गोली, बारूद और धमाकों
की राजनीति कराने वालो
गुमनाम रहने वालो
कहते हो की हम धर्म के लिए
लड़ रहे हैं ladai।
मत सताओ हमारे वर्ग को
अपने वर्ग का पता तो बताओ
वे कब तुम्हें अपना मानते हैं।
क्यों अपनी कुंठाओं और वहशत को
धर्म और वर्ग का नाम देते हो।
खून के रंग से बता सकते हो
तुम्हारे वर्ग के खून का रंग
कौन सा है?
तुम्हारे धर्म के लोगों
के खून का रंग कैसा है?
तुम्हारी गोलियों से मरे
सिर्फ इंसान होते हैं।
रोते बिलखते परिवार
कोई अपना खोते हैं।
जब देने को कुछ नहीं
तुम्हारे पास उनको
क्यों छीनते हो -- साया उनका
उनकी रोटियों को जुटाने वाला
तुम्हारा क्या बिगड़ा है।
तुम्हारा जो भी धर्म हो
एक तरफ खड़े हो जाओ
खुदा या ईश्वर की दुहाई देने वाले
aavaaz दो
उनको देखना है कि
कितने लोग तुम्हारी जमात में आते हैं।
ये हैवानियत का खेल
इंसानियत को
इस जहाँ से मिटा नहीं सकता है।
खौफ दे सकता है
रुला सकता है
पर किसी के आंसू
पोंछ नहीं सकता है
munh छिपा कर बाहर निकलते हो
नाम तक नहीं है तुम्हारा
दूसरों के इशारे पर
गोली चलने वालो
कभी तुम्हारे भी शिकार होंगे
तुम्हारी ही गोलियों के।
ये धमाके तुम्हारे लिए शगल
घी के दिए जलने सा
जश्न मनाने का दिन
रोटी बिलखती इंसानियत
हिलाकर रख दिया
विश्व के जनमानस को
कहाँ है ये हत्यारे
शायद हममें ही छुपे हैं
वे मानव हो ही नहीं सकते है
सिर्फ हत्यारे हैं
और हत्यारों की कोई जाति नहीं होती
कोई धर्म नहीं होता।
गुरुवार, 27 नवंबर 2008
बुधवार, 26 नवंबर 2008
अभिव्यक्ति!
जो कुछ जिया
भावों से लिया
औ' अंकित किया
बंद पृष्ठों की धरोहर
किसने देखी, किसने सुनी।
दिशा मंच की
मुखर अभिव्यक्ति ही
हस्ताक्षर के नाम की
पहचान बन गई,
सबने सुनी सबने पढ़ी।
नहीं पता सराही गई
या फिर आलोचित हुई,
मौन रही या मुखरित हुई
छुआ मर्म या असफल रही
अंतर्वेदना मेरी हर किसी ने सुनी।
औरों की पीड़ा जीकर
शब्दों में ढाल दी
सबसे बाँट ली
कुछ तो दिया उनको ,
कुछ तो लिया उनसे.
धन्य मेरी अभिव्यक्ति हुई
एक प्रश्न बन
मजबूर कर गई मनों को
जो सबने देखी सबने सुनी।
भावों से लिया
औ' अंकित किया
बंद पृष्ठों की धरोहर
किसने देखी, किसने सुनी।
दिशा मंच की
मुखर अभिव्यक्ति ही
हस्ताक्षर के नाम की
पहचान बन गई,
सबने सुनी सबने पढ़ी।
नहीं पता सराही गई
या फिर आलोचित हुई,
मौन रही या मुखरित हुई
छुआ मर्म या असफल रही
अंतर्वेदना मेरी हर किसी ने सुनी।
औरों की पीड़ा जीकर
शब्दों में ढाल दी
सबसे बाँट ली
कुछ तो दिया उनको ,
कुछ तो लिया उनसे.
