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सोमवार, 7 जून 2010

कैसी ये ख़ामोशी ?



आजकल खामोश क्यों?
कलम तेरी,
क्या जज्बा संघर्ष का
कुछ डिगने लगा है?
या फिर
अपनी लड़ाई में
बढ़ते कदमों के नीचे
बिछाए गए 
कुछ काँटों की चुभन
डराने लगी है.
कुछ इस तरह 
रखो कदम
चरमरा के पिस जाएँ,
कांटे क्या लोहे की सलाखें भी
जज्बों के आगे
मुड़कर बिछ जायेंगी.
कटाक्ष, लांछन,
हमेशा श्रंगार बने 
जब अपनी तय
सीमायों से परे
किसी नारी ने
कुछ कर दिखाया है
उंगलियाँ उठती रहीं  हैं
आखिर कब तक
उठेंगी
अपनी मंजिल की तरफ
चुपचाप चला चल
जब मिलेगी 
विजय की ध्वजा
ये उंगलियाँ
झुककर
तालियाँ बजायेंगी
कामयाबी के सफर में
सब साथ होते हैं.
संघर्ष की राह 
कठिन तो है लेकिन अजेय नहीं.
मेधा, क्षमता , शक्ति और धैर्य
सब तो तुम में है
विजय पताका भी तुम्हारी ही होगी. 
विजय पताका भी तुम्हारी ही होगी.

बुधवार, 2 जून 2010

लिखा नहीं जाता !

गीत और ग़ज़ल लिखे नहीं जाते
लिख जाते हैं,
कौन सा पल, 
कौन का निमिष ,
मन के दर्पण पर
छोड़ दे एक लीक
और मन
भावों की लड़ियाँ, 
अक्षरों के मोती पिरोकर
शब्दों के हार 
बनाने लगता है.
जब सब ख़त्म हो जाएँ
तब उठाकर देखो
कुछ न कुछ
अंतर्वेदना हो या उल्लास
एक रचना बन जाती है.
विरह हो या श्रृंगार 
सब कुछ
समाकर अपने में
मन को शांत कर जाती है. 
और मन एक कोरा कागज़ सा फिर
खोजने लगता है 
किसी नयी रचना के लिए
कोई नया भोगा हुआ यथार्थ.

शनिवार, 29 मई 2010

ये हादसों की इमारत !

ये जिन्दगी
हादसों की इमारत है,
जिसकी एक एक ईंट के  तले दबे
इस जिन्दगी के
कुछ न भूलने वाले 
हादसे ही तो हैं.
इसको आकार देने में
कभी मन से
कभी बेमन से
दायित्वों को ओढ़े 
ख़ामोशी से
यंत्रवत सक्रिय
ये हाथ और पैर चलते रहे .
मष्तिष्क और ह्रदय 
मेरी धरोहर थे ,
जो अपनी वेदनाओं से
कोरे कागजों को रंगते रहे.
ये ही मेरी शक्ति है,
ज्वालामुखी -
जो धधक रही है,
विस्फोट न हो
सर्वनाश न हो
इसीलिए तो
ये छंद रच रहे  हैं.
तमाम आक्रोश, विवशताओं की देन 
आंसुओं का जहर 
कहीं मुझे ही न मार दे
बस इसी लिए 
ये जो सृजन  है
वह आक्रोश औ' विवशता को
नए पंख दे देता है
और मन 
हल्का  होकर
फिर उड़ान भरने के लगता है. 


शुक्रवार, 28 मई 2010

किसी की आँख का आँसू!


