चिट्ठाजगत www.hamarivani.com

सोमवार, 20 जुलाई 2020

दर्द हवेली का !

विरासतें थक जातीं हैं, पीढ़ियों तक चलते चलते,
और फिर ढह जाती हैं, अकेले में पलते पलते ।

हर कोना हवेली का अब भरता है  सिसकियाँ ,
चिराग भी बुझ चुके है , अंधेरों में जलते जलते ।

आत्मा इस हवेली की , भटक रही है बदहवास ,
जाना उसे भी पड़ेगा , अब उम्र के ढलते ढलते ।

उम्र के इस पड़ाव अब , किस तरह बढ़ेंगी साँसें ,
पीढ़ी बदल चुकी हैं ,  हम पुराने हुए गलते गलते ।

 वो बाग महकता था जो फल और फूलों से ,
ठूँठ बने दरख़्त कल के , चुक गये हैं फलते फलते ।

वो वारिस जिनकी किलकारियां , गूँजी थीं मेरे आँगन में ,
छोड़ कर चल दिए हमें , बेगाने  बनकर छलते छलते ।

9 टिप्‍पणियां:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर = RAJA Kumarendra Singh Sengar ने कहा…

बहुत सुन्दर, यथार्थपरक

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (22-07-2020) को     "सावन का उपहार"   (चर्चा अंक-3770)     पर भी होगी। 
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
सादर...! 
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
--

Unknown ने कहा…

आभार शास्त्री जी ।

Onkar ने कहा…

बहुत बढ़िया

मन की वीणा ने कहा…

बहुत सुंदर सृजन।

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

बहुत उम्दा और भावपूर्ण।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

भावपूर्ण छंद ... हर छंद जीवन की सच्चाई बयान करता है ...

Daisy ने कहा…

Best Valentines Day Roses Online
Best Valentines Day Gifts Online
Send Teddy Day Gifts Online

manish kumar ने कहा…

This is very neatly written article. I will sure to bookmark it and come back to learn more of your useful info.Thank you for the post. I will certainly return.