सोमवार, 22 दिसंबर 2008

कामना!

नव वर्ष
नव मुकुलित
कलियों सा
खिलने को तैयार।
इससे पहले
विधाता तू इतना
कर दे --
सद्बुद्धि, सद्चित्त , सद्भावना
उन्हें दे दे,
जिन्हें इसकी जरूरत है।
जिससे
कोई भी दिन नव वर्ष का
रक्त रंजित न हो
मानव की मानव से ही
कोई रंजिश न हो,
भय न छलके आंखों में
मन में कोई शंकित न हो,
एक दीप
ऐसा दिखा दो
जिसके प्रकाश में
मन कोई कलुषित न हो,
नव प्रात का रवि
ऐसा उजाला करे
हर कोना सद्भाव से पूरित हो
सब चाहे, सोचें तो
बस खिलते चमन की सोचें
शान्ति, प्यार और अमन की सोचें,
पहली किरण के साथ
फूटे गीत मधुर
जीव , जगत, जगदीश्वर
सबके लिए नमन की सोचें।
नव वर्ष सबको शत शत शुभ हो।

विडंबना

आज अकेले, बीमार, बेवश
चुपचाप पड़ी पर
छत पर लटके पंखे
के हर कोने को देख रही है।
सारी बत्तियां
बुझ चुकी है कब की,
अब तो बंद हो चुकी है,
रसोई में बर्तनों की
खनक भी ,
वह भूखी
शायद कोई पूछे
खाना लाये,
पर यह क्या?
रात गहराती गई
वह भूखे पेट
करवटें बदलती रही
जिन्हें कभी
उठाकर, जगाकर खिलाया था
ख़ुद न सोकर
उनको सुलाया था
वे ख़ुद खाकर
सबको खाया समझने लगे
सब भूल गए।
वे जो भूखे
रहकर भी
उनको माफ कर गए,
एक लीक बना गए।
हम जनक जननी हैं,
क्षमा बडन को चाहिए.....
वाह री
विडम्बना
क्या सारी
मानवता
मेरे ही हिस्से में आई
ख़ुद माफ करो
दुआ दो
यह किस शास्त्र में
लिखा है।
जब वे बदल गए,
तो हम ही क्यों,
उस लीक को पीटते रहें।
बद्दुआ तो नहीं
पर अब दुआ भी तो
निकलती नहीं।
पेट की ज्वाला में
सब कुछ जल जाता है।
बस शून्य और' एक शून्य ही रह जाता है.

मंगलवार, 2 दिसंबर 2008

प्रार्थना जो सुन ली गई!

*मैंने भगवान् से माँगी शक्ति
उसने मुझे दी कठिनाइयाँ
हिम्मत बढ़ाने के लिए।

*मैंने भगवान् से माँगी बुद्धि
उसने मुझे दी उलझनें
सुलझाने के लिए।

*मैंने भगवान् से माँगी समृद्धि
उसने मुझे दी समझ
काम करने के लिए।

*मैंने भगवान् से माँगा प्यार
उसने मुझे दिए दुखी लोग
प्यार करने के लिए।

*मैंने भगवान् से माँगी हिम्मत
उसने मुझे दीं परेशानियाँ
उबर पाने के लिए।

*मैंने भगवान् से माँगा वरदान
उसने मुझे दिए अवसर
उन्हें पाने के लिए।

*वो मुझे नहीं मिला , जो मैंने माँगा था,
उसने मुझे वह दिया, जो मुझे चाहिए था।

***यह पंक्तियाँ मेरी बेटी ने किसी मन्दिर में देखि थीं और वहां से लाकर मुझे दी। देखिये कितनी अच्छी और अर्थपूर्ण पंक्तियाँ है। इनको आप दूसरों तक पहुंचिए। आज सोचा इनकी जगह यही सही है।

गुरुवार, 27 नवंबर 2008

गुमनामी के अँधेरे!

