गुरुवार, 12 सितंबर 2019

मौत !

मौत !

वो इतनी करीब खड़ी है ,
नहीं देख पाते हैं अपने ,
जिंदगी की उम्मीद में
जलाये आशा का दिया
झंझावातों से बचाने को
आस्था की ओट लगाये बैठे है ।
जिसे वह दिख रही है ,
शायद श्वान नेत्रों से
चुपचाप खड़े हैं,
"चिंता मत करो, सब ठीक हो जायेगा।"
दिलासा की एक मोमबत्ती पकड़ा कर
एक एक कर चलने लगते हैं ।
वह खुद उहापोह में
समझ नहीं पाता है कि
क्या चल रहा है ?
कल होगा या नहीं ,
सोचने में परेशान है
क्योंकि जिंदगी ने अपना तंबू
समेटना शुरू कर दिया है ।

शनिवार, 24 अगस्त 2019

बात मित्रों की !



जब पलटती हूँ 
अतीत के पन्नों को
कुछ लम्हे, कुछ बातें,
जेहन में बसी हैं आज भी ,
कुछ तस्वीरें चस्पा हैं मित्रों की ।

एक उदासी भी
चुरा लेती थी हँसी सबकी, 
नजरें तो लगी होती है चेहरे पर  
उदासी का सबब जानने को
बात कुछ और थी ऐसे  मित्रों की ।

ऐसे ही इस दिन
सारे मुस्कुराते हुए चेहरे  
कहीं भी हों, सामने होते हैं,
कभी वीडियो पर , कभी पन्नों पर
यही तो फितरत होती है मित्रों की ।

हर रिश्ते से बड़ा,
हर दुख सुख में साथ खड़े,
हाथ थाम लेते हैं अपनों से
दुनिया बदले, नहीं बदलती है ,
इस जीवन में फितरत मित्रों की ।

रविवार, 21 जुलाई 2019

एक प्याली चाय !

औरत की इज्जत
एक चाय की प्याली हो गयी
जिसे
जिसने पिया - तो
अकेले नहीं दोस्तों के संग
क्या ये अब
लत बन चुकी है।
जो इंसान के जमीर में
शामिल नहीं है  -
औरत की इज्जत करना।
और समाज उसे
कितनी जलालत भरी
नजर से देखती है,
घुट घुट कर जीने के लिए
मजबूर होती है,
क्योंकि
उस पीड़ा का अहसास 
इस समाज ने
कभी किया ही नहीं होता है ,
उसकी नजर में
इज्जत तो सिर्फ
औरत की ही होती है
और
पुरुष के लिए
एक प्याली चाय है।

शनिवार, 20 जुलाई 2019

रिश्तों की संजीवनी !

रिश्ते हैं
एक पौध
पलते है जो
दिल की माटी में,
प्यार का पानी दें,
हवा तो दिल देता है
फिर देखो कैसे ?
हरे भरे होकर वे
जीवन महका देंगे।

अकेले और सिर्फ
अपनों की खातिर
अपने सुख की खातिर
जीना बहुत आसान है ,
सोच बदलो
औरों के लिए भी
जीकर देखो तो सही
बहुत  कुछ  सिखा देंगे . .।

पानी किसी भी पौध में दें
जरूरी नहीं कि
अपनी ही बगिया का  हो ,
फूल  खिलेंगे और  महकेंगे
खुशबू बिखरेगी,
बिना भेद के होता कैसे
गैरों  से प्यार दिखा देंगे .

इतना छोटा नहीं
इंसान से इंसान का रिश्ता
चीरो जिगर को
सबमें बस वही सब होगा
देख कर जान लेना
फर्क  है दिल और जिस्म में
धर्म , जाति , गरीब और अमीर के अंतर पर
इस सोच को पल में मिटा देंगे।

एक हैं सब धरती पर
एक से जज्बात हैं ,
अगर सीखने का जज्बा है
जानने की मर्जी है तो -
कोशिश करें
इंसान से इंसान को
जोड़ने की शिद्दत से ,
वे उस प्यार की
ऐसी इबारत लिखा देंगे .

मंगलवार, 18 जून 2019

आह्वान !

जब जब बढ़े अधर्म धरा पर,
धैर्य धर संयत तो रहना होगा,
मन से स्मरण  कर शक्ति का,
              मन की दुर्बलताओं को हरना होगा।
             तुम्हें आह्वान शक्ति का करना होगा ।

वो शक्ति स्वरूपा दुर्गा हो ,
काली हो या विकराली हो,
चामुण्डा शक्ति बगलामुखी,
            तुम्हें निर्भयता मन में भरना होगा।
             तुम्हें आह्वान शक्ति का करना होगा ।

रावण , दुर्योधन से भी अधम ,
स्वर्ण मृग से घूमते मारीच सदा,
अस्तित्व मनुज का है खतरे में,
          नया व्यूह साहस का रचना होगा ।
           तुम्हें आह्वान शक्ति का करना होगा ।

वो फैले हर दिशा के मोड़ पर,
तांडव सा कर रहे हैं हिंसा का ,
युग युग से पुजती है धरणी पर,
           जग में निर्भय बन साँसें भरना होगा।
           तुम्हें आह्वान शक्ति का करना होगा ।

संकल्प उठाओ युवा शक्ति ,
तुम निर्बल नहीं सबल बनो,
हुंकार शक्ति जब भरती है ,
           युगों - युगों   तक उन्हें डरना होगा ।
           तुम्हें आह्वान शक्ति का करना होगा ।

तुम ही शक्ति , समर्पण हो तुम,
धैर्य , ममत्व और करूणा हो तुम,
समय भाँप लो  वैसा ही रूप धरो ।
        तुम्हें खड्गधारिणी भी बनना होगा ।
        तुम्हें आह्वान शक्ति का करना होगा ।

शुक्रवार, 14 जून 2019

उसकी कहानी !

जन्मी कल थी,
उतर गोद से माँ की,
नन्हें नन्हें कदमों से
अभी अभी चलना सीखा ।
अँगुली माँ की छोड़
अभी तक न चलना आया था ।
सुनती शोर दूर तो
दौड़ छिप जाती
माँ के आँचल में ,
अभी नहीं आया था,
आँगन पार करना भी ,
हाथ पकड़ कर बाबा का,
करती थी पार गली में ।
नहीं जानती कौन है अपना
कौन पराया मानुष में ।
उन दानव सम मानुष ने
हर लिया मुझे
और कर दिया टुकड़े टुकड़े ।
मिले नहीं
वो बिखरे बिखरे ।
कहाँ गये ?
खोजे तो कोई ,
मैं ऊपर बैठी बुला रही
 माँ बाबा को,
वो नीचे चीख चीख कर
 पुकार रहे हैं मुझको ।
बस इतने दिन जीने दिया दरिंदों ने
माँ कैसे समझाऊँ तुमको
मैं पीड़ा अपने तन मन की ।
शायद इतनी ही कहानी थी मेरे जीवन की ।

बुधवार, 30 जनवरी 2019

आंधियां !

आंधियां चल रहीं थी कशमकश की,
हम खड़े खड़े तय कर सके मंजिलें

एक एक कर गुजर गए सब अपने ,
हम इन्तजार में देखते रहे काफिले

 अपने  से कोई सपना भी  मिला सका
चलते चलते ख़त्म हो गए  ये सिलसिले।

इन्तजार कहाँ तक करें कुछ भी पाने का?
बीच में ही ले उड़े मेरे सपनों को दिल जले।

आज भी आँखें  खोजती है कुछ अपनों को,
जिन्हें ले गए अनचाहे वक़्त के जलजले।





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