों
इरादे  मुश्किल नहीं होते.

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

नव वर्ष के संकल्प !


बीते दशकों इसी तरह
नव वर्ष के आते जाते , 
इस वर्ष कुछ ऐसा मनाएं,
संकल्पों के दशक बना लें.

दीप ऐसा एक मन में जला लें,
कलुष मिटाकर धवल बना लें.

दृढ स्तम्भ बने हम ऐसा 
थाम जिसे निर्बल पल जाएँ.

ज्योति प्रेम की ऐसे चमके,
कटुता की कालिख मिट जाए.

एक धर्म की बात करें हम,
मानव ही मानव हो जिसमें.

अमन-चैन औ' खुशहाली में,
हर्षित हो जीवन दिन पर दिन.

बाँट सकें दुःख दर्द किसी का,
आँखों की हम नमी  सुखा दें.

भटक गए जो कदम बहक कर,
उनको सही मार्ग दिखला दें.

सम्मान सभी को दें हम इतना,
हम भी इसके अधिकारी बन जाएँ.

समता का भाव रहे मन में,
मित्र शत्रु के भेद  भुला दें.

चाहे जितने शूल हों पथ पर,
राहों को हम सुगम बनायें.

चाहूं बस इतना ईश्वर से भी,
इन संकल्पों को पूरा कर पायें.