गोली, बारूद और धमाकों
की राजनीति कराने वालो
गुमनाम रहने वालो
कहते हो की हम धर्म के लिए
लड़ रहे हैं ladai।
मत सताओ हमारे वर्ग को
अपने वर्ग का पता तो बताओ
वे कब तुम्हें अपना मानते हैं।
क्यों अपनी कुंठाओं और वहशत को
धर्म और वर्ग का नाम देते हो।
खून के रंग से बता सकते हो
तुम्हारे वर्ग के खून का रंग
कौन सा है?
तुम्हारे धर्म के लोगों
के खून का रंग कैसा है?
तुम्हारी गोलियों से मरे
सिर्फ इंसान होते हैं।
रोते बिलखते परिवार
कोई अपना खोते हैं।
जब देने को कुछ नहीं
तुम्हारे पास उनको
क्यों छीनते हो -- साया उनका
उनकी रोटियों को जुटाने वाला
तुम्हारा क्या बिगड़ा है।
तुम्हारा जो भी धर्म हो
एक तरफ खड़े हो जाओ
खुदा या ईश्वर की दुहाई देने वाले
aavaaz दो
उनको देखना है कि
कितने लोग तुम्हारी जमात में आते हैं।
ये हैवानियत का खेल
इंसानियत को
इस जहाँ से मिटा नहीं सकता है।
खौफ दे सकता है
रुला सकता है
पर किसी के आंसू
पोंछ नहीं सकता है
munh छिपा कर बाहर निकलते हो
नाम तक नहीं है तुम्हारा
दूसरों के इशारे पर
गोली चलने वालो
कभी तुम्हारे भी शिकार होंगे
तुम्हारी ही गोलियों के।
ये धमाके तुम्हारे लिए शगल
घी के दिए जलने सा
जश्न मनाने का दिन
रोटी बिलखती इंसानियत
हिलाकर रख दिया
विश्व के जनमानस को
कहाँ है ये हत्यारे
शायद हममें ही छुपे हैं
वे मानव हो ही नहीं सकते है
सिर्फ हत्यारे हैं
और हत्यारों की कोई जाति नहीं होती
कोई धर्म नहीं होता।

बुधवार, 26 नवंबर 2008

अभिव्यक्ति!

जो कुछ जिया
भावों से लिया
औ' अंकित किया
बंद पृष्ठों की धरोहर
किसने देखी, किसने सुनी।

दिशा मंच की
मुखर अभिव्यक्ति ही
हस्ताक्षर के नाम की
पहचान बन गई,
सबने सुनी सबने पढ़ी।

नहीं पता सराही गई
या फिर आलोचित हुई,
मौन रही या मुखरित हुई
छुआ मर्म या असफल रही
अंतर्वेदना मेरी हर किसी ने सुनी।

औरों की पीड़ा जीकर
शब्दों में ढाल दी
सबसे बाँट ली
कुछ तो दिया उनको ,
कुछ तो लिया उनसे.

धन्य मेरी अभिव्यक्ति हुई
एक प्रश्न बन
मजबूर कर गई मनों को
जो सबने देखी सबने सुनी।

एक अभिव्यक्वी!

सोमवार, 3 नवंबर 2008

अर्थ!

रिश्तों के बदले अर्थों में
अब कौन किसी का होता है।
रिश्ते बेमानी हो जाते हैं,
जब अर्थ पास नहीं होता है।


रिश्ते खंडित होते देखे
जब अर्थ बीच में आता है।
इस पैसे की खातिर ही तो
अपना अपनों को खोता है।


एक निर्बल निर्धन ही तो है,
जो रिश्तों को पानी देता है।
वरना पैसे वालों का तो अब
पैसा ही सब कुछ होता है।


अपनों के प्यार की आस लिए,
कितने चिरनिद्रा में सोते हैं।
क्योंकि पैसे वाले तो अब
दायित्वों को भी पैसे से ही ढोते है.

अभिशाप!

तेज रफ्तार जिंदगी
उस वक़्त ठहर गई
जब क्रमिक धमाकों ने
सबको स्तब्ध कर दिया।
जो जहाँ था
थम गए उसके कदम
कितनों का अन्तिम क्षण बन गया,
चीत्कारों, लाशों, घायलों
औ' रक्तरंजित ज़मीं
सब कुछ देख सुनकर
मानवता चुपचाप रोती रही।
हाय रे! दुर्भाग्य
हम फिर एक बार
उनकी चुनौती सह गए
हम इतने कमजोर तो नहीं
अगर ठान लें
तो जवाब बन सकते है,
थाम लें हाथ उनका
तो इतिहास रच सकते हैं।
इन प्र्लयंकरों की साजिश
नाकाम कर सकते हैं
दृढ़ संकल्प तो लें हम
इरादा तो करें हम
विजय हमारी होगी
विजय हमारी होगी.

रविवार, 26 अक्तूबर 2008

एक ऐसा ही दीप जलाओ!

परमार्थ में जीवन को ही मिटा दे,
दीप सा दधिची दूसरा हुआ कहाँ?
वह तो जलकर भस्म हुआ है,
हर मन में अभी उजाला कहाँ?

दीपक बन जल जाऊं मैं,
गर कलुषित मन धुल जाएँ,
तड़प सुनें सूने मन-आँगन की,
बस दिल उनके हिल जाएँ।

कितने घरों में सिमटा अँधेरा,
कल ही दीपक बुझा है घर का,
किसी का कुछ न बिगाडा था,
बस चैन खोजने चला था घर का।

अब तो मनुज बन जाओ सब,
जलने दो बाती दीपों में,
बूढी आँखों का नूर बचाओ,
बच्चों की मुस्कान बचाओ .

