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शुक्रवार, 8 मई 2020

ऊँ त्र्यम्बकं.....!

दर्द और डर
दोनों में नींद नहीं आती है,
दर्द तो इंसान का अपना ही होता है
और भय
वह तो न जा रहा है
बहुशंका और कुशंकाएँ
उपज है।
रात की खामोशियों के बीच 
कुत्तों के सामूहिक रुदन से
मन काँप ही तो जाता है।
और भयभीत मन
महामृत्युंजय के मानसिक जप में
आँखें मूँद कंर जुट जाती है।
फिर से I
ट्रैक पर सोते मजदूर
जो सोते हुए शव हो गये।
अपना दर्द भूल जाना
अहसास उनके परिजनों का
बन कर आँसू दोनों ओर लुढ़क जाते हैं।
याद आती है अपनी बेटी की तस्वीर
पीपीई किट में 
किसी गोताखोर की तरह
और फिर से बंद करके -
"हे ईश्वर सबकी रक्षा करो।"
फिर से आश्वस्त है कि 
उन्होंने कवच पहना सबको दिया
आँखें मूँद कर सोचती है
अवतार में लाखों की मौत
किसी न किसी बहने से
ये त्राटक
क्या प्रलयंकर का कोप है?
यही प्रलय है।
चेत गए तो जियेंगे
नहीं तो मृत्यु की धारा को धारण करने के लिए
कोई शिव तो बैठा होगा कहीं
आइये आह्वान करें -
ऊँ त्र्यम्बकं यजामहे ……।

11 टिप्‍पणियां:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

भय को हराकर ही ऐसी स्थिति से बाहर आया जा सकता है

दिगम्बर नासवा ने कहा…

ईश्वर का मार्ग हर भय से मुक्ति दिलाता है ...
वही सर्व शक्तिमान है ...

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

आभार।

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

आभार।

Kishor se milen ने कहा…

सच, चेत गए तो ही जिएंगे। सुंदर सृजन। साधुवाद

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शनिवार 09 मई 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

पवन शर्मा ने कहा…

आप स्वास्थ्य लाभ करें...कामनाएं हमारी भी।
हम लोग दुर्घटना के बाद व्यवस्थाओं और व्यक्तियों में दोष ढूँढ़ते हैं...कुछ दिन बाद भूल जाते हैं जैसे रावण दहन के समय रेलगाड़ी से दुर्घटनाग्रस्त जन समूह का आर्तनाद। ये बात उस समय भी उठी थी कि रेलपथ आमजन के लिए प्रतिबंधित होता है। बात इतनी सी है...इस नियम को कोई भी महत्व नहीं देता। देना शुरु करें तो ऐसी घटनाओ की पुनरावृृृत्ति न हो।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

वर्तमान परिवेश में उपयोगी रचना

Enoxo ने कहा…

एक अद्भुत रचना

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

बेहद भावपूर्ण रचना.

Daisy ने कहा…

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