खामोशी भी
कुछ कहती हैं,
कभी आंखों से,
कभी चेहरे के भावों से
औ' कभी उतर कर कागजों पर।
हां उसको पढ़ना
सबके वश की बात नहीं।
करें भी अगर कोई सवाल उनसे,
जवाब भी वहीं से आयेगा
कभी आंखों में समायी नीरसता,
कभी चेहरे की नीरवता।
मौन टूटता ही नहीं
कभी मुखरित नहीं होता
गहराता ही जाता है।
इसको पढ़ना
आसान नहीं होता।
-- रेखा
