वह सर पर कपड़ा रखे
ईंटें ढो रही थी,
पास ही कहीं
दुधमुहीं बच्ची सो रही थी।
आवाजें कारीगरों की
जल्दी करो
जल्दी करो
बराबर आ रही थीं।
सहसा सोती बच्ची
रोने लगी।
शायद भूखी होगी।
आँचल से दूध
टप-टप कर बहने लगा।
पर
बेटी को उठा नहीं सकती
पेट उसका भर नहीं सकती
पैसे जो कट जायेंगे।
बड़ी मिन्नतों के बाद
बच्ची को लाने की अनुमति मिली है।
जो छुआ तो
मालिकों के मुंह ही
खुल जायेंगे।
ये खून-पसीने के
हिसाब से नहीं
शरीर से गिरते
खारे पानी के पैसे देते हैं।
उसका तो
ये खारा पानी
और भी अधिक बहता है।
उसके साथ रोती हुई बच्ची के आंसूं
और माँ के आंसूं
दोनों की कीमत
कभी नहीं गिनी जाती।
बस बहते हुए पसीने की
धारों के बदले
दो रोटी भर की
कीमत मिलती है.
बुधवार, 13 जनवरी 2010
बुधवार, 30 दिसंबर 2009
नववर्ष तुम्हें शत शत शुभ हो!
नव प्रात अरुणिमा से बिखरे
खुशियाँ और खुशहाली।
प्रफुल्लित मन से
रखो पग नव दिवस में।
जगमगाते सूर्य की किरणें
उल्लास भरें जीवन में।
हर प्रात तुम्हारी
हो होली सी,
हर संध्या दीवाली बन चमके।
वंदना के स्वर औ'
अर्चना की उमंगों से
जीवन में ईश कृपा
सबको इच्छित वर दे।
फिर भी
नव दिवस पर
कुछ नए संकल्प
मन में भी लीजिये।
इस मनुज जीवन से
कुछ परहित भी कीजिये।
एक पग ऐसे चलें
हाथ में हाथ लेकर
साथ सब उनके रहें
जिनने कुछ खोया है - अभी अभी।
नियति के थपेड़ों से
बच नहीं सकता कोई
फिर भी
उन्हें शांति, धैर्य औ' साहस दे
दें उन्हें साथ होने का अहसास।
हताशा से निकालें
सहारा दें।
हो सकता है कि
हमारा ये प्रयास
जाने-अनजाने ही सही
शक्ति से भर दे उन्हें
एक नयी ऊर्जा दे
नयी दिशा मिलने पर
नया जीवन पाकर
वे
फिर से जी उठेंगे
औ' हम सब का
प्रयास सार्थक हो।
तो नव वर्ष भी सार्थक होगा।
मंगलवार, 29 दिसंबर 2009
सिर्फ आज जिया है!
विदा गुजरे साल को
सब दे रहे हैं।
गुजर रहे हैं
साल-दर-साल
सिर्फ रात औ' दिन के चक्र में
न कल देखा,
न देखेंगे।
सिर्फ आज औ' आज
अपना है।
और इसी आज को जी सकते हैं।
कुछ बदला है तो
वक़्त के हिसाब से
कलैंडर और तारीख बदलती है।
तस्वीरे पुरानी और धुंधली होती हैं।
उतारकर नयी लग जाती हैं।
तस्वीरों में
बदलते चेहरे के अक्स
गुजरे सालों का हिसाब देते हैं।
बाद में -
क्या खोया - क्या पाया
बस यही
हिसाब शेष रह जाता है।
बस इसी तरह से
एक और साल गुजर जाता है.
सब दे रहे हैं।
गुजर रहे हैं
साल-दर-साल
सिर्फ रात औ' दिन के चक्र में
न कल देखा,
न देखेंगे।
सिर्फ आज औ' आज
अपना है।
और इसी आज को जी सकते हैं।
कुछ बदला है तो
वक़्त के हिसाब से
कलैंडर और तारीख बदलती है।
तस्वीरे पुरानी और धुंधली होती हैं।
उतारकर नयी लग जाती हैं।
तस्वीरों में
बदलते चेहरे के अक्स
गुजरे सालों का हिसाब देते हैं।
बाद में -
क्या खोया - क्या पाया
बस यही
हिसाब शेष रह जाता है।
बस इसी तरह से
एक और साल गुजर जाता है.
सोमवार, 14 दिसंबर 2009
जीवन की संध्या इतनी दुरूह क्यों?
बालकनी में बैठे दादा,
नीचे रेंग रहे लोगों को
देख रहे हैं
हसरत से,
ये अब तकाजा
हर इन्सान का ,
आज उनका तो
कल होगा हमारा।
वक्त के साथ कितना बदलें
अब पहले से तो
दिन ही नहीं हैं,
सब से सब होते हैं बेगाने।
पहले तो
हमारे गाँवों में
पार्क नहीं थे,
थीं चौपालें,
उन पर बैठे
खटिया डाले.
