एक नदिया सी !
हाँ मैं जिंदगी हूँ,
किसी की भी होऊं,
एक अनचाही इबारत
जिसे लिखा किसी और ने है,
और कहलाई वो मेरी है।
लिखना मैंने भी चाहा
लेकिन
खुद को निर्वस्त्र करने जैसा लगा,
कुछ अपराधबोध भी हुआ,
प्रबुद्ध, विचारशील फिर भी
क्यों जीती रही ?
औरों के लिए उनके इशारे पर
हाँ एक कठपुतली सी है ये जिंदगी ,
कोई नचाता रहा और नाचती मैं रही ,
किसने कहा कि ये मेरी है?
थोपी हुई है मुझ पर ,
इसमें तो साँसे भी अपनी नहीं होती,
जिसकी मर्जी पर चल रहीं है,
वही तो रचयिता है।
मैं तो एक नदिया सी बह रही हूँ,
जाकर सागर में मिल जाना है।

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