सोमवार, 20 जुलाई 2020

दर्द हवेली का !

विरासतें थक जातीं हैं, पीढ़ियों तक चलते चलते,
और फिर ढह जाती हैं, अकेले में पलते पलते ।

हर कोना हवेली का अब भरता है  सिसकियाँ ,
चिराग भी बुझ चुके है , अंधेरों में जलते जलते ।

आत्मा इस हवेली की , भटक रही है बदहवास ,
जाना उसे भी पड़ेगा , अब उम्र के ढलते ढलते ।

उम्र के इस पड़ाव अब , किस तरह बढ़ेंगी साँसें ,
पीढ़ी बदल चुकी हैं ,  हम पुराने हुए गलते गलते ।

 वो बाग महकता था जो फल और फूलों से ,
ठूँठ बने दरख़्त कल के , चुक गये हैं फलते फलते ।

वो वारिस जिनकी किलकारियां , गूँजी थीं मेरे आँगन में ,
छोड़ कर चल दिए हमें , बेगाने  बनकर छलते छलते ।

रविवार, 19 जुलाई 2020

रिश्तों की कहानी !

रिश्ते हैं एक पौध
पलते है जो दिलों में
प्यार का पानी दें,
हवा तो दिल देता है
फिर देखो कैसे ?
हरे भरे होकर वे
जीवन महका देंगे।

अकेले और सिर्फ
अपने  की खातिर
अपने सुख की खातिर
जीना बहुत आसन है ,
सोच बदलो
औरों के लिए भी
जीकर देखो तो वे
बहुत  कुछ  सिखा देंगे . .

पानी किसी भी पौध में दें 
जरूरी नहीं कि
अपनी ही बगिया का  हो ,
फूल  खिलेंगे और  महकेंगे
खुशबू बिखरेगी
बिना भेद के होता कैसे
गैरों  से प्यार दिखा देंगे .

.इतना छोटा नहीं
इंसान से इंसान का रिश्ता
चीरों जिगर को 
सबमें बस वही सब होगा
देख कर जान लेना
फर्क  है दिल और जिस्म में
धर्म , जाति , गरीब और अमीर के
इस सोच को पल में मिटा देंगे .

एक हैं सब धरती पर
एक से जज्बात हैं ,
अगर सीखने का जज्बा है
जानने की मर्जी है तो
इंसान से इंसान को
जोड़ें हम कैसे
वे उस प्यार की 
ऐसी इबारत लिखा देंगे .
2013

शनिवार, 4 जुलाई 2020

शहीदों से ...!

वीरो तुम्हें
कैसे दूँ श्रद्धांजलि !
सीमा पर शहीद होते तो
फ़ख्र होता है ।
अभी तो
गद्दारों ने अपने ही देश में,
अपने अपराधों की फेहरिश्त में
और एक वारदात बढ़ा कर
क्या रुतबा बढ़ाया है ?
आँखे बरसती अगर
तुम्हारे बलिदान में ,
तो अंगारे भरे
दिल से कोसती उनको ,
जो वायस बने
कुछ अपने ही
तुम्हारी मौत के ।
श्रद्धांजलि तब देंगे
जब वे मारे जायेंगे ।

रविवार, 21 जून 2020

जिंदगी रेत सी !

आज
जब मची हाहाकार
और लगता है ,
कि
हर एक जिंदगी
रह गई है
मुट्ठी भर रेत की तरह ।
बंद मुट्ठी में
कितने कण शेष हैं
अब नहीं पता है।
न उम्र , न काल, न साँसें
सब चुक रहीं हैं ,
बेवजह, बेवक़्त, बेतहाशा
हर दुआ, हर दवा मुँह छिपा रही है ।
हर कोई अकेला आया है
और अकेला ही जायेगा ।
आज सच हो गया है -
घर से ले गये अकेले औ'
वहाँ से लिपटे कफ़न में अकेले ही चले गये ।
आखिरी यात्रा में चार कदम भारी थे ।
कोई चल ही न पाया ।
और जाने वाले चले गये ।
पार्थिव के ढेर होंगे और श्मशान छोटे पड़ जायेंगे ,
ऐसा तो नहीं पढ़ा था किसी किताब में।
नयी इबारत लिखी जा रही है ,
कल के लिए इतिहास में
एक नया काल लिख जायेगा
जिसे कोरोना काल कहा जायेगा ।

मंगलवार, 9 जून 2020

गुमनाम !

