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बुधवार, 25 मई 2011

ख्वाहिश नहीं करते!

गर तुम्हें गुरेज है मुहब्बत में पहल करने से,
तो हम भी दुनियाँ के सामने नुमाइश नहीं करते

ये वो पाक जज्बा है पलता है रूह में भीतर ही,
मिल सका तो मुकद्दर की आजमाइश नहीं करते

छिपाकर भी मुहब्बत के अहसास नहीं मरा करते,
तुम चाहो तो फिर तुम्हारी ख्वाहिश नहीं करते

रूह मेरी है, अहसास भी मेरे है नियामत मेरे लिए ,
बहुत दिया है खुदा ने अब कोई फरमाइश नहीं करते

15 टिप्‍पणियां:

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

बेहद खूबसूरत ग़ज़ल... वाकई मोहब्बत एक पाक ज़ज्बा है...

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

hmm!! sach me di!! prem ke khubsurat ahsaas ko shabdo me peero diya aapne:)

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) ने कहा…

छिपाकर भी मुहब्बत के अहसास नहीं मरा करते,
तुम न चाहो तो फिर तुम्हारी ख्वाहिश नहीं करते।

लाजवाब लिखा है आपने.

सादर
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अब नहीं....

Rajiv ने कहा…

"रूह मेरी है, अहसास भी मेरे है नियामत मेरे लिए ,
बहुत दिया है खुदा ने अब कोई फरमाइश नहीं करते"
वाकई खुदा का दिया जब साथ है तो न तो ख्वाहिश की जरूरत है और न ही फरमाइश की जरूरत है. दीदी, बेहद खूबसूरत गजल और उतने ही सुन्दर भाव.

Urmi ने कहा…

छिपाकर भी मुहब्बत के अहसास नहीं मरा करते,
तुम न चाहो तो फिर तुम्हारी ख्वाहिश नहीं करते।
दिल को छू गयी ये पंक्तियाँ! बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल!

राजेश उत्‍साही ने कहा…

बेहतर।

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

बेहद खूबसूरत

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

खूबसूरत ग़ज़ल...सुन्दर भाव !

संजय भास्‍कर ने कहा…

......बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल!

ashish ने कहा…

अरे वाह , कित्ती सुँदर ग़ज़ल . मै तो गुनगुना रहा हूँ. ऐस ही ग़ज़ल पढवाते रहिये .

मनोज कुमार ने कहा…

छिपाकर भी मुहब्बत के अहसास नहीं मरा करते,
तुम न चाहो तो फिर तुम्हारी ख्वाहिश नहीं करते।
बहुत अच्छी भावाभिव्यक्ति।

vandan gupta ने कहा…

छिपाकर भी मुहब्बत के अहसास नहीं मरा करते,
तुम न चाहो तो फिर तुम्हारी ख्वाहिश नहीं करते।

मोहब्बत के अहसासों से लबरेज़ बेहद उम्दा प्रस्तुति।

अजित गुप्ता का कोना ने कहा…

गजल की गहरी पकड़ नहीं है, इसलिए इस बारे में ज्‍यादा लिख नहीं सकती। लेकिन भाव अच्‍छे हैं।

Sawai Singh Rajpurohit ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूबसूरत भाव हैं ..सुन्दर ..