सब मिलकर हुक्का गुडगुडाते,
सबका सुख - दुःख
कह - सुन जाते,
सबका दुःख सबका होता था,
सबके सुख भी सबके होते,
कभी कभी
गाँव के खेतों के किनारे
पुआल जलाये
हाथ सेंकते
भून रहे है
चने , मटर के बूंट ,
भून आग पर
होला खाकर
होते मगन सब
आज तो कितने
यही न जानें,
कैसे खेत और कैसी खेती?
बच्चों ने छोड़ा
घर औ' गाँव
हमको भी
बेघर कर दिया,
महानगरों के
ऊँचे घरों में
जहाँ न छत अपनी,
न जमीं अपनी।
याद घरों की आती है,
बड़े बड़े आँगन के बीच में
तुलसी चौरे की वो बाती,
कुंएं का मीठा पानी
घड़ों और कलशों में होता,
गुड के डली और
मट्ठा पीकर
जीवन तो हमने भी जिया था,
पर अब
बस यादों ही यादों
के साए में
आँख कभी भर आती है,
जेहन में बसी
गाँव की सोंधी माटी
बहुत रुला रुला जाती है।
नीचे रेंग रहे लोगों को
देख रहे हैं
हसरत से,
ये अब तकाजा
हर इन्सान का ,
आज उनका तो
कल होगा हमारा।
वक्त के साथ कितना बदलें
अब पहले से तो
दिन ही नहीं हैं,
सब से सब होते हैं बेगाने।
पहले तो
हमारे गाँवों में
पार्क नहीं थे,
थीं चौपालें,
उन पर बैठे
खटिया डाले.
सब मिलकर हुक्का गुडगुडाते,
सबका सुख - दुःख
कह - सुन जाते,
सबका दुःख सबका होता था,
सबके सुख भी सबके होते,
कभी कभी
गाँव के खेतों के किनारे
पुआल जलाये
हाथ सेंकते
भून रहे है
चने , मटर के बूंट ,
भून आग पर
होला खाकर
होते मगन सब
आज तो कितने
यही न जानें,
कैसे खेत और कैसी खेती?
बच्चों ने छोड़ा
घर औ' गाँव
हमको भी
बेघर कर दिया,
महानगरों के
ऊँचे घरों में
जहाँ न छत अपनी,
न जमीं अपनी।
याद घरों की आती है,
बड़े बड़े आँगन के बीच में
तुलसी चौरे की वो बाती,
कुंएं का मीठा पानी
घड़ों और कलशों में होता,
गुड के डली और
मट्ठा पीकर
जीवन तो हमने भी जिया था,
पर अब
बस यादों ही यादों
के साए में
आँख कभी भर आती है,
जेहन में बसी
गाँव की सोंधी माटी
बहुत रुला रुला जाती है।
गुरुवार, 10 दिसंबर 2009
मानवाधिकार दिवस - किसके लिए ?
कौन से मानव है?
जो हकदार है
इन मानवाधिकारों के।
उससे पहले की मानव को अधिकार मिले
हर्ता पहले आ जाते हैं,
अपने साम-दाम-दण्ड-भेद
सब अपना कर
अपने नाम कर लेते हैं।
अगर सही नहीं
तो जाकर देखो
कितने निर्दोष
सड़ रहे हैं जेलों में।
अपने घर में झांकें
या
पड़ोसियों के.
विक्षिप्त से
वे मौत का इंतजार कर रहे हैं।
वर्षों पहले हमने
उन्हें मृत - लापता करार दे दिया
उनके जीने की खबरें मिली
व्याकुल से घरवाले
ऊपर तक दौड़े,
इस आस में
दम तो अपने दर पर निकले,
पर कदम थक गए
कोई मानव न जागा
मानवाधिकारों की बात कौन कहे?
वे वही अन्तिम साँसें लेंगे
और पता नहीं
कौन सी गति
उनको मिल पाएगी।
क्योंकि वहां तक पहुँच
किसी की नहीं ।
जो बंद किए हैं
वे मानव ही नहीं हैं।
गले मिलकर
हमदर्दी दिखा जाते हैं
मानवाधिकार की दुहाई देनेवाले
मानवाधिकारों की समाधि
बना जाते हैं।
औ'
हम चुपचाप उस अन्याय
अधर्म पर
बस आँसू बहाया करते हैं
उनके कष्टों का अहसास
करते करते
चाँद पंक्तियों के सहारे
नारे लगाया करते हैं।
पर हमारी आवाज
किसी बंद कमरे की तरह
दीवारों से टकरा कर
वापस हम तक आ जाती है,
और हमारे कानों में
पड़ कर
हमारी ही बेबसी का
अहसास दिला जाती है,
अहसास दिला जाती है.
