किसी के लिए!
जीवन एक अग्नि परीक्षा
शेष रहे थे ये पल
जो कर्ज हैं मेरे ऊपर
किस जन्म के कर्मों का भुगतान
या फिर था
देना पावना इस जन्म के रिश्तों से।
कोई कहीं भी
नहीं किसी में
देखी कोई मलिनता
जो समझें,
बोझ इस जीवन को।
जिजीविषा बनी हुई है
किसी ऋषि के जीवन सी,
अभी शेष हैं जितने पल
उनको तो जी लूं मैं,
मुक्त आत्मा हो न सकेगी,
शेष जहर भी पी लूं मैं।
--रेखा

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