रविवार, 15 दिसंबर 2013

ख़ामोशी !

ख़ामोशी 
कुछ नहीं कहती है ,
मुखर नहीं होती ,
फिर भी 
किसी की ख़ामोशी 
कितने अर्थ लिए 
खुद एक कहानी 
अपने में समेटे रहती है। 
किसी की खोमोशी 
बढ़ावा देती है ,
अत्याचारों और ज्यादतियों को 
गूंगी जान 
बेजान समझ 
सब फायदा उठाते हैं। 
कोई ख़ामोशी 
मौन स्वीकृति भी है ,
बस जगह और हालात 
उसको विवश कर 
उसके ओठों को 
सिल  देते हैं।
उसके दर्द को कोई 
समझ नहीं पाता है। 
 एक ख़ामोशी 
 दिल पर लगे 
गहरे जख्मों के दर्द को 
चुपचाप ही पीती 
बस उसकी आँखें 
बयां करती उसके दर्द को। 
किसी ख़ामोशी में 
चेहरे  पर बिखरे भाव 
उद्वेलित मन का ताव 
सब कुछ कह जाते हैं। 
बस पढने वाला चाहिए 
ख़ामोशी नाम एक है 
उसके पीछे के अर्थ 
बस गढ़ने वाला चाहिए।  

शनिवार, 14 सितंबर 2013

पन्ने डायरी के !

 कभी पलटती हूँ,
 पन्ने डायरी के 
 यकीं नहीं होता 
 ये भी किसी की 
होती है जिन्दगी। 
पेज दर पेज 
खोले पढ़े 
तो लगा 
जैसे किसी के छाले उधड़ गए। 
उनसे रिसते लहू ने 
पन्नों को धो दिया। 
उजागर नहीं कर सकते 
फिर भी 
हर पन्ना 
उसका अपना हो 
ऐसा नहीं होता , 
किस दिन उसने 
किसका दर्द जिया 
किसका जहर पिया 
या किसका हास लिया। 
लिखा तो सब है 
लेकिन 
वे पन्ने एक बंद दस्तावेज हैं। 
किसी के दर्द को 
उजागर कैसे वो करे ?
दुनियां की समझ से परे 
सारी जिन्दगी एक डायरी में कैद है 
या सारी  दुनिया के दर्द 
उस डायरी में कैद हैं।

रविवार, 8 सितंबर 2013

माँ तेरी भावना !

माँ हर थाली में
तूने तो बराबर प्यार परोस
फिर क्यों
तेरे ही बेटे
दूसरे की भरी और अपनी खाली
देख रहे हैं थाली
उनकी नज़रों का धोखा है
या फिर
मन में रही भावना जैसी
ममता तेरी उमड़ रही है
अपने हर बेटे पर
पर ये बेटे क्यों
मैं ही क्यों?
मैं ही क्यों?
के नारे लगा रहे हैं
आज अशक्त जब है तू तो
इस घर से उस घर में
अपनी झोली फैला रही है
तेरी ही बहुएँ आज
अपनी संतति को
फिर उसी प्यार से खिला रही है
तेरे लिए उनके घर में
कुछ भी नहीं बचा है
तेरे बेटे उसके पति हैं
उसके बच्चे भी उसके हैं
पर ये तो बतला दे
तेरा भी कोई है या
फिर तू अकेली ही आई थी
रही अकेली , जी अकेली  
अब मरने को बैठी है अकेली
कहाँ गयी ममता की थाली
जिसमें भर कर हलुआ
तुमने इनको खिलाया था
आज वही हलुआ ढक कर
अपने बच्चों को खिलाती हैं
तेरा क्या होगा माँ?

शुक्रवार, 30 अगस्त 2013

पूर्व और पश्चिम !