इस दीवाली में हर घर में ,
एक सद्भावना का दीप जलाओ,
सुख-शान्ति की कामना हो जिसमें ,
विश्व शान्ति की अलख जलाओ।

हर घर रोशन हो जगमग,
मन में भी उल्लास भरा हो,
वह दीप एक हो या माला हो।
बस रोशन घर का हर आला हो।

अब की ऐसी दीवाली मनाओ
खुशहाल हर घर को बनाओ!

बुधवार, 22 अक्तूबर 2008

आधार

जीने के लिए
एक ठोस धरातल चाहिए
रेत के ढेर पर
सजे जीवन के महलों को
क्या कहा जा सकता है।
रात के अंधेरे में
न जाने कब और कहाँ
ढह जाएँ अनजाने से
संशय की स्थिति में
जीते हुए वर्षों गुजर गए।
पलक मूंदते ही
ढहने के भयावह सपने
तैरने लगते हैं,
कहीं दूर बहुत दूर
धरा की तलाश में
चलते चलते थक गए
न कहीं छाँव , न दरख्त और न छतें
छाले फूटने लगे पाँवों के
पाँव भी सवाल करने लगे
मुझसे ही
कहाँ तलक चलना है
बेसबब, बेसहारा
ख़ुद अपना सहारा क्यों नहीं
बनती है
हम साथ हैं न,
पैर की धमक से रेत भी
चट्टान बन सकती है,
इरादे हों बुलंद तो
समंदर में भी
आग जल सकती है

शनिवार, 18 अक्तूबर 2008

शब्द!

इन शब्दों ने
सारे जहाँ को
अपने से बाँध रखा है।
रोते हुए अंतर
को सहला कर
कहीं वही मरहम बन-
शीतलता का दे अहसास,
शांत हो मन
सब कुछ भूल
आशा से निहार
कष्ट भूल जाता है.
और कहीं
कहीं शब्दों को पीड़ा
बेध जाती है अंतर को,
बरछे की धार सा आघात
लहूलुहान कर जाता है
मन को,
किस किस को देखाए
उन घावों को
उन नामों की फेहरिस्त
जिन्होंने छेदा है,
मेरे मन को.

सलाह

मेरे एक कवि मित्र बोले,
ये स्थापित कवि है
इनकी संगति में रहें
आप भी स्थापित हो जाएँगी
मैं असमंजस में
ये स्थापन किसका
मेरा या कलम का
हाथ जोड़कर क्षमा मांगी,
धन्यवाद! बंधुवर
मैं यायावर ही भली
ठहराव बाँध देता है,
यायावरी में विविध दर्शन तो है
फिर लेखन होना ही
अपने में एक स्थापन ही तो है.

मंगलवार, 14 अक्तूबर 2008

बेचारी

वह बेचारी
आंसुओं के सैलाब्में
उम्र भर
डूबती-तिरती रही
साँस मिलती रही
जीने के लिए जरूरी थी।
खोजती रही
किनारा
जहाँ सुस्ता ले जी भर
रह-रह कर वही त्रासदी
पीछे लगी रहती है
वह भी
सिसक सिसक कर
जीती मरती रहती है।
अचानक एक दिन
किनारे लग गई
छोड़ दिया उसने
सब कुछ बीच में ही
पर यह क्या,
किनारे आकर उसने
तोड़ दिया दम
सैलाब से बाहर
जीना उसे आता ही कहाँ था,
प्यासी मछली सा जीवन वहाँ था
सो चल दी
पूरी दुनिया को
अलविदा करके.

अभिलाषा

बहुत चाह की
लिखना छोड़ दूँ,
और आज से ही
इस कलम को
तोड़ दूँ,
पर
जब भी कोई भोगा हुआ यथार्थ
कर गया अन्तर पर आघात
आंसू की स्याही बन
भावों के हस्ताक्षर
खुदबखुद
कोरे कागज़ पर
दर्ज हो गए.

