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शनिवार, 11 अप्रैल 2020

कहते हैं सभी कोरोना हूँ !

कहर बन कर आया जरूर हूँ ,
विश्व में भी कहलाया क्रूर हूँ ,
जन्म दिया किसने ये प्रश्न है ?
वही जिन्हें अपने पर गुरूर है।

                               हाँ हर तरफ सबका रोना हूँ।
                               कहते हैं सभी कोरोना हूँ।

प्रकृति के नियमों को तोड़ कर ,
पर्वतों को मशीनों से  जोड़ कर ,
ध्वस्त कर दी रचना  धरा की ,
रख दिया धाराओं को मोड़ कर।

                               हाँ हर तरफ सबका रोना हूँ।
                               कहते हैं सभी कोरोना हूँ।

कुछ दिनों को बंद प्रदूषण की मार ,
शांत हो वातावरण, हो शोर की हार ,
 स्वच्छ हुआ आकाश नील वर्ण का ,
वर्षों बाद देखा है गगन धुंआ के पार।

                               हाँ हर तरफ सबका रोना हूँ।
                               कहते हैं सभी कोरोना हूँ।

मकान बन गए घर गुलजार हो ,
नन्हों को मिल गया ममता प्यार हो ,
चेहरे मुस्कराते हैं सभी के आजकल,
बंदिशें भले हो फिर भी ये बहार हो.

                               हाँ हर तरफ सबका रोना हूँ।
                               कहते हैं सभी कोरोना हूँ।
                                 

रविवार, 17 नवंबर 2019

एक सच !



मौत
एक सच
हम जानते हैं,
उसकी आहट पहचानते हैं ,
फिर भी
स्वीकार नहीं कर पाते ।
जीवन दीप को
काल के झंझावातों से बचाने को
दोनों हाथों से
या कहें जितने जोड़ी हाथ हों
सब मिलकर भी
उसे बुझने से बचा नहीं पाते हैं।
एक साँस और उसके थमने के
बीच का फासला
सब कुछ ले जाता है -
किसी के सिर की छाया,
किसी की पूरी दुनिया ही
पूरी अधूरी जिंदगी के शेष अंतराल को
फिर भरने कोई नहीं आता ।
एक माला और एक जलता दीपक
सबको बता देता है ।
खत्म हो चुकी है
एक आत्मा की इहलोक की यात्रा ।


गुरुवार, 7 नवंबर 2019

फ़र्क से फ़र्क !

क्या बात है!
इन शब्दों को अक्सर सुना जाता है,
लेकिन
ये वाक्य जेहन में ही आता है,
जब वास्तव में कुछ फ़र्क पड़ता है।
अपने मन बदलने को,
औरों को दिखाने को,
टूट कर सिमटने के भ्रम में जीने को,
या
फिर उस दुख को जीने की हिम्मत बढ़ जाती है। 
क्या फ़र्क पड़ता है!
बहुत गहरा अर्थ रखता है।
फ़र्क पड़ने पर,
या कि 
एक रिश्ते की नींव दरकने पर,
किसी रिश्ते की चोरी पर,
साथ छूटने पर,
या
रिश्तों में औरों के विष बोने पर
फ़र्क पड़ता है।
हम किसको समझाते हैं,
हम किसको दिखाते हैं,
किस लिए डालते हैं,
एक झूठ का आवरण।
शायद खुद के लिए
क्योंकि
कोई और को वास्तव में कोई फ़र्क नहीं पड़ता है।
सच स्वीकारो
हाँ हम वहाँ कहते हैं
कि
कोई फ़र्क नहीं पड़ता है!
जहाँ हम केवल इस फ़र्क को जीतते हैं।
इसमें घुला हुआ जहर भी पीते हैं।

गुरुवार, 12 सितंबर 2019

मौत !

मौत !