धन्य मेरी अभिव्यक्ति हुई
एक प्रश्न बन
मजबूर कर गई मनों को
जो सबने देखी सबने सुनी।
सोमवार, 3 नवंबर 2008
अर्थ!
रिश्तों के बदले अर्थों में
अब कौन किसी का होता है।
रिश्ते बेमानी हो जाते हैं,
जब अर्थ पास नहीं होता है।
रिश्ते खंडित होते देखे
जब अर्थ बीच में आता है।
इस पैसे की खातिर ही तो
अपना अपनों को खोता है।
एक निर्बल निर्धन ही तो है,
जो रिश्तों को पानी देता है।
वरना पैसे वालों का तो अब
पैसा ही सब कुछ होता है।
अपनों के प्यार की आस लिए,
कितने चिरनिद्रा में सोते हैं।
क्योंकि पैसे वाले तो अब
दायित्वों को भी पैसे से ही ढोते है.
अब कौन किसी का होता है।
रिश्ते बेमानी हो जाते हैं,
जब अर्थ पास नहीं होता है।
रिश्ते खंडित होते देखे
जब अर्थ बीच में आता है।
इस पैसे की खातिर ही तो
अपना अपनों को खोता है।
एक निर्बल निर्धन ही तो है,
जो रिश्तों को पानी देता है।
वरना पैसे वालों का तो अब
पैसा ही सब कुछ होता है।
अपनों के प्यार की आस लिए,
कितने चिरनिद्रा में सोते हैं।
क्योंकि पैसे वाले तो अब
दायित्वों को भी पैसे से ही ढोते है.
अभिशाप!
तेज रफ्तार जिंदगी
उस वक़्त ठहर गई
जब क्रमिक धमाकों ने
सबको स्तब्ध कर दिया।
जो जहाँ था
थम गए उसके कदम
कितनों का अन्तिम क्षण बन गया,
चीत्कारों, लाशों, घायलों
औ' रक्तरंजित ज़मीं
सब कुछ देख सुनकर
मानवता चुपचाप रोती रही।
हाय रे! दुर्भाग्य
हम फिर एक बार
उनकी चुनौती सह गए
हम इतने कमजोर तो नहीं
अगर ठान लें
तो जवाब बन सकते है,
थाम लें हाथ उनका
तो इतिहास रच सकते हैं।
इन प्र्लयंकरों की साजिश
नाकाम कर सकते हैं
दृढ़ संकल्प तो लें हम
इरादा तो करें हम
विजय हमारी होगी
विजय हमारी होगी.
उस वक़्त ठहर गई
जब क्रमिक धमाकों ने
सबको स्तब्ध कर दिया।
जो जहाँ था
थम गए उसके कदम
कितनों का अन्तिम क्षण बन गया,
चीत्कारों, लाशों, घायलों
औ' रक्तरंजित ज़मीं
सब कुछ देख सुनकर
मानवता चुपचाप रोती रही।
हाय रे! दुर्भाग्य
हम फिर एक बार
उनकी चुनौती सह गए
हम इतने कमजोर तो नहीं
अगर ठान लें
तो जवाब बन सकते है,
थाम लें हाथ उनका
तो इतिहास रच सकते हैं।
इन प्र्लयंकरों की साजिश
नाकाम कर सकते हैं
दृढ़ संकल्प तो लें हम
इरादा तो करें हम
विजय हमारी होगी
विजय हमारी होगी.
रविवार, 26 अक्टूबर 2008
एक ऐसा ही दीप जलाओ!
परमार्थ में जीवन को ही मिटा दे,
दीप सा दधिची दूसरा हुआ कहाँ?
वह तो जलकर भस्म हुआ है,
हर मन में अभी उजाला कहाँ?
