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रविवार, 11 जुलाई 2010

कैसे बचाएं बेटी तुम्हें!

कहाँ से लायें हम
संगीनों के साए
जिनके तले
महफूज़ रखें
अपनी बेटियों को.
पहले तो जन्म से पहले ही
घर वालों की नज़रों से दूर
कोख में पालना दूभर
हाँ अभी भी
हम वहीं हैं
बेटे की कामना में
बलि देने को तैयार
जैसे खाने दाँत और
दिखाने के कुछ और.
फिर जन्म ले लिया 
तो उसके बचपन में भी
प्यासी हैवान आँखें
आस पास मंडराती हैं.
गर पा गए तो
क्षत विक्षत कर दिया
फिर भी मन न माना तो
मौत की नींद सुला दिया.
इन घिनौने चेहरे पर
अपनों के भी नाम लिखे हैं
चाहे जैसे सही
गर्भ में मारा
जन्मते मारा
बच्ची में औरत की तलाश में मारा
या फिर
अपनी शान में मारा.
हत्यारे में वे भी शामिल हैं
जिनको  तोतली बोली में
रिश्तों का नाम देती थी
या देनेवाली थी
पर
वह लड़की थी
जीवन उसको  नसीब न था
भ्रूण ,बच्ची या युवा
बेटी बचाई तो
बहू को डस लिया
आखिर खा ही जाते हैं
वे जो बहुत अपने होते हैं.

शनिवार, 10 जुलाई 2010

ये बलात स्वयंभू!

आवाज की गरजती ध्वनि
गूँज जाती है
घर - आँगन में,
सहम जाते हैं
जीव जंतु ही नहीं
मानव कहलाने वाले
वे सभी लोग
जो लघु की सीमा में बंधे हैं.
किन्तु
ये गरज बयान करती है
अपनी कहानी खुद ही
साथ ही तुम्हारा मनोविज्ञान भी
कहीं कोई कुंठा
सर्वोच्च होने का अहसास
बार बार विवश करता है
अपनी विशालता की मुहर पर
स्याही लगाने के लिए
गरजते तुम
पर अपने अन्दर दबी
किसी हीनता से ग्रसित होकर
चीखते हो
कि मैं सर्वोच्च हूँ.
किन्तु भय से / दौलत से
सम्मान खरीदा  नहीं जाता
प्यार बटोरा नहीं जाता.
ये स्वयंभू होने के अहंकार
तुम्हें और नीचे गिरा देता है.
कोरे अहंकार से ग्रसित
अभिशप्त है तुम्हारा जीवन
और ग्रहण हो तुम
औरों के लिए
ग्रस रखा है तुमने
उनकी खुशियों, हंसी और सुख चैन को
कब मुक्त होगे?
कब सब लेंगे सुकून की एक सांस.
कब सब जियेंगे सुकून से
भय मुक्त जीवन.

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

मेरी प्यारी बिटिया.!

फूलों सी कोमल
रंगों सी मोहक
इन्द्रधनुष सी सजीली
बेला मोगरा सी महकती
दुलारती, इठलाती
गुडिया सी वो
है सबकी आँख का तारा
मेरी प्यारी बिटिया.
बरसाती वो प्यार
पाती वो प्यार
बस एक
हमारा घर ही तो है,
जिसमें हर आँख की किरकिरी है
क्यों वो ऐसी  है?
बेटी है तो
बंद दरवाजों की दरारों से
सांस लेने का हक है उसको
जितनी गहरी वे कहें
उतनी ही सांस ले
और वो
दरवाजे खिड़कियाँ तोड़कर
मुक्त जीना चाहती है.
मैं भी चाहती हूँ
इसीलिए
इस घर में
सबसे बड़ी गुनाहगार
मैं ही हूँ.
अपना सा जीवन
उसके हिस्से में डालूँ
कभी नहीं
जननी हूँ तो
उसकी भाग्य विधाता भी बनूंगी.
वह सब दूँगी
जिसके लिए मैं तरसी हूँ
इस विशाल अन्तरिक्ष को
उसकी प्रतिभा के सूर्य से
जगमगाना है
बेटी है तो क्या?
मान उसको मेरा बढ़ाना है.
मान उसको मेरा बढ़ाना है.