जो हकदार है
इन मानवाधिकारों के।
उससे पहले की मानव को अधिकार मिले
हर्ता पहले आ जाते हैं,
अपने साम-दाम-दण्ड-भेद
सब अपना कर
अपने नाम कर लेते हैं।
अगर सही नहीं
तो जाकर देखो
कितने निर्दोष
सड़ रहे हैं जेलों में।
अपने घर में झांकें
या
पड़ोसियों के.
विक्षिप्त से
वे मौत का इंतजार कर रहे हैं।
वर्षों पहले हमने
उन्हें मृत - लापता करार दे दिया
उनके जीने की खबरें मिली
व्याकुल से घरवाले
ऊपर तक दौड़े,
इस आस में
दम तो अपने दर पर निकले,
पर कदम थक गए
कोई मानव न जागा
मानवाधिकारों की बात कौन कहे?
वे वही अन्तिम साँसें लेंगे
और पता नहीं
कौन सी गति
उनको मिल पाएगी।
क्योंकि वहां तक पहुँच
किसी की नहीं ।
जो बंद किए हैं
वे मानव ही नहीं हैं।
गले मिलकर
हमदर्दी दिखा जाते हैं
मानवाधिकार की दुहाई देनेवाले
मानवाधिकारों की समाधि
बना जाते हैं।
औ'
हम चुपचाप उस अन्याय
अधर्म पर
बस आँसू बहाया करते हैं
उनके कष्टों का अहसास
करते करते
चाँद पंक्तियों के सहारे
नारे लगाया करते हैं।
पर हमारी आवाज
किसी बंद कमरे की तरह
दीवारों से टकरा कर
वापस हम तक आ जाती है,
और हमारे कानों में
पड़ कर
हमारी ही बेबसी का
अहसास दिला जाती है,
अहसास दिला जाती है.
गुरुवार, 3 दिसंबर 2009
विकलांगों को समर्पित ये प्रशस्ति!
शायद क्रूरता है
ये उनके भाग्य की,
मानव तो बनाया
किंतु पूर्णता नहीं दी ।
या दी भी तो
जानकर छीन ली।
पर
जीवन तो जीना है,
एक चुनौती मानकर
असंभव कुछ भी नहीं
सक्षम और सशक्त
आत्मविश्वास से होते हैं।
नहीं तो
पूर्ण कहे जाने भी
सडकों पर रोते हैं।
उनको ये आत्मविश्वास
कुछ अपने ही देते हैं।
अशक्त समझ कर
उन्हें और अपाहिज मत बनाओ
हौसला बढाओ
साधनों से करो सक्षम
इतिहास वे रच जायेंगे।
कितने विकलांग
सुर्ख़ियों में आते हैं
क्या यों ही
नहीं जन्मदाताओं ने उन्हें
जीना सिखाया है,
मित्रों ने उन्हें
हौसला दिया है,
औ'
समाज ने उन्हें सराहा है।
तब ही तो वे
अपने अधूरे अहसास को भुलाकर
हम कहीं से भी
कमतर नहीं है।
इस जज्बे के साथ
अपनी विकलांगता को चुनौती
मानकर
सहर्ष स्वीकार कर
हमेशा आगे बढे हैं।
उनके कदम कभी
पीछे नहीं
आगे की मंजिलें ख़ुद तय करेंगे।
हम तो बस
उनकी कामयाबी पर फख्र करेंगे
और उनकी हिम्मत को दाद देकर
एक मानव के प्रति
एक मानव होने का फर्ज अदा करेंगे.
ये उनके भाग्य की,
मानव तो बनाया
किंतु पूर्णता नहीं दी ।
या दी भी तो
जानकर छीन ली।
पर
जीवन तो जीना है,
एक चुनौती मानकर
असंभव कुछ भी नहीं
सक्षम और सशक्त
आत्मविश्वास से होते हैं।
नहीं तो
पूर्ण कहे जाने भी
सडकों पर रोते हैं।
उनको ये आत्मविश्वास
कुछ अपने ही देते हैं।
अशक्त समझ कर
उन्हें और अपाहिज मत बनाओ
हौसला बढाओ
साधनों से करो सक्षम
इतिहास वे रच जायेंगे।
कितने विकलांग
सुर्ख़ियों में आते हैं
क्या यों ही
नहीं जन्मदाताओं ने उन्हें
जीना सिखाया है,
मित्रों ने उन्हें
हौसला दिया है,
औ'
समाज ने उन्हें सराहा है।
तब ही तो वे
अपने अधूरे अहसास को भुलाकर
हम कहीं से भी
कमतर नहीं है।
इस जज्बे के साथ
अपनी विकलांगता को चुनौती
मानकर
सहर्ष स्वीकार कर
हमेशा आगे बढे हैं।
उनके कदम कभी
पीछे नहीं
आगे की मंजिलें ख़ुद तय करेंगे।
हम तो बस
उनकी कामयाबी पर फख्र करेंगे
और उनकी हिम्मत को दाद देकर
एक मानव के प्रति
एक मानव होने का फर्ज अदा करेंगे.
