मैं एक मीटिंग में थी और वहां का जो दृश्य था , एक मिनिस्ट्री स्तर की मीटिंग हो रही थी, उच्च पदों पर विराजमान लोगों की बात और तब मुझे लगा कि वे जो कुछ भी नहीं जानते हैं, इस शोध की दिशा में कैसे टांग अडाते हैं, सिर्फ इसलिए कि उनके पास उस शोध को आगे ले जाने के लिए सहायता देने का अधिकार है. उनके आक्षेप और फिर प्रत्याक्षेप सुनकर बहुत दुःख हुआ और फिर वही उसी मीटिंग में इस कविता का जन्म हुआ।
०४/०५/०९
अरे बुद्धिजीवियो
क्यों?
इस तरह उड़ा रहे हो
धज्जियाँ,
इस नई पद्धति और शोध की
जिसने पौध लगाई,
सींचा है -
अपने खून - पसीने से
उसको ही
बताने चले हो
अब उसे क्या करना है?
कल तक
इस दिशा में
अनजान थे तुम
औ' आज आलोचक
भी बन गए।
अंगुली उठाने से पहले
ये तो सोचा होता
वे तीन अंगुलियाँ
तुम्हारी तरफ है,
तुमसे कह रही हैं
चुप रहो
तुम्हें इससे
कुछ भी लेना-देना नहीं है।
इस लिए
बकवास बंद करो,
मत उछालो कीचड़
किसी की गरिमा पर
बोलना सबको आता है
बस किसे ,क्या और कब
बोलना है,
ये गरिमा है - उस मानव की
जो मानव है,
विवेक और शालीनता
जिसके लिए ही बने हैं,
आदर , सम्मान और कृतज्ञता
उसके मन में भी है
वही किसी से
कुछ पा सकता है,
कुछ पाना है
तो कुछ देना भी सीखो।
लेने से कोई छोटा
नहीं होता,
देने से
कभी घाटा
नहीं होता,
कुछ ऐसा करो
कि बाद तुम्हारे
भी कोई
याद करे तुमको
अच्छे स्वर में .
नफरत और हिराकत
से कुछ हासिल नहीं होता।
अपने मस्तक
तिलक लगाने से
कोई काबिल नहीं होता.
Friday, May 22, 2009
चुनाव - आंतरिक युद्ध
महासमर
जिसको कहते रहे सब,
क्या वाकई
एक आंतरिक युद्ध है ?
वही तो है --
देश कहाँ है?
कहाँ जा रहा है?
क्या भविष्य होगा?
इसकी किसको ख़बर है,
बस इतना ही तो है,
हम तुमपर
औ' तुम हमपर
कीचड़ उड़ा रहे हैं,
हमसे (जनता)
कभी जानना चाहा है
किसे चाहती है?
क्या चाहती है?
अपनी - अपनी
स्वार्थी नीतियों को
चाशनी में डुबोकर
सबके सामने
परोसते रहे हैं।
कुछ नहीं दिखता है
एक घना अँधेरा है
हर तरफ
एक लड़ाई -- जिसमें
न तलवारें खिंचीं -
न गोलियां चलीं -
चलते रहे वाक् शर
आक्षेप , प्रत्याक्षेप ही
वह अस्त्र बने
गरिमा जिसने
तार-तार कर दी।
अपनी दुश्मनी का
बदला लेने
बहुत अच्छा मौका मिला,
अपराधी खुले घूमने लगे
और
चुनाव की आड़ में
शक्ति का
खुला दुरुपयोग हुआ।
दलों की अपनी
अलग अलग नीति हैं
नहीं पता है उनको
कि समृद्धि है किसमें
कहाँ उपयोग करें ?
हम अपने विवेक का--
विवेक धन
कहाँ जा रहा है?
पार्कों, स्मारकों या फिर
अपनी जन्म स्थली को
चमकीले सितारों से
सजाकर
इतिहास लिखने में
इसका यह तो
नहीं मतलब
कि आप इस काबिल हो गए,
कि देश सौंप दें तुमको ,
जो नहीं जानते
कि हम कहाँ हैं?
और हमें कहाँ जाना है?
प्रगति की जरूरत कहाँ है?
विवेकहीन निर्णय
वही बन्दर के हाथ
रिमोट आ गया
क्या करना है?
इसको उसको बुद्धि कहाँ है?
और उसकी तरह ही
कुछ और बन्दर
जय हो , जय हो,
कहकर पीछे चल रहे हैं?
