दोहे !
1. बदरी छाई जगत में, विपदा की चहुँ ओर ।
रैना कटे न दिन कटे, कब होगी नव भोर ।।
2. माणिक माला कर गहे, नजर भरी मन मैल।
कलयुग का यह धर्म है, खड़े कुटिल बन शैल ।
3. सागर हृदय विशाल है, रखता है यह ज्ञान।
नदियाँ कितनी जा मिले, रखता सबका मान।।
4. सारा जगत है जल रहा, भड़की झूठी शान।
मनुज न समझे मनुज को, चाहे संपत्ति खान।
5. विदा करें इस बरस को , भूलें कटु अघात ।
नया साल गुलजार हो , देकर कल को मात ।।
6. धरती ढकी है धुंध से, साँस थमी सी जाय।
तड़पे जीवन घुटन से , साथी नजर न आय ।।
7. मन काजर की कोठरी, तन जो उजरा होय।
विश्लेषण सब ही करें, मन को पढ़े न कोय।।
8. झूम झूम बरसे बदरा, तड़ित न माने हार।
नदिया उफनी वेग से, पड़ी गरीब पर मार।।
9. सीता जो देती रही , जगत को बारम्बार।
प्रमाण शुचिता के लिए, मगर गयी वो हार।।
10. छली गयी सीता सदा, जीता छल हर बार।
राम भटकते आज भी, कलयुग ले अवतार ।।
11. प्रीति कीजिए राम से, पार ये नौका होय।
भव सागर के पंक से, इस विधि मनवा धोय ।।
12. राम नाम दीपक बने, मिटा अँधेरा जान ।
जगमग हो जीवन सदा, रोशन मन को मान ।।
13. सागर हृदय विशाल है, रखता है यह ज्ञान।
नदियाँ कितनी जा मिलें, रखता सबका मान।।
14. साँस साँस में हरि बसे, जीवन उनके नाम।
धड़कन हरदम ये कहे, प्रभु लो मुझको थाम ।।
15. राम तुम्हारे राज में , बिछड़ गई सन्तान।
मात-पिता निर्बल भये, छोड़ दिये हैं प्रान।।
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