बुधवार, 23 जून 2010

कितना विरोधाभास !

बादलों की गर्जन
बारिश की टप टप
जंगल में नाचते मोर
गलियाँ भरी
पानी में भीगते 
बच्चे मचाते शोर,
किसानों  के चेहरे पर
खिल रही हैं मुस्कान, 
प्यासी धरती की
अब बुझेगी प्यास
हल चल सकेंगे
रोपेंगे धान. 
पर वही 
कहीं झोपड़ी में
सुमर रहे 
भगवान  को
कहीं ये पानी और बादल 
कहर बन न जाय  .
टप टप टपकती खपरैल 
उस पर पड़े पालीथीन के टुकड़े 
और शोर कर रहे थे.
उतनी तेजी से 
कई जोड़ी हाथ 
प्रार्थना कर रहे थे.
इस  बारिश को अब 
बंद कर भगवान
कहीं सिर का सहारा 
न छीन जाए.
कितना  विरोधाभास 
किसी का जल जीवन 
औ'
कहीं नरक न कर दे जीवन.
कहाँ जायेंगे?
बरसते सावन में
कहाँ सिर छुपायेंगे  .

गुरुवार, 17 जून 2010

जीवन वृक्ष !

नव पल्लव सा
अद्भुत बचपन
और चले
दो चार कदम तो
डाल पकी औ'
बन गया पौधा,
अपने पैरों खड़ा हुआ
फिर   तो
जीवन के चरणों सा
नित नव विकसित
किशोर, युवा सा
वृक्ष  वही सम्पूर्ण हुआ.
शाखों पे शाखें
पल्लव की उस घनी छाँव में 
अपने ही पौधों को पाला
आया माली काट ले गया
अपने से अलग कर गया 
औ' फिर 
दूर दिया था रोप उन्हें
दूर सही
थे तो वे अपने ही सामने.
देखा  उनको बढ़ते
लदते पल्लव औ' पुष्पों से
फलों से लदकर
झुक गए कंधे
हवा चली
फिर आई ऐसी आंधी
सारे पत्ते  दूर हो गए
बने ठूंठ हम
आज खड़े हैं
अपनी ही पहचान भूल कर.

पल्लव  ही थे पहचान हमारी
नाम हमारा शेष कहाँ
किस पल आये अंधड़ मौत का
औ' हम यहीं कब बिछ जाएँ.

शुक्रवार, 11 जून 2010

एक अंतहीन इन्तजार...........!

इन्तजार
किसी अच्छे पल का
कितना मुश्किल होता है?
लगता है
ठहर गयी काल की गति
सुइंयाँ रुक गयीं
सूरज और चाँद भी
रुक गए हैं
किसी इन्तजार में.
बयार गगन में सहमी सी
किसी संकेत के इन्तजार में
अधर में लटकी सी
त्रिशंकु बनी है.
और हम
सांस थामे
देख रहे हैं
ऐसे काल परिवर्तन की राह
जिस काल में
रामराज्य हो न हो
महाभारत सा 
अपमान, षडयंत्र औ'
विनाश न हो ,
जहाँ गीता के उपदेश
सिर्फ पांडवों को
समझ आते हैं,
कौरवों की सेना तो
सिंहासन की  चकाचौध में
जय हो, जय हो,
के साथ अनुगामी बनी है.
वह परिवर्तन
सोचते हैं
पतझड़ हो कुविचारों की
विचारों में क्रांति हो.


और नव पल्लव की तरह
सुरचिता अपने नव रूप में
बसंत सी खिल उठे.