हम पश्चिम को  
हसरत भरी 
निगाहों से देखते रहे . 
धीरे धीरे जीवन में 
उसको उतारने लगे 
पूरा नहीं तो 
अधकचरा हे सही 
उसे अपनाने लगे
खुद को प्रगतिशील कहलाने का 
शौक जो चढ़ा  था ,
बच्चों को दे दी आजादी 
अपने  मन  से जीने की .
लेकिन 
 बस  चूक गए 
उन्हें पश्चिम की तरह 
अनुशासन नहीं सिखाया ,
आत्मनिर्भर बनना  नहीं सिखाया .
अधकचरी संस्कृति को लेकर 
महत्वकांक्षी  तो बने 
लेकिन दिशा  भटकने लगे .
हमने उन्हें पश्चिम की तरह 
परिश्रम नहीं सिखाया।
जरूरत नहीं थी .
हम सक्षम जो हैं 
उन्हें उड़ने के लिए पंख देने को
सब कुछ मुहैय्या  करा दिया 
लड़खड़ाने लगे वे 
बहकने लगे कदम कदम पर 
क्योंकि जमीन तो 
उस रंग में न रंगी थी।
खुद भी  उसी  रंग में रंगने के लिए 
खुद को समर्थ कहलाने  के लिए , 
 पत्नी के रहते  
एक  और घर  बसाने  लगे। 
पश्चिम सा साहस  न जुटा  पाए .
चोरी छिपे जीते रहे,
जब खुला तो बिखरा परिवार 
तुम नहीं पत्नी दोषी बनी 
बांध कर नहीं रख पायी,
कोई जानवर नहीं 
कि  खूंटे से बाँध कर रखा  जाए उसे ।
पत्नी पश्चिम से नहीं थी।
कमाती वह नहीं है,
फिर वह कहाँ  जाए?
पश्चिम तो नहीं कि 
बच्चों को छोड़ दे  
कहीं और चली जाय.
क्योंकि उसके आगे 
एक प्रश्न बड़ा खड़ा है 
उसके चरित्र का 
वो कुछ नहीं कर सकती 
क्योंकि वो तो पश्चिम में नहीं जी रही है।
अगर वो ऐसा कर जाती 
तो समाज और अख़बार की 
सुर्खियाँ बन जाती ,
लेकिन पति 
दोहरा जीवन जीते हैं 
जिन्दगी को एन्जॉय करते हैं 
एक की उजाड़ कर 
दूसरे की मांग भरते है।

रविवार, 25 अगस्त 2013

हाइकू !

 रोज पढ़ती हूँ कि मौत ने घर चिराग बुझा दिया , कोई लहरों में समां गया , कितनों की मांग सूनी हो गयी , असाध्य रोग से परेशान ने मौत को गले लगाया . किसी ट्रक ने किसी को कुचल कर बच्चों के मुंह से निवाला  छीन लिया और न जाने क्या क्या ? बस ये शब्द ऐसे परिभाषित हो उठा और  हाइकू के रूप में ---

मौत 
------

मौत किसी की 
बरबादी होती है 
एक घर की। 
*******
मौत होती है 
किसी सुहागन की 
उजड़ी मांग। 
*******
इसके आते 
मुक्ति होगी कष्टों से 
राहत देगी। 
*******
उसकी मौत 
किसी को बोझ से ही 
मुक्ति मिलेगी। 
*******
अकाल मृत्यु 
भटकती आत्मा का 
वनवास है। 
******
महलों में से 
सड़क पर आते 
ऐसे भी देखा। 
*******
कुछ मुस्कराए 
कुछ ने आंसू गिराये 
वह तो गया। 
*******
श्मशान में ही
विरक्ति बसती है 
जीते सभी है। 
********
मौत तो है ही 
जिन्दगी की मंजिल 
पाना है इति। 
*******

सोमवार, 19 अगस्त 2013

दर्द अकेलेपन का !



दर्द
अकेलेपन का
कभी किसी ने सहा है,
सिर्फ इंसान ही नहीं
सभी इस दंश को जीते हैं।
इस धरा के
शाश्वत सत्य के चलते
अकेले आये हैं
और अकेले ही जायेंगे।
इस एकाकीपन  के दंश को
जिसने भी जिया
जीते हैं और फिर टूट जाते हैं।
भरे बाग़ में खड़ा
ठूँठ , जिसे
किसी पेड़ की शाखाएं
हरीतिमा के बिना  छू नहीं पाती  है।
सिमट जाते हैं पेड़
अपने में ही
इस डर  से कि  कहीं
ये सूखा  रोग
उसके हरे भरे कलेबर को
सुखा न दे कहीं।



निर्जन पगडंडी उदास सी
राही की राह  देखती हैं
जब उड़ती है  धूल
मानव , वाहन या हवाओं से
जी उठती हैं।
अब न धूल उड़ाती है हवाएं
न कोई राही गुजरता है
यहाँ से 
बस सुनसान से
अंधेरों का गम
उनको भी खाए जाता है .

दो जोड़ी
उदास आँखें
दरवाजे पर  बैठीं
किसी के  आने के इन्तजार में
पथरा गयीं है .
राह देखते देखते 
और अब खामोश सी 
निष्प्रभ सी स्थिर हो चुकी है ,
शायद जाने का वक़्त आ गया है . 





शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

धरती का बोझ !

विशाल और महान
कब इंसान
आकार  से हुआ है ?
नहीं तो रावण का
कभी पराभव न होता .
ऊँचे कद से
सिर्फ ऊपर का देख सकते हैं
नीचे तो इंसान भी
अदने से औ'
छोटे नजर आते हैं।
भूल जाते हैं वे
मंजिले भले ऊंची हो
जमी से जुड़ कर चलो तो
कभी ठोकर नहीं लगती
कदम तो बढ़ते ही हैं
पर्वतों तक जाने वाले
रास्ते भी जमीन से ही जाते हैं।
कदम बढ़ते हैं
हौसलों से
सोच से
और आपकी इंसानियत से
नहीं तो
निम्न सोच ,
गिरे आचरण वाले
महलों में रहें
या उड़े आसमान में
धरती के बिना
इंसान दफन नहीं होता .
उसका धरती से रिश्ता
आने से लेकर
जाने तक
कभी ख़त्म नहीं होता।
इसलिए धरती पर रह कर
धरती पर ही चलें
तो आसमान की ऊँचाइयाँ भी
अपनी हो सकती है .
लेकिन
दर्प , अहंकार और मद
भ्रमित इंसान
जब धरती से उठ जाता है
तो 
धरती भी अपने को
उसके बोझ से 
मुक्त पाकर खुद को
हल्का महसूस करती है।


सोमवार, 29 जुलाई 2013

क्या हो रहा है?

चुनाव  अब धीरे धीरे  करीब आ रहे हैं और सब  अपनी छवि  के लिए  राजनैतिक समीकरण जिस तेजी से पूरे देश को उद्वेलित कर रहे हें लगता है कि सारे दलों के लोग अब बिल्कुल दूध के धुले होकर हमारी (जनता) की शरण में आने वाले हें लेकिन दलों की नीतियां भी तो देख लीजे फिर विश्वास कीजिये


ये दल और दलों के सिरमौर
जो कर रहे हें,
उसके लिए हम रोज
सवेरे उठकर अखबार बताने लेगे  हैं

जो उजला भी नहीं है,
गले तक कालिख पी चुके हैं 
कपड़ों की कालिमा से सने है
उसको ही चमकाने में लगे हैं,

उसकी चमक से उजले होंगे जैसे ,
देश के सारे काले कारनामे 
गुणगान करते उन्हीं लोगों के

सारे काले कारनामें छिपाने में लगे हैं

कीचड उछालते हैं दूसरों पर
छीटें कहाँ तक आये
इसे भूल कर वे
खुद को पाक बताने में लगे हें

अँधेरे के साए बसते जहाँ है,
जहाँ जिन्दगी जी रही सड़क पर,
जूठन चाट कर बचपन जी रहा है ,
उन्हें महलों के काबिज बताने में लगे हैं . 

उनके  नाम पर लगे दाग ,
दिखते नहीं है उन्हें कभी

शीशे के ऊपर लगे हैं परदे 
और गहरे चादर से छुपाने में लगे हें

कर रहे है प्रशस्ति उनकी
कल तक जो थे पराये,
इज्जत बचा लें उनकी यही सोच से तो
घर में अपने बुलाने में लगे हैं

इतने साल से समझ कर दीन हीन 
तिरस्कार का तोहफा जिन्हें दे रहे थे,
दिखने लगे जो दबंग सा कलेवर
उन्हीं को फिर से रिझाने में लगे हें

कल इन्हीं ने खींची थी रेखा
देश को वर्गों में बांटने की 
अब रचने लगे ऐसे पैमाने 
गरीबों को अमीर बनाने में लगे हें

खुद बन रहे हें कुबेर पुत्र
निरंकुश , स्वेच्छाचारी , स्वयंभू
डूबे सत्तामद में गले तक 
अंधी कमाई करने में लगे हें

दिन भर जो खोदते हें मिट्टी
और पत्नियाँ ढो  रही हैं सिरों पर,
जो कभी कभी सोते  हैं भूखे
उनकी गरीबी का नाम मिटाने  में लगे हैं

अकूत सम्पदा के ढेर पर हें बैठे,
फिर अभी लिप्सा शेष उनमें 
लूटने चले हैं उनकी कमाई
औरों का चैन चुराने में लगे हें

मरने दो भूखे
बढ़ने दो महंगाई 
मिटा कर कागजों पर गरीबी

अब अपनी सत्ता बचाने में लगे हें


सोमवार, 22 जुलाई 2013

तस्मै श्री गुरुवे नमः !