भोला भाला जनमत ठगा जा रहा है
कहीं तो कुछ
नजर नहीं आ रहा है।
वे विवेकहीन सही,
हमें तो देश बचाना है,
अपने निर्णय को
सार्थक दिशा में
लगाना है.
जिसको कहते रहे सब,
क्या वाकई
एक आंतरिक युद्ध है ?
वही तो है --
देश कहाँ है?
कहाँ जा रहा है?
क्या भविष्य होगा?
इसकी किसको ख़बर है,
बस इतना ही तो है,
हम तुमपर
औ' तुम हमपर
कीचड़ उड़ा रहे हैं,
हमसे (जनता)
कभी जानना चाहा है
किसे चाहती है?
क्या चाहती है?
अपनी - अपनी
स्वार्थी नीतियों को
चाशनी में डुबोकर
सबके सामने
परोसते रहे हैं।
कुछ नहीं दिखता है
एक घना अँधेरा है
हर तरफ
एक लड़ाई -- जिसमें
न तलवारें खिंचीं -
न गोलियां चलीं -
चलते रहे वाक् शर
आक्षेप , प्रत्याक्षेप ही
वह अस्त्र बने
गरिमा जिसने
तार-तार कर दी।
अपनी दुश्मनी का
बदला लेने
बहुत अच्छा मौका मिला,
अपराधी खुले घूमने लगे
और
चुनाव की आड़ में
शक्ति का
खुला दुरुपयोग हुआ।
दलों की अपनी
अलग अलग नीति हैं
नहीं पता है उनको
कि समृद्धि है किसमें
कहाँ उपयोग करें ?
हम अपने विवेक का--
विवेक धन
कहाँ जा रहा है?
पार्कों, स्मारकों या फिर
अपनी जन्म स्थली को
चमकीले सितारों से
सजाकर
इतिहास लिखने में
इसका यह तो
नहीं मतलब
कि आप इस काबिल हो गए,
कि देश सौंप दें तुमको ,
जो नहीं जानते
कि हम कहाँ हैं?
और हमें कहाँ जाना है?
प्रगति की जरूरत कहाँ है?
विवेकहीन निर्णय
वही बन्दर के हाथ
रिमोट आ गया
क्या करना है?
इसको उसको बुद्धि कहाँ है?
और उसकी तरह ही
कुछ और बन्दर
जय हो , जय हो,
कहकर पीछे चल रहे हैं?
भोला भाला जनमत ठगा जा रहा है
कहीं तो कुछ
नजर नहीं आ रहा है।
वे विवेकहीन सही,
हमें तो देश बचाना है,
अपने निर्णय को
सार्थक दिशा में
लगाना है.
Friday, March 6, 2009
होली आई रे!
होली के रंग,
खेलें अपनों के संग
पी के मस्ती की भंग ,
नाचें ले के तरंग
कर लो सबको तुम तंग ,
यह है होली का ढंग .
डालो रे रंग ही रंग , ......
हंसी, ठिठोली कर
ऐसा नाचो गाओ
मारे ठहाके
हों जिनके दिल तंग,
नाचो और नचाओ
गीत गाकर शोर मचाओ
होली आई रे
होली आई रे
तुम खूब धूम मचाओ
होली है .सब मिलकर मौज मनाओ
रंजिश हर दिल की मिटाओ
सब से प्रेम से मिल जाओ
और गीत प्रेम के गाओ
इसी धूम के साथ हमारी
होली की शुभकामनाएं.........
खेलें अपनों के संग
पी के मस्ती की भंग ,
नाचें ले के तरंग
कर लो सबको तुम तंग ,
यह है होली का ढंग .
डालो रे रंग ही रंग , ......
हंसी, ठिठोली कर
ऐसा नाचो गाओ
मारे ठहाके
हों जिनके दिल तंग,
नाचो और नचाओ
गीत गाकर शोर मचाओ
होली आई रे
होली आई रे
तुम खूब धूम मचाओ
होली है .सब मिलकर मौज मनाओ
रंजिश हर दिल की मिटाओ
सब से प्रेम से मिल जाओ
और गीत प्रेम के गाओ
इसी धूम के साथ हमारी
होली की शुभकामनाएं.........
