सोमवार, 19 अगस्त 2013

दर्द अकेलेपन का !



दर्द
अकेलेपन का
कभी किसी ने सहा है,
सिर्फ इंसान ही नहीं
सभी इस दंश को जीते हैं।
इस धरा के
शाश्वत सत्य के चलते
अकेले आये हैं
और अकेले ही जायेंगे।
इस एकाकीपन  के दंश को
जिसने भी जिया
जीते हैं और फिर टूट जाते हैं।
भरे बाग़ में खड़ा
ठूँठ , जिसे
किसी पेड़ की शाखाएं
हरीतिमा के बिना  छू नहीं पाती  है।
सिमट जाते हैं पेड़
अपने में ही
इस डर  से कि  कहीं
ये सूखा  रोग
उसके हरे भरे कलेबर को
सुखा न दे कहीं।



निर्जन पगडंडी उदास सी
राही की राह  देखती हैं
जब उड़ती है  धूल
मानव , वाहन या हवाओं से
जी उठती हैं।
अब न धूल उड़ाती है हवाएं
न कोई राही गुजरता है
यहाँ से 
बस सुनसान से
अंधेरों का गम
उनको भी खाए जाता है .

दो जोड़ी
उदास आँखें
दरवाजे पर  बैठीं
किसी के  आने के इन्तजार में
पथरा गयीं है .
राह देखते देखते 
और अब खामोश सी 
निष्प्रभ सी स्थिर हो चुकी है ,
शायद जाने का वक़्त आ गया है . 





5 टिप्‍पणियां:

राजेंद्र कुमार ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!

निहार रंजन ने कहा…

एकाकीपन के दर्द का सच्चा बयान. बहुत अच्छी लगी रचना.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

ज़िंदगी की सच्चाई से रु ब रु कराती गहन अभिव्यक्ति

sushma 'आहुति' ने कहा…

बहुत ही गहरे भावो की अभिवयक्ति......

शिवनाथ कुमार ने कहा…

अकेलापन अक्सर उदासी ही लाती है
सार्थक व सुन्दर रचना