गुरुवर तुमि नमन औ' वंदन बारम्बार ,
भाव सुमन अर्पित है करिए स्वीकार . 

शिशुपन से जो थामा मुझको ,
पग पग पर ये ही डगर दिखाई . 

काँपे पग डरसे या मन घबराया   
तुरत ही अपनी अंगुली थी  थमाई . 

सत-असत की धूप -छाँव से
बचने की तुमने ही तो जुगत बताई . 

रोशन की आस मुक्ति मार्ग की 
फिर  मन में एक अलख जगाई . 

तम कितना ही गहरा क्यों न हो ?
किरण आस की उसमें दिखलाई . 

साथ छोड़ने  से पहले  मुझको ,
पार होने को एक पतवार थमाई .

 

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

अमल तो करें !

रिश्ते हैं एक पौध
पलते है जो दिलों में 
प्यार का पानी दें,
हवा तो दिल देता है 
फिर देखो कैसे ?
हरे भरे होकर वे
जीवन महका देंगे

अकेले और सिर्फ 
अपने  की खातिर 
अपने सुख की खातिर 
जीना बहुत आसन है ,
सोच बदलो 
औरों के लिए भी 
जीकर देखो तो वे 
बहुत  कुछ  सिखा देंगे . .

पानी किसी भी पौध में दें  
जरूरी नहीं कि 
अपनी ही बगिया का  हो ,
फूल  खिलेंगे और  महकेंगे 
खुशबू बिखरेगी 
बिना भेद के होता कैसे 
गैरों  से प्यार दिखा देंगे .
 
.इतना छोटा नहीं 
इंसान से इंसान का रिश्ता 
चीरों जिगर को  
सबमें बस वही सब होगा 
देख कर जान लेना 
फर्क  है दिल और जिस्म में 
धर्म , जाति , गरीब और अमीर के 
इस सोच को पल में मिटा देंगे .

एक हैं सब धरती पर 
एक से जज्बात हैं ,
अगर सीखने का जज्बा है 
जानने की मर्जी है तो 
इंसान से इंसान को 
जोड़ें हम कैसे 
वे उस प्यार की  
ऐसी इबारत लिखा देंगे . 

 


गुरुवार, 18 जुलाई 2013

शिकायत !

 आँखें बंद करके नज़रें  क्यों  चुराई तुमने?
खोल कर चुराते तो भी न शिकायत होती .

कब क्या  चाहा है तुमसे  मुहब्बत ने मेरी?
बस याद करने की  मुझे इजाजत तो  होती .

बदले में कुछ भी गर चाहते  तो फिर ये 
दुनियां  की नजर में  तिजारत ही होती .

हक मेरे  किसको  दिए ये न शिकवा मुझको ?  
गम भी मेरे न बाँटते इतनी इनायत तो होती .

अहसास मेरे होने का बनाये रखते जो दिल में 
मेरे अहसासों की तेरे दिल में हिफाजत तो होती . 

सोमवार, 8 जुलाई 2013

बहुत दिया जिन्दगी तूने ! (ARUNA)

 जिन्दगी 
मुझे तुझसे
कोई  शिकायत नहीं 
जो भी  दिया 
 बहुत काफी है ,
क्योंकि 
तूने मुझे संतोष दिया है .
 देने को 
औरों के लिए 
वह सम्पदा दी है 
जो कभी ख़त्म  नहीं होगी 
 जिसे जरूरतमंद देखा 
उसे भरपूर दिया 
मुझे तूने प्यार इतना  दिया है ..
दौलत तो नहीं दी 
अथाह ,असीमित  
 लेकिन इतनी तो दी ,
खाली झोली में 
कुछ तो डालो 
भूखे न सोये कोई 
ऐसे विचार तो तूने  ही  दिए हैं . 
महल नहीं
बंगला भी नहीं ,
इस धरती पर 
एक झोपड़ी तो दी है ,
जिसकी छत तले 
 दे सकूं पनाह 
खुले आसमान तले
 जीने  वालों को 
ऐसी सोच भी तूने ही तो दी है .

गुरुवार, 27 जून 2013

कदमों तले धरा !