आँख से आँसू 
किसी के 
यूं ही नहीं झरते
दर्द को पीकर 
जुबान जब थाम लेते हैं 
सिसकियों के खौफ से
गम को दबाते ही
किसी के आँख से 
रुकने का नहीं नाम लेते हैं।
पार्क की एकांत बेंच पर
सुनसान सा कोना पकड़कर
चुपचाप पी गरल 
अपमान औ' तिरस्कार का
इस तरह से दिल हलकान होते हैं ।
नजर पड़े उन पर
कभी
घर की सीमा में
बंद करो नाटक
सुनने से भयभीत होते हैं।
अपनों के दिए 
दर्द की कसक
किस पर बयां करें
इस तरह से आँसू 
गिराकर दिल थाम लेते हैं।
याद कर उनकी अठखेलियाँ
कभी लव मुस्करा जाते हैं
तैर जाती है हंसी
पर अगले ही पल 
याद उस पल की
उनसे हंसी छीन लेते  हैं।
एक बहस से बेहतर है
कुछ पल बिता लें
साथ उनके
बाँट लें थोड़ा सा गम
प्यार से डूबे स्वर
उस गम से उबार लेते हैं।

बुधवार, 26 मई 2010

ये दर्द बयां करती है !



ऐसा नहीं कि 
जो ये कलम चल रही है,
हर दिशा में 
आग उगल रही है.
नाहक  ही बन्दूक सी
हर समय गरजा करती है.
कभी इसके दर्द को समझो,
ये सच है
कि ये लिखती यथार्थ है
मगर 
ये कोई न कोई दर्द बयां करती है.
चाहे वे शब्द
स्याही की जगह
आंसुओं से सने हों
शब्दों ने दर्द को
जीकर ही
कराह अपनी जो सुनाई
तभी तो वह विष वमन करती  है.
सुनती है कितनी जबानों से
दर्द से सराबोर दास्तानें 
उन्हीं में डूब कर
दर्द के अहसास को 
पहले जीती औ'
फिर दास्तान  बयां करती है.

मंगलवार, 25 मई 2010

हाशिये में दर्द !


दर्द को हाशिये में डालो,
मुस्कानों के 
सिलसिले से 
एक इबारत नयी लिखो,
उनके बीच बस
बिंदियाँ दर्दों की हों.
गर मुस्कानें  कम लगें
खोज लो  बचपन में
निर्दोष, खामोश 
जिंदगियों में  और
उनको बाँट लो
जग के सारे गम
उनके सामने 
बहुत छोटे पड़ जायेंगे.
मुस्कानों की चमक  में
गम कहीं दब जायेंगे
खिले चेहरों पर
गर
कहीं संजीदगी आती भी है
मुस्कराओ और मुस्करा कर
सारे ग़मों को बाँट लो. 
आंसुओं  से  भरे  चेहरे 
मुसकान  से  भर  जायेंगे . 

शनिवार, 22 मई 2010

पत्थर बना दिया !



सोचती हूँ अब भी 
न जाने क्यों,
वक़्त के थपेड़ों ने मुझे
पत्थर बना दिया.
थी तो मैं 
समंदर के किनारे की रेत
जिसने रखे कदम 
दिल में समा लिया.
प्यार के अहसास से
इतना सुख दिया
हर आने वाले को
अपना बना लिया.
अब मगर 
बात कुछ और है
बोले बहुत बोल 
ज़माने ने इस तरह
पत्थरों पर भी
कभी दूब उगा करती है.
उन्हें पता कहाँ है
कि पत्थरों के गर्भ में
नदियाँ भी पला करती हैं.
जमीं पर जो है
नदियाँ 
पहाड़ों से
जमी पर गिरा करती हैं.
कोई  बताये उनको
लोग बदल गए हैं
फिर भी ये निर्जीव
पत्थर
इंसान से बेहतर हैं
ये तो नहीं कि
सीने से लगा कर
खंजर चुभा दिया.
देखा किसी तृषित को
पत्थर ने सीना तोड़ कर
ममता औ' स्नेह का 
अविरल सोता बहा दिया.
फर्क  नहीं उसको
चाहे कोई उठाकर
मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारे 
की दीवार पर रखे
या फिर
किसी की कब्र पर सजा दिया.