दो शब्द !
अक्सर देखती हूं कि सोशल मीडिया पर कुछ मित्रों की शिकायत होती है कि लोग सुप्रभात, शुभ रात्रि भेजते रहते हैं और हमें इस बात से बहुत ही चिढ़ होती है। अगर इसे भेजने की जरूरत को समझा जाय तो इस जीवन की आपाधापी में हम न तो अपने बहुत करीबियों से रोज कॉल कर पाते हैं और न हीं रूबरू मिल पाते हैं। एक शहर में रहकर भी हम अपने मित्रों से भले ही न मिल पाये, न हीं बात कर पाए, यह दो शब्द हमें एक कुशलता का समाचार देने के लिए पर्याप्त होते हैं। रोज न सही कम से कम सप्ताह में एक और दो बार संदेश हम देते हैं, पाते हैं तो एक संतोष होता है कि सब कुशल है। कुछ अधिक गैप होने पर हमें खटकने लगता है कि क्या बात है उत्तर नहीं मिल रहा है या कॉल करने ही पूछ लिया जाए।
यह आवश्यक है कि एक नज़र उनके संदेशों पर डाल दी जाए। मेरी एक कजिन हम सबसे जुड़ी थी, हर रिश्ते को निभा रही थी। भले ही इन शहर में ही प्रमुख अवसरों पर मुलाकात होती हो और मैसेंजर पर संदेश भी भेजती थी।
एक करीब एक महीने कुछ समारोहों के चलते, कुछ स्वास्थ्य के चलते मैं मैसेंजर पर नहीं जा पाई। जब घर वापस आई तो सूचना मिली कि इंदु नहीं रही। एकदम से आघात लगा बरसों से सब ठीक चल रहा था, बरसों से हम जुड़े थे और यह जुड़ाव एक अकेले को भी एक संबल देता है। वह अकेली सबको मैसेज भेज कर और पढ़कर अपने अकेलेपन का एक साथी पाती थी।
अपनों से जुड़े रहिए उम्र की एक पड़ाव पर सबके रहते हुए भी इंसान अकेला होता है, तो फिर साथ बने रहिए न, अगर मैं आपको पसंद न हो तो शालीनता से मना कर दीजिए, लेकिन उपहास बिल्कुल भी मत कीजिए। आपकी उपेक्षा से बेहतर यही है कि अगर अगला समझदार हैं तो उपेक्षा मिलने पर समझ जाता है और स्वयं बंद कर देगा। यह सोचकर कि आप संबंध रखना पसंद नहीं करते या जुड़े रहना नहीं चाहते हैं तो आपको स्पष्ट कह देना बहुत अच्छा होगा, लेकिन जिनके लिए यह एक सहारा होता है या जिनके लिए ही एक समाचार पाने का साधन होता है उनके लिए एक सुप्रभात या एक शुभ रात्रि बहुत मायने रखती है इस बात को सोचिएगा।

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