कभी सोचा है 
शायद नहीं ,
धरा जो जननी है ,
धरा जो पालक है ,
अपनी ही उपज के लिए 
मूक बनी ,
धैर्य धारण किये ,
सब कुछ झेलती रही .
धरा रहती है भले ही 
सबके कदमों के नीचे 
पर ये तो नहीं 
कि वो सबसे कमजोर है .
हमारे कदमों तले ,
ऊँचे पर्वतों तले,
सरिता और वनों तले ,
गर्वित तो ऊपर वाले हैं .
पर्वत गर्व करें अपनी उंचाई का 
मनुज गर्व करे सामर्थ्य का ,
उसके गर्भ से खींच कर तत्व सारे 
खोखला कर दिया ,
लेकिन ये भूल गए 
धरा के बिना खड़े नहीं रह पायेंगे 
खोखले गर्भ से 
कब तक पालेगी तुम्हें?
कांपती है जब वह  क्रोध से 
धराशायी होते वही हैं 
जो धरा को पैरों तले मानते हैं .

पर्वतों की श्रृंखला भी 
पत्थरों में टूट टूट कर 
शरण वही पाते हैं .
औ'
विशाल हृदया धरा भी 
टूटते गर्व से 
बिखरे पर्वतों को शरण में 
अपने लेती रही है .
वेग से आती धाराएं भी 
धरा की गोद में 
शांत हो फैल जाती है,
भूल जाती हैं 
वे वेग अपना ,
माँ  के आँचल में समां जाती है .
वो सबके कदमों तले रहकर भी 
अपने कदमों में झुका  देती है 
और दिखा देती है 
वो जीवन देती है तो 
जीवन लेती भी है . 

गुरुवार, 14 मार्च 2013

रुको सोचो और बढ़ो !

घर की 
इमारत तो बनेगी 
तभी 
जब 
नींव के पत्थर 
संस्कारों के गारे से 
जोड़ जोड़ कर 
उसे पुख्ता करने की बात 
 हमारे जेहन में होगी .
गर हाथ हमारे 
कांपने लगे 
औरों के डर से 
आकार ही न दे पाए,
तो वो फिर टूटकर 
बिखर जाने का 
एक अनदेखा भय 
मन में सदा ही 
 करवटें बदलता रहेगा .
पहले हम दृढ हों ,
मन से , विचारों से 
ताकि बिखरती सन्तति को 

 अपने दृढ विचारों 
और दृढ संकल्पों का 
वह स्वरूप दिखा सकें 
जिसकी जरूरत 
आज सम्पूर्ण 
मानव जाति  को है. 
उनका भटकाव 
उनके बहकते कदम 
उनकी नहीं 
हमारी कमी को दर्शाते हैं 
कुछ कहीं तो है ऐसा 
हम उन्हें समझ नहीं पाए 
या फिर उन्हें समझा नहीं पाए .
सदियों से
बड़ों ने ही दिशा दी है 
फिर क्यों ?
हम खुद दिग्भ्रमित से 
उनको दिशा नहीं दे पाए ,
कहीं हम भी तो 
जाने अनजाने में 
दिग्भ्रष्ट तो नहीं हो गए .
उसका प्रतिफल 
हम देख रहे हों . 
अगर ऐसा ही है 
तो फिर थामो कदम अपने 
अभी देर नहीं हुई ,
जो चलना सीख रहे हैं 
उन्हें संस्कारों की 
डोर थमा दें और फिर 
अपने आदर्शों की तरह 
इस समाज को नवरूप दें . रुको सोचो और बढ़ो !

बुधवार, 6 मार्च 2013

दोषी कौन ?

माँ  पालती है अपने गर्भ में सभी को एक तरह 
फूलों की जगह उगे कांटे तो उसका दोषी कौन ?

आँचल से लगाकर दूध पिलाया था सबको एक तरह 
कोई बना मानव,कोई निकला शैतान तो दोषी कौन? 

बस एक को छोड़ कर हर औरत होती है रिश्ते में ,
माँ, बहन,बेटी ,नजर हो नर की ख़राब तो दोषी कौन?

युगों के बाद भी नर होने का घमंड  और आतंक
बन कर खून तुम्हारी रगों में दौड़े तो दोषी कौन? 

नजरें बदली, बदले  मूल्य भूले रिश्तों की  गरिमा 
दहलीज के बाहर सबको समझे मादा तो दोषी कौन ? 


सोमवार, 4 मार्च 2013

हाईकू !