वो संगतराश
जिसे लोग पत्थर दे जाते थे
कुछ अपने होते थे
और कुछ पराये भी होते।
वह उन्हें तराश कर
ढाल देता एक आकार में,
रास्ते के वे पत्थर मुखर हो उठते ।
आते वे और ले जाते,
किसी ने सजा लिया घर में
और किसी ने भेंट कर दिया ।
किसी ने बैठाकर मंदिर में,
उन्हें टकसाल बना लिया ।
वो जिंदगी भर
उन बेतरतीब पत्थरों को
रूप देता रहा,
आकार देता रहा,
सिर्फ हुनर के लिए,
लेकिन उसका खरीददार कोई न था ।
पत्थर मेरा
तो हकदार भी हम
तुम्हें गढने का शौक था
फिर उस आकृति से क्या ?
कभी सवाल किया -
तो दुत्कार दिया
तुम्हारा हुनर मेरे ही पत्थरों पर निखरा
वर्ना कौन जानता था ?
ये आकृतियाँ भी नहीं
गुमनाम रहो , गुमनाम जिओ ।
ये वो कृतियाँ नहीं ,
जिन पर नाम लिखे जाते है,
जिन्हें गैलरियों में नाम दिए जाते है।
वो हुनर सीख लो
तब आ जाना ,
दाम तब लगायेंगे।
खरीददार तब ही आयेंगे ।

सोमवार, 1 जून 2020

खामोशी !

बेटियों के उदास चेहरे
अच्छे नहीं लगते
माँ के कलेजे में हूक उठती है।
फिर भी
वो खामोशी से सह जाती हैं
पूछने पर
"कुछ नहीं माँ बेकार परेशान रहती हो।
बस थोड़ी सी थकान है।"
वो माँ जो पढ़ लेती है
चेहरे के भाव को
इन दलीलों से संतुष्ट नहीं होती।
वो हँसती , खिलखिलाती ,
कोयल सी आवाज में गाती
तो
ठिठक जाते थे पैर
अब तो गुनगुनाना भी भूल गई ।
जब रखती पाँव मंच पर
रौनक बिखर जाती थी और
एक एक शब्द चुन कर  बनाती थी वो प्रवाह
घोलती रस कानों में
मोह लेती थी मन ।
आज खुद को बंद कर एक कमरे में
माँ से भी मुखर नहीं होती ।
गर मुखर होती तो
वो उदास नजरें अपना मुँह न चुराती ।
वो खामोशी एक माँ को रुलाती ।

सोमवार, 25 मई 2020

ये कैसा अन्याय ?

हे विधाता
ये काल चक्र कैसा है?
धरती और आकाश सभी से तूने मृत्यु रची है।
किसके किसके घर उजड़े हैं?
किसके टूटे है परिवार?
कौन धरा पर तड़प रहा है
कैसा है किसका व्यवहार ?
नहीं दया आती है तुझको
मानव के जीवन पर
कभी गगन से ,
कभी धरा से,
कोई आदि अंत नहीं है
पूरा विश्व जलता अग्नि में
और किसी को ले गया तूफान।
जल ने मारा, अग्नि ने मारा,
कहीं मारता है आकाश,
कहीं धरा ले रही है प्राण,
कहीं महामारी का त्राण ।
भेजी तूने मृत्यु की पाती
किसे मिली है किसे नहीं
फिर भी सब बने काल का ग्रास
हो रहा है जन जीवन का ह्रास ।
कौन रहेगा , कौन बचेगा?
इसका भी है नहीं कोई भान ।
वो भी नहीं रहा सुरक्षित
जो करते रक्षणका काम,
सेवा करने वालों की टूट रही है साँस
ऐसे जग में क्या होगा जीकर
जहाँ मची हो त्राहिमाम ।
कोई आदि और अंत नहीं है
निर्दोषों के प्राण गए हैं ।
दोषी बैठे हैं महलों में,
लिए करोड़ों का वरदान ।
मानव ने मानव के बीच में खींची है लंबी रेखा ।
मिले कभी ना यह मानवता ऐसा कभी न पहले देखा।