वो इतनी करीब खड़ी है ,
नहीं देख पाते हैं अपने ,
जिंदगी की उम्मीद में
जलाये आशा का दिया
झंझावातों से बचाने को
आस्था की ओट लगाये बैठे है ।
जिसे वह दिख रही है ,
शायद श्वान नेत्रों से
चुपचाप खड़े हैं,
"चिंता मत करो, सब ठीक हो जायेगा।"
दिलासा की एक मोमबत्ती पकड़ा कर
एक एक कर चलने लगते हैं ।
वह खुद उहापोह में
समझ नहीं पाता है कि
क्या चल रहा है ?
कल होगा या नहीं ,
सोचने में परेशान है
क्योंकि जिंदगी ने अपना तंबू
समेटना शुरू कर दिया है ।

शनिवार, 24 अगस्त 2019

बात मित्रों की !



जब पलटती हूँ 
अतीत के पन्नों को
कुछ लम्हे, कुछ बातें,
जेहन में बसी हैं आज भी ,
कुछ तस्वीरें चस्पा हैं मित्रों की ।

एक उदासी भी
चुरा लेती थी हँसी सबकी, 
नजरें तो लगी होती है चेहरे पर  
उदासी का सबब जानने को
बात कुछ और थी ऐसे  मित्रों की ।

ऐसे ही इस दिन
सारे मुस्कुराते हुए चेहरे  
कहीं भी हों, सामने होते हैं,
कभी वीडियो पर , कभी पन्नों पर
यही तो फितरत होती है मित्रों की ।

हर रिश्ते से बड़ा,
हर दुख सुख में साथ खड़े,
हाथ थाम लेते हैं अपनों से
दुनिया बदले, नहीं बदलती है ,
इस जीवन में फितरत मित्रों की ।

रविवार, 21 जुलाई 2019

एक प्याली चाय !

औरत की इज्जत
एक चाय की प्याली हो गयी
जिसे
जिसने पिया - तो
अकेले नहीं दोस्तों के संग
क्या ये अब
लत बन चुकी है।
जो इंसान के जमीर में
शामिल नहीं है  -
औरत की इज्जत करना।
और समाज उसे
कितनी जलालत भरी
नजर से देखती है,
घुट घुट कर जीने के लिए
मजबूर होती है,
क्योंकि
उस पीड़ा का अहसास 
इस समाज ने
कभी किया ही नहीं होता है ,
उसकी नजर में
इज्जत तो सिर्फ
औरत की ही होती है
और
पुरुष के लिए
एक प्याली चाय है।

शनिवार, 20 जुलाई 2019

रिश्तों की संजीवनी !

रिश्ते हैं
एक पौध
पलते है जो
दिल की माटी में,
प्यार का पानी दें,
हवा तो दिल देता है
फिर देखो कैसे ?
हरे भरे होकर वे
जीवन महका देंगे।

अकेले और सिर्फ
अपनों की खातिर
अपने सुख की खातिर
जीना बहुत आसान है ,
सोच बदलो
औरों के लिए भी
जीकर देखो तो सही
बहुत  कुछ  सिखा देंगे . .।

पानी किसी भी पौध में दें
जरूरी नहीं कि
अपनी ही बगिया का  हो ,
फूल  खिलेंगे और  महकेंगे
खुशबू बिखरेगी,
बिना भेद के होता कैसे
गैरों  से प्यार दिखा देंगे .

इतना छोटा नहीं
इंसान से इंसान का रिश्ता
चीरो जिगर को
सबमें बस वही सब होगा
देख कर जान लेना
फर्क  है दिल और जिस्म में
धर्म , जाति , गरीब और अमीर के अंतर पर
इस सोच को पल में मिटा देंगे।

एक हैं सब धरती पर
एक से जज्बात हैं ,
अगर सीखने का जज्बा है
जानने की मर्जी है तो -
कोशिश करें
इंसान से इंसान को
जोड़ने की शिद्दत से ,
वे उस प्यार की
ऐसी इबारत लिखा देंगे .