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शनिवार, 14 जुलाई 2012

मौन और मौन !

मौन 
कर   जाता है 
अनर्थ 
सच सच   होकर भी 
मौन की गहराई में 
खामोश रह जाता है .
बात  अर्थ खो देती है 
सच का सफेद आवरण 
मौन के अँधेरे से 
धूमिल सा हो जाता है। 
भ्रम 
सच और झूठ के  बीच 
 इस तरह फैल जाता है 
कि 
सच को  अलग नहीं हो सकता ,
फिर  सब 
जो असत्य आरोपों के 
दावेदार  हैं  
जीत जाते  हैं।
ऐसा मौन या मर्यादा 
नीतिपरक नहीं 
या तो 
भयग्रस्त हैं 
या किसी 
अहसान का बदला 
लेकिन 
इस  जगह का मौन 
अगर तुम्हें ही  
दोषी बना दे  तो  
खोने  वाले भी तुम ही हो 
और पाने  (आरोप)  वाले भी तुम 
अगर मुंह नहीं खोल सकते हो 
तो मौन और मौन 
तुम्हारी  नियति है 
और  
आरोपों को मौन के साथ  ही 
जीते रहो ,
जलते रहो।

  

10 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (15-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

Anupama Tripathi ने कहा…

वाह बहुत सार्थक बात ..
सुंदर प्रबल रचना ...

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

chup rahna...
aur kuchh na kahna...
sab kuchh dekhna
par chup rhna..
ye maun hai???

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

as usual... bethareen didi:)

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

फिर सब
जो असत्य आरोपों के
दावेदार हैं
जीत जाते हैं।
ऐसा मौन या मर्यादा
नीतिपरक नहीं
या तो
भयग्रस्त हैं

सशक्त रचना

vandan gupta ने कहा…

बिल्कुल सही कहा।

रविकर ने कहा…

मौन रहे निर्दोष गर, दोष सिद्ध कहलाय ।

अपराधी खुब जोर से, झूठे शोर मचाय ।

झूठे शोर मचाय, सुने जो हल्ला गुल्ला ।

मौन मान संकेत, फैसला देता मुल्ला ।

पर काजी की पहल, शर्तिया करे फैसला ।

मौन तोड़ ऐ सत्य, तोड़ मत कभी हौसला ।।

P.N. Subramanian ने कहा…

अर्थपूर्ण प्रस्तुति. सुन्दर.

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन...मौन की आवाज सुनाई दी!!

सदा ने कहा…

बहुत सही कहा है आपने ...आभार