शपथ ले लो 
संघर्ष बंद न हो 
न्याय लेना है. 
*******
दृढ निश्चय 
मजबूत इरादे 
नारी ही होगी ।
********
ज्योति दिए की 
अंधकार चीरेगी 
जग जागेगा .
********
बोये तो कांटे 
उगे  न फूल तो है 
दोषी धरती?
*******
संस्कार दें 
अपने आँचल में 
युग बदलें .
********
कोख नारी की 
शिक्षा दबंगों की हो 
दोषी कौन है? 
*******

शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

हाईकू !

रिश्तों में देखें
ईमान भावना का
ताउम्र रहें .
********
रिश्ते का घर
प्रेम से ही जोडिए
पुख्ता रहेगा .
******
कौन करेगा
रिश्तों में वो यकीन
जिसे होना हो।
*******
 माँ की कोख से
मैं बुजुर्ग हो गयी
दिए तानों से .
******
नारी दिवस
कुछ भाषण दिए
फिर गालियाँ . .
*******.
सृष्टि बदलो
गर्भ में अब से ही
बेटों को मारो.
*******
 लाशें पूछती 
सवाल हैवानों से 
मेरा कुसूर ? 
********
मंशा अपनी 
हमको बताये वे 
देना आता है. 
*******
रक्त पिपासु 
ये निर्दोषों का रक्त 
व्यर्थ न होगा .
********
रोती आँखों से 
सवाल करते वे 
मेरा कुसूर ? 
*******
खबर मिली 
चुप बैठे हैं हम 
हादसा हो तो .
*******



गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

हैवानियत का खेल !

बम के धमाके 
चीखें, खून और लाशें 
कुछ पल पहले 
वह जिन्दगी के लिए 
खरीद रहे थे ,
फल , कपडे और जीने के लिए और कुछ 
और एक वो पल 
जिसने उन्हें 
इंसान से लाश बना दिया, 
पैरों पर खड़े लोगों को 
अस्पताल पहुंचा दिया .
गोली , बारूद और धमाकों के 
जिम्मेदार पागल लोग कहते हैं 
कि  हम धर्म के लिए 
लड़ रहे हैं .
कुछ दहशतगर्दों  की 
मौत का बदल ले रहे है।
उनसे ही एक सवाल ?
किस धर्म ने कहा है -
इंसान को मार दो 
किस धर्म ने कहा -
उसके नाम पर 
अंधे होकर जिन्दगी छीन लो. 
क्यों अपनी कुंठाओं और वहशत को 
धर्म औ' वर्ग का नाम देते हो. 
खून का कोई रंग नहीं 
कि  मरने वालों का धर्म बता दे ,
मरने वाले सिर्फ इंसान होते हैं 
रोते बिलखते परिवार 
कोई अपना ही खोते है .
जब देने को कुछ नहीं ,
तुम्हारे पास उनको 
क्यों छीनते हो ?
साया उनके सिर से बाप का 
चिराग किसी घर का 
पालनहार  कितनी जिंदगियों का 
 क्या बिगाड़ा है तुम्हारा ?
तुम्हारा जो भी धर्म हो 
एक तरफ खड़े हो जाओ 
खुदा  या ईश्वर  की दुहाई देने वालो 
देखना है कि 
कितने लोग तुम्हारी जमात में आते हैं .
हैवानियत का खेल 
इस जहाँ से 
इंसानियत को मिटा नहीं सकती . 
कोई ताकत तुम बचा नहीं सकती .

सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

ओ गांधारी जागो !




ओ गांधारी जागो !
जानबूझ कर 
मत बांधो आखों पर  पट्टी ,
सच को न  देखने का 
बहाना सब खोज रहे  हैं ,
तुम्हारी आड़ लेकर 
सिर्फ गला फाड़कर  चीखने से 
आँखें बंद  कर चिल्लाने   से 
मानव नहीं बदलते है 
गांधारी अपनी पट्टी खोलो 
आँखों के  
अब वक्त आ गया है
 दुशासन का नहीं
अर्जुन पैदा करना का।
अब अनुगमन का नहीं
अग्रगमन के लिए हो प्रतिबद्ध
अपने घर के लाड़लों को
 किसी शकुनि के हाथ  नहीं
अपने साथ ले
द्रोपदी को बेइज्जत नहीं
इज्जत करने की सीख देनी होगी 
 तुम्हें अब गांधारी नहीं
बल्कि कुंती बनना होगा।
पांडव जैसे   बनाकर
अपने पुत्रों को
इस देश की मिटटी की गरिमा से
अवगत कराना  होगा .
ये काम सिर्फ तुम कर सकती हो जैसे
उन्हें जन्म  सिर्फ तुम दे सकती हो
वैसे ही उन गुणों की सीख  
सिर्फ तुम और तुम ही दे सकती हो।
सत्ता का मद
या हवस स्वामित्व की
अहम् से  सराबोर बेटों  की अब जरूरत नहीं
ये तो तुम भी जानती हो
अपने वंश के नाश की
त्रासदी झेली है तुमने
अब अपने लाडलों की परवरिश
खुली आँखों से
जागरूक होकर
अपनी कोख  को
लज्जित होने से 
बचाना होगा।
तभी तो
भविष्य में
इस भारत में
कई महाभारत के युद्ध
टाले जा सकेंगे