Monday, February 16, 2009
सफर
जीवन का यह सफर
बस
एक परिक्रमा है,
बार-बार शुरू होती है,
सुबह से शाम तक
वही गलियाँ औ' रास्ते ,
छाँव भरे पल कब गुजरे
छाँव में पता नहीं चले,
जब फिर धूप मिली
तो कहीं छाँव नहीं थी।
थकते, लड़खडाते कदम
रुक तो नहीं सकते
सफर अभी बाकी है,
चलना औ' चलते जाना है।
किसी छाँव की आस में
बरसों धूप में गुजरे
मुश्किल से
पत्थरों पर जिए,
घावों पर
पैबंद सिये,
विवशता में
खून के घूँट पिए,
बस यही
घाव अपने दिल में लिए,
चलते ही रहे हम।
पर
हर एक परिक्रमा
वही लाकर खड़ा कर देती है
जहाँ से सफर शुरू किया था।
फिर नया सफर
नए आशियाँ की तलाश में
तिनके-तिनके समेटे किसी पेड़ पर
नया आशियाँ बनाना है
सफर अभी बाकी है
औ' फिर चलते ही जाना है.
मंजिल का पता नहीं।
चलना ही नियति है
चलते ही जाना है.
बस
एक परिक्रमा है,
बार-बार शुरू होती है,
सुबह से शाम तक
वही गलियाँ औ' रास्ते ,
छाँव भरे पल कब गुजरे
छाँव में पता नहीं चले,
जब फिर धूप मिली
तो कहीं छाँव नहीं थी।
थकते, लड़खडाते कदम
रुक तो नहीं सकते
सफर अभी बाकी है,
चलना औ' चलते जाना है।
किसी छाँव की आस में
बरसों धूप में गुजरे
मुश्किल से
पत्थरों पर जिए,
घावों पर
पैबंद सिये,
विवशता में
खून के घूँट पिए,
बस यही
घाव अपने दिल में लिए,
चलते ही रहे हम।
पर
हर एक परिक्रमा
वही लाकर खड़ा कर देती है
जहाँ से सफर शुरू किया था।
फिर नया सफर
नए आशियाँ की तलाश में
तिनके-तिनके समेटे किसी पेड़ पर
नया आशियाँ बनाना है
सफर अभी बाकी है
औ' फिर चलते ही जाना है.
मंजिल का पता नहीं।
चलना ही नियति है
चलते ही जाना है.
Monday, December 22, 2008
कामना!
नव वर्ष
नव मुकुलित
कलियों सा
खिलने को तैयार।
इससे पहले
विधाता तू इतना
कर दे --
सद्बुद्धि, सद्चित्त , सद्भावना
उन्हें दे दे,
जिन्हें इसकी जरूरत है।
जिससे
कोई भी दिन नव वर्ष का
रक्त रंजित न हो
मानव की मानव से ही
कोई रंजिश न हो,
भय न छलके आंखों में
मन में कोई शंकित न हो,
एक दीप
ऐसा दिखा दो
जिसके प्रकाश में
मन कोई कलुषित न हो,
नव प्रात का रवि
ऐसा उजाला करे
हर कोना सद्भाव से पूरित हो
सब चाहे, सोचें तो
बस खिलते चमन की सोचें
शान्ति, प्यार और अमन की सोचें,
पहली किरण के साथ
फूटे गीत मधुर
जीव , जगत, जगदीश्वर
सबके लिए नमन की सोचें।
नव वर्ष सबको शत शत शुभ हो।
नव मुकुलित
कलियों सा
खिलने को तैयार।
इससे पहले
विधाता तू इतना
कर दे --
सद्बुद्धि, सद्चित्त , सद्भावना
उन्हें दे दे,
जिन्हें इसकी जरूरत है।
जिससे
कोई भी दिन नव वर्ष का
रक्त रंजित न हो
मानव की मानव से ही
कोई रंजिश न हो,
भय न छलके आंखों में
मन में कोई शंकित न हो,
एक दीप
ऐसा दिखा दो
जिसके प्रकाश में
मन कोई कलुषित न हो,
नव प्रात का रवि
ऐसा उजाला करे
हर कोना सद्भाव से पूरित हो
सब चाहे, सोचें तो
बस खिलते चमन की सोचें
शान्ति, प्यार और अमन की सोचें,
पहली किरण के साथ
फूटे गीत मधुर
जीव , जगत, जगदीश्वर
सबके लिए नमन की सोचें।
नव वर्ष सबको शत शत शुभ हो।
विडंबना
आज अकेले, बीमार, बेवश
चुपचाप पड़ी पर
छत पर लटके पंखे
के हर कोने को देख रही है।
सारी बत्तियां
बुझ चुकी है कब की,
अब तो बंद हो चुकी है,
रसोई में बर्तनों की
खनक भी ,
वह भूखी
शायद कोई पूछे
खाना लाये,
पर यह क्या?