रविवार, 29 नवंबर 2009
जीव- आत्मा-परमात्मा !
क्यों जीव ही जीव का
हत्यारा है?
कभी ईश्वर, खुदा या पैगम्बर
का नाम लेकर
उन जीवों को हलाल कर दिया।
कभी आड़ लेकर धर्म की
नर संहार कर दिया।
अपने बच्चों के शरीर पर
एक बैठा हुआ कीट भी
सहन नहीं होता।
क्यों?
उसको काट लेगा
तो कष्ट होगा।
किंतु
किस लिए
क़ुरबानी के नाम पर
सैकड़ों जीवों को जीवन से
वंचित किए जाते हैं हम।
रिक्शे , टेम्पो और ट्रकों में
मिमियाते हुए
वे भी जानते है
कि आज उनका आखिरी दिन है।
उन आँखों की बेबसी और पीड़ा
पढ़ी क्या किसी ने?
वे बेजुबान असक्त है
इस लिए हम
मारने के लिए
तैयार है।
क्योंकि मानव ही
इस दुनियाँ में सबसे सशक्त है।
कहाँ दया और करुणा
छिप जाती है?
जीव कोई आत्मा बिना कहाँ?
फिर उसकी आत्मा
क्या आत्मा नहीं होती?
सब ने कहा है -
आत्मा ही परमात्मा है।
फिर हम परमात्मा को ही...............
हम तो खुश करने चले हैं
उसी देव को
किंतु
इस पाप से क्या मुक्ति
मिल सकेगी?
खूंटे से बांधकर
सर कलम कर दिया।
एक चीख निकल गई
और बेध गई।
किंतु ये क्रम
कभी बंद नहीं होगा।
जीव - जीव में अन्तर है।
वे बोल नहीं सकते
प्रतिरोध नहीं कर सकते
पर प्रतिरोध करने वालों
के भी सर कलम कर दिए जाते हैं।
हम मानव नहीं दानव हैं
जीव, आत्मा, परमात्मा
सब किताबों की बातें हैं।
किसने देखा है ?
आत्मा और परमात्मा को.
वह तो रहता ही है
अमीरों की तिजोरियों में
और कंजूसों की थैलियों में।
सशक्तों की गोलियों में.
हत्यारा है?
कभी ईश्वर, खुदा या पैगम्बर
का नाम लेकर
उन जीवों को हलाल कर दिया।
कभी आड़ लेकर धर्म की
नर संहार कर दिया।
अपने बच्चों के शरीर पर
एक बैठा हुआ कीट भी
सहन नहीं होता।
क्यों?
उसको काट लेगा
तो कष्ट होगा।
किंतु
किस लिए
क़ुरबानी के नाम पर
सैकड़ों जीवों को जीवन से
वंचित किए जाते हैं हम।
रिक्शे , टेम्पो और ट्रकों में
मिमियाते हुए
वे भी जानते है
कि आज उनका आखिरी दिन है।
उन आँखों की बेबसी और पीड़ा
पढ़ी क्या किसी ने?
वे बेजुबान असक्त है
इस लिए हम
मारने के लिए
तैयार है।
क्योंकि मानव ही
इस दुनियाँ में सबसे सशक्त है।
कहाँ दया और करुणा
छिप जाती है?
जीव कोई आत्मा बिना कहाँ?
फिर उसकी आत्मा
क्या आत्मा नहीं होती?
सब ने कहा है -
आत्मा ही परमात्मा है।
फिर हम परमात्मा को ही...............
हम तो खुश करने चले हैं
उसी देव को
किंतु
इस पाप से क्या मुक्ति
मिल सकेगी?
खूंटे से बांधकर
सर कलम कर दिया।
एक चीख निकल गई
और बेध गई।
किंतु ये क्रम
कभी बंद नहीं होगा।
जीव - जीव में अन्तर है।
वे बोल नहीं सकते
प्रतिरोध नहीं कर सकते
पर प्रतिरोध करने वालों
के भी सर कलम कर दिए जाते हैं।
हम मानव नहीं दानव हैं
जीव, आत्मा, परमात्मा
सब किताबों की बातें हैं।
किसने देखा है ?
आत्मा और परमात्मा को.
वह तो रहता ही है
अमीरों की तिजोरियों में
और कंजूसों की थैलियों में।
सशक्तों की गोलियों में.
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