गुरुवार, 14 फ़रवरी 2013

रिश्तों की नींव!

जोड़ते है 
जब रिश्तों को 
उसमें खून नहीं 
प्यार का सीमेंट चाहिए .
बहुत पुख्ता होते हैं 
वे रिश्ते जिन्दगी में 
गर उनमें न हो 
मिली रेत स्वार्थ की 
या मिटटी गर्ज की 
वे ताउम्र चलने की 
ताकत रखते हैं।
जिन्दगी के  झंझावातों से 
दरकते नहीं ,
तूफानों  में भी 
उनकी नींव हिलती नहीं,
जरूरी नहीं 
वे जुड़े हों 
साथ साथ रहने से 
दूर बहुत दूर 
जिन्दा वे रहते हैं .
ऐसे रिश्तों की 
बस क़द्र कीजिये 
न कोई नाम दीजिये 
न चस्पा कीजिये 
लेबल किसी समूह का।
प्यार ही उसकी 
जाति ,धर्म और कर्म 
बनाये रखिये।
मिसाल  बन याद किये जाते हैं 
इंसानों  के ही  नाम लिए जाते हैं।

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

हाईकू !

खौफ से भरी 
डबडबाई आँखें 
न बोलें कुछ।
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मासूम बच्ची 
लाश बना दी गयी 
प्रश्न शेष हैं।
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क़ानून तो हैं 
किताबों में रहेंगे 
न्याय न मिला।
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मत दीजिये 
हक मेरे मुझको 
खुद ले लूंगी।
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दौलत रहे 
बेटों को मुबारक 
प्यार हमें दें।
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तुम याचक 
दाता तो मैं रहूंगी 
जन्म जो दिया .
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क्षितिज पार 
गया है क्या कोई भी 
कल्पना ही है। 
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कविता नहीं 
ये दर्द ही  है मेरा 
उबल पड़ा 
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कलम थमी 
इबारत न सही 
स्याही बहेगी।
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बुधवार, 30 जनवरी 2013

सोच बदलें !

हम इंसान है,
हम सृष्टि के 
बुद्धिमान प्राणी हैं,
बुद्धि, विवेक , दया , ममता 
सिर्फ इंसान में 
प्रकृति ने दी थी .
फिर क्या हुआ ?
इंसान में से 
एक एक करके 
किसी में कुछ 
किसी में कुछ 
ये गुण साथ छोड़ने लगे ,
फिर आज वह 
पशु से भी नीचे 
गिर गया 
वह अपने कर्मों से 
अपनी सोच से 
अपनी दृष्टि में 
हैवान से भी बड़ा हो गया .
अब कौन सा परिवर्तन 
कौन सा कदम 
उन्हें वापस इंसान 
बनाने के लिए 
उठाना होगा . 
ये तो तय है अब 
ये काम अब इश्वर नहीं 
बल्कि हमको करना होगा .
वो जो हम भूल गए 
अपने में खो कर 
कुछ कहीं भूल गए 
अब बचपन जब 
माँ के  आँचल में नहीं ,
नानी और दादी की गोद  में नहीं 
रिमोट, कंप्यूटर , वीडिओ गेम में आँख खोलेंगे 
तो फिर संस्कार भी तो 
उनसे ही मिलेंगे न। 
अब हम जागें 
फिर से 
अपनी दादी नानी की तरह 
नयी पौध के अबोध मन को 
कच्ची मिटटी की तरह 
एक सांचे में ढालना होगा 
तभी तो फिर से 
हम संस्कारों से उनको 
सुसंस्कारित कर  
मानवता के रिश्तों के 
नए अर्थ समझा पायेंगे 
उन्हें फिर नारी में 
माँ, बहन और बेटी के 
रूपों को दिखा पायेंगे। 
आदर , स्नेह, निष्ठां के 
सही अर्थों को सिखा पायेंगे .