रात गहराती गई
वह भूखे पेट
करवटें बदलती रही
जिन्हें कभी
उठाकर, जगाकर खिलाया था
ख़ुद न सोकर
उनको सुलाया था
वे ख़ुद खाकर
सबको खाया समझने लगे
सब भूल गए।
वे जो भूखे
रहकर भी
उनको माफ कर गए,
एक लीक बना गए।
हम जनक जननी हैं,
क्षमा बडन को चाहिए.....
वाह री
विडम्बना
क्या सारी
मानवता
मेरे ही हिस्से में आई
ख़ुद माफ करो
दुआ दो
यह किस शास्त्र में
लिखा है।
जब वे बदल गए,
तो हम ही क्यों,
उस लीक को पीटते रहें।
बद्दुआ तो नहीं
पर अब दुआ भी तो
निकलती नहीं।
पेट की ज्वाला में
सब कुछ जल जाता है।
बस शून्य और' एक शून्य ही रह जाता है.
चुपचाप पड़ी पर
छत पर लटके पंखे
के हर कोने को देख रही है।
सारी बत्तियां
बुझ चुकी है कब की,
अब तो बंद हो चुकी है,
रसोई में बर्तनों की
खनक भी ,
वह भूखी
शायद कोई पूछे
खाना लाये,
पर यह क्या?
रात गहराती गई
वह भूखे पेट
करवटें बदलती रही
जिन्हें कभी
उठाकर, जगाकर खिलाया था
ख़ुद न सोकर
उनको सुलाया था
वे ख़ुद खाकर
सबको खाया समझने लगे
सब भूल गए।
वे जो भूखे
रहकर भी
उनको माफ कर गए,
एक लीक बना गए।
हम जनक जननी हैं,
क्षमा बडन को चाहिए.....
वाह री
विडम्बना
क्या सारी
मानवता
मेरे ही हिस्से में आई
ख़ुद माफ करो
दुआ दो
यह किस शास्त्र में
लिखा है।
जब वे बदल गए,
तो हम ही क्यों,
उस लीक को पीटते रहें।
बद्दुआ तो नहीं
पर अब दुआ भी तो
निकलती नहीं।
पेट की ज्वाला में
सब कुछ जल जाता है।
बस शून्य और' एक शून्य ही रह जाता है.
Tuesday, December 2, 2008
प्रार्थना जो सुन ली गई!
*मैंने भगवान् से माँगी शक्ति
उसने मुझे दी कठिनाइयाँ
हिम्मत बढ़ाने के लिए।
*मैंने भगवान् से माँगी बुद्धि
उसने मुझे दी उलझनें
सुलझाने के लिए।
*मैंने भगवान् से माँगी समृद्धि
उसने मुझे दी समझ
काम करने के लिए।
*मैंने भगवान् से माँगा प्यार
उसने मुझे दिए दुखी लोग
प्यार करने के लिए।
*मैंने भगवान् से माँगी हिम्मत
उसने मुझे दीं परेशानियाँ
उबर पाने के लिए।
*मैंने भगवान् से माँगा वरदान
उसने मुझे दिए अवसर
उन्हें पाने के लिए।
*वो मुझे नहीं मिला , जो मैंने माँगा था,
उसने मुझे वह दिया, जो मुझे चाहिए था।
***यह पंक्तियाँ मेरी बेटी ने किसी मन्दिर में देखि थीं और वहां से लाकर मुझे दी। देखिये कितनी अच्छी और अर्थपूर्ण पंक्तियाँ है। इनको आप दूसरों तक पहुंचिए। आज सोचा इनकी जगह यही सही है।
उसने मुझे दी कठिनाइयाँ
हिम्मत बढ़ाने के लिए।
*मैंने भगवान् से माँगी बुद्धि
उसने मुझे दी उलझनें
सुलझाने के लिए।
*मैंने भगवान् से माँगी समृद्धि
उसने मुझे दी समझ
काम करने के लिए।
*मैंने भगवान् से माँगा प्यार
उसने मुझे दिए दुखी लोग
प्यार करने के लिए।
*मैंने भगवान् से माँगी हिम्मत
उसने मुझे दीं परेशानियाँ
उबर पाने के लिए।
*मैंने भगवान् से माँगा वरदान
उसने मुझे दिए अवसर
उन्हें पाने के लिए।
*वो मुझे नहीं मिला , जो मैंने माँगा था,
उसने मुझे वह दिया, जो मुझे चाहिए था।
***यह पंक्तियाँ मेरी बेटी ने किसी मन्दिर में देखि थीं और वहां से लाकर मुझे दी। देखिये कितनी अच्छी और अर्थपूर्ण पंक्तियाँ है। इनको आप दूसरों तक पहुंचिए। आज सोचा इनकी जगह यही सही है।
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