दीपक बन जल जाऊं मैं,
गर कलुषित मन धुल जाएँ,
तड़प सुनें सूने मन-आँगन की,
बस दिल उनके हिल जाएँ।
कितने घरों में सिमटा अँधेरा,
कल ही दीपक बुझा है घर का,
किसी का कुछ न बिगाडा था,
बस चैन खोजने चला था घर का।
अब तो मनुज बन जाओ सब,
जलने दो बाती दीपों में,
बूढी आँखों का नूर बचाओ,
बच्चों की मुस्कान बचाओ .
इस दीवाली में हर घर में ,
एक सद्भावना का दीप जलाओ,
सुख-शान्ति की कामना हो जिसमें ,
विश्व शान्ति की अलख जलाओ।
हर घर रोशन हो जगमग,
मन में भी उल्लास भरा हो,
वह दीप एक हो या माला हो।
बस रोशन घर का हर आला हो।
अब की ऐसी दीवाली मनाओ
खुशहाल हर घर को बनाओ!
दीप सा दधिची दूसरा हुआ कहाँ?
वह तो जलकर भस्म हुआ है,
हर मन में अभी उजाला कहाँ?
दीपक बन जल जाऊं मैं,
गर कलुषित मन धुल जाएँ,
तड़प सुनें सूने मन-आँगन की,
बस दिल उनके हिल जाएँ।
कितने घरों में सिमटा अँधेरा,
कल ही दीपक बुझा है घर का,
किसी का कुछ न बिगाडा था,
बस चैन खोजने चला था घर का।
अब तो मनुज बन जाओ सब,
जलने दो बाती दीपों में,
बूढी आँखों का नूर बचाओ,
बच्चों की मुस्कान बचाओ .
इस दीवाली में हर घर में ,
एक सद्भावना का दीप जलाओ,
सुख-शान्ति की कामना हो जिसमें ,
विश्व शान्ति की अलख जलाओ।
हर घर रोशन हो जगमग,
मन में भी उल्लास भरा हो,
वह दीप एक हो या माला हो।
बस रोशन घर का हर आला हो।
अब की ऐसी दीवाली मनाओ
खुशहाल हर घर को बनाओ!
बुधवार, 22 अक्टूबर 2008
आधार
जीने के लिए
एक ठोस धरातल चाहिए
रेत के ढेर पर
सजे जीवन के महलों को
क्या कहा जा सकता है।
रात के अंधेरे में
न जाने कब और कहाँ
ढह जाएँ अनजाने से
संशय की स्थिति में
जीते हुए वर्षों गुजर गए।
पलक मूंदते ही
ढहने के भयावह सपने
तैरने लगते हैं,
कहीं दूर बहुत दूर
धरा की तलाश में
चलते चलते थक गए
न कहीं छाँव , न दरख्त और न छतें
छाले फूटने लगे पाँवों के
पाँव भी सवाल करने लगे
मुझसे ही
कहाँ तलक चलना है
बेसबब, बेसहारा
ख़ुद अपना सहारा क्यों नहीं
बनती है
हम साथ हैं न,
पैर की धमक से रेत भी
चट्टान बन सकती है,
इरादे हों बुलंद तो
समंदर में भी
आग जल सकती है।
एक ठोस धरातल चाहिए
रेत के ढेर पर
सजे जीवन के महलों को
क्या कहा जा सकता है।
रात के अंधेरे में
न जाने कब और कहाँ
ढह जाएँ अनजाने से
संशय की स्थिति में
जीते हुए वर्षों गुजर गए।
पलक मूंदते ही
ढहने के भयावह सपने
तैरने लगते हैं,
कहीं दूर बहुत दूर
धरा की तलाश में
चलते चलते थक गए
न कहीं छाँव , न दरख्त और न छतें
छाले फूटने लगे पाँवों के
पाँव भी सवाल करने लगे
मुझसे ही
कहाँ तलक चलना है
बेसबब, बेसहारा
ख़ुद अपना सहारा क्यों नहीं
बनती है
हम साथ हैं न,
पैर की धमक से रेत भी
चट्टान बन सकती है,
इरादे हों बुलंद तो
समंदर में भी
आग जल सकती है।
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