शनिवार, 19 जनवरी 2013

आजाद ही रहेंगे !

हम आसमान की 
ऊँचाइयाँ छू रहे हैं,
देखा नहीं जाता 
फिर बंदिशों के ताले में 
कैद करने की 
साजिशें रच रहे हो .
ये बंदिशें सिर्फ  
हम पर ही क्यों लगें?
कभी अपने पर 
अंकुश लगाने की सोची ?
नहीं 
आखिर क्यों नहीं?
इतिहास की तरफ 
अंगुली उठा रहे हो 
चाहते हो 
फिर से कैद करके
हमें महफूज़ तुम रखोगे 
महफूज़ हो तुम कहकर 
सेहरा अपने सिर 
बाँधना चाहते हो।
इन बेड़ियों में रहकर 
सितम जो हमने सहे हैं 
उनको अभी भूले नहीं है .
महफूज़ के नाम पर 
गुलामी हमने की है 
दो रोटियों और धोतियों की खातिर 
पूरी जिन्दगी हमने दी है।
चिराग भी दिया है 
खानदान को तुम्हारे 
तुमने क्या दिया था ? 
आजाद हो चुके हैं 
आजाद ही रहेंगे .

 बगावत जो हमने की है 
वो जारी अभी रहेगी।
आजाद ही रहेंगे
महफूज़ भी रहेंगे।
तुम न रख सके 
तो हम दुर्गा बन रहेंगे 
सीता बन जी चुके बहुत 
अब दुर्गा बन जियेंगे 
अब काली बन जियेंगे।  

शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

हाइकू !

क़ानून तेरा 
मुझे क्या न्याय देगा ?
खुद करूगी।
*******'
चेहरे ढके 
क्या गुनाह छिपेगा ?
धिक्कारते हैं।
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मशालें जलीं 
ज्वालामुखी न बनें 
हदें जान लो।
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कैद कर दो,
सिफारिशे हो रही 
हदें जान लो। 
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हमारे लिए 
इतिहास की बात 
खुद खुदा हैं। 
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उड़ाते हैं वे 
कीचड हम पर 
सने खुद हैं।
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वे चाहते है  
हम भटक जाए 
इस जंग से .
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इस जंग में 
हौसले से लड़ना 
जीत हमारी।
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मंगलवार, 8 जनवरी 2013

रक्तबीज और महाकाली !



मैं  "दामिनी "
तुम्हें चुनौती देती हूँ ,
मैंने अपना बलिदान दिया
या फिर तुमने
मुझे मौत के हवाले किया हो ,
तब भी मैं
अब हर उस दिल में
जिन्दा रहूंगी,
एक आग बनकर ,
जब तक कि 
इन नराधम , अमानुषों को
उनके हश्र तक न पहुंचा दूं।
सिर्फ वही क्यों?
उस दिन के बाद से
मेरी बलि के बाद भी
अब तक उन जैसे
सैकड़ों दुहरा रहे हैं इतिहास ,
वो इतिहास जो
मेरे साथ गुजरा था
रोज दो चार मुझ जैसी
मौत के मुंह में जाकर
या फिर
मौत सी यंत्रणा में
जीने को मजबूर हैं।
वे तो अभी दण्ड के लिए
एकमत भी नहीं है ,
और हो भी नहीं पायेंगे .
क्यों?
इसलिए की उनके अन्दर भी
वही पुरुष जी रहा है,
क्या पता
कल वही अपने अन्दर के
नराधम से हार जाएँ ?
और वह भी
कटघरे में खड़े होकर
उस दण्ड के भागीदार न हों।
अभी महीनों वे
ऐसे अवरोधों के चलते
और ताकतवर होते रहेंगे।
अब मैं नहीं तो क्या ?
हर लड़की इस धरती पर
महाकाली बनकर जन्म लेगी
और इन रक्तबीजों के
लहू से खप्पर भरकर
बता देंगी कि
अब वे द्रोपदी बनकर
कृष्ण को नहीं पुकारेंगी।
खुद महाकाली बनकर
सर्वनाश करेंगी।
इन रक्तबीजों के मुंडों की माला
पहन कर जब निकलेगी
तो ये नराधम
थर-थर कांपते हुए
सामने न आयेंगे .
हमें किसी दण्ड या न्याय की
दरकार होगी ही नहीं,
वे सक्षम होंगी
और समर्थ होंगी।
ये साबित कर देंगी।
ये साबित कर देंगी।