लावारिस - बावारिस

सुबह का अखबार
जब हाथ में आया
नजर पड़ी
एक तस्वीर पर
फिर उसका शीर्षक पढ़ा
सड़क पर फ़ेंक दिया
किसी सपूत ने
अपने अपाहिज और मृतप्राय पिता को,
उसने पाला होगा
बेटे बेटियों को
एक या दो होंगे
हो सकता है कि चार या पाँच हों।
सबको पाला होगा
हाथ से निवाला बनाकर खिलाया होगा
दुलराया और सहलाया होगा
फिर काबिल बनाकर
चैन कि साँस ली होगी
बुढापे कि लकड़ी
सहारे के लिए तैयार हो गई
पर पता नहीं कहाँ भूल हुई
लकड़ी बिच में ही चटक गई
औ' मृतप्राय जनक को सड़क पर पटक गई,
सड़क पर पड़े पड़े
दम तोड़ दी।
लोगों ने झाँका औ' किनारा कर लिया
शाम होने लगी
पुलिस आई औ' मृत्यु प्रमाण-पत्र बनवाकर
मुर्दाघर में लावारिशों में शामिल कर दिया,
लावारिस बना
दो दिन पड़ा रहा शव
बाद में लावारिस ही दफना दिया
पढ़कर यह दर्द कथा
दो ऑंसू टप-टप
गिरे अखबार पर
अनाम श्रद्धांजलि थी
या भविष्य में होनेवाली आशंका का भय
यह तो तय करेगा समय
यह तो तय करेगा समय।

सोमवार, 13 अक्तूबर 2008

पूजिता या तिरश्क्रिता

सीता पूजिता
क्यों?
मौन, नीरव, ओठों को सिये
सजल नयनों से
चुपचाप जीती रही।
दुर्गा
शत्रुनाशिनी
क्रोधित, सबला
संहारिणी स्वरूपा
कब सराही गई
नारी हो तो सीता सी
बनी जब दुर्गा
चर्चा का विषय बनी
समाज पचा नहीं पाया
उंगली उठी और उठती रही।
सीता कब चर्चित हुई
प्रशंसनीय , सहनशील
घुट-घुट कर जीने वाली
जब खत्म हो गई,
बेचारी के विशेषण से विभूषित हो
अपना इतिहास दफन कर गई।
समाज पुरूष रचित औ'
नारी जीवन उसकी इच्छा के अधीन,
स्वयं नारी भी
सीता औ' दुर्गा के स्वरूप को
पहचान कर भी
अनजान बनी जीती रहती है
पुरूष छत्रछाया में मंद मंद विष पीती रहती है।

***आई आई टी कानपूर के हिन्दी कविता प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त.

तृषित

बावरे मन
एक नीड़ की खोज में,
कलह भरे अनंताकाश में
क्यों भटकता रहा?
चंद क्षण शान्ति के लिए
छान आया तू
कोना कोना धरती औ' गगन,
अथाह शैवलिनी तू
अंक में समाये
अतृप्त अधर क्यों तेरे रहे?
लिए आस जीवन की
कितने दर देखे तुमने
महज मृगमरीचिका है,
यह सब
क्या हैं रिश्ते , क्या हैं नाते?
दुनिया ख़ुद प्यासी है,
तुझसे भी बदतर है,
चल तेरा पिंजरा बेहतर है।

**प्रकाशित २० नवम्बर १९८० (दैनिक "आज "में )

क्यों?

मेरे मन की खंडित वीणा के,
तारों में स्वर कम्पन क्यों?
स्वर लहरियां मचल रही हैं,
विरह राग की सरगम क्यों?

कुछ मधुर वचन की आशा में ,
मिले कटु औ' तिक्त स्वर क्यों?
टूटती लय कुछ बता रही है,
अंतर्वेदना मन की क्यों?

जग तो था ये मनहर बहुत,
जहर बुझे वचन फिर क्यों?
स्वयं भू की सर्वोत्तम कृति ,
मानव ने खोयी मानवता क्यों?

किसा भुलावे में भटकता मन,
शून्य के आयामों तक क्यों?
मिजराब मचलती तारों पर ,
नीरव हैं फिर सारे स्वर क्यों?

***प्रकाशित १९७८ में.

शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2008

नारी - व्यथा

जीवन जिया,
मंजिलें भी मिली,
एक के बाद एक
बस नहीं मिला तो
समय नहीं मिला।
कुछ ऐसे क्षण खोजती ही रही ,
जो अपने और सिर्फ अपने लिए
जिए होते तो अच्छा होता।
जब समझा अपने को
कुछ बड़े मिले कुछ छोटे मिले
कुछ आदेश और कुछ मनुहार
करती रही सबको खुश ।
दूसरा चरण जिया,
बेटी से बन बहू आई,
झूलती रही, अपना कुछ भी नहीं,
चंद लम्हे भी नहीं जिए
जो अपने सिर्फ अपने होते।
पत्नी, बहू और माँ के विशेषण ने
छीन लिया अपना अस्तित्व, अपने अधिकार
चाहकर न चाहकर जीती रही ,
उन सबके लिए ,
जिनमें मेरा जीवन बसा था।
अपना सुख, खुशी निहित उन्हीं में देखि
थक-हार कर सोचा
कुछ पल अपने लिए
मिले होते
ख़ुद को पहचान तो लेती
कुछ अफसोस से
मुक्त तो होती
जी तो लेती कुछ पल
कहीं दूर प्रकृति के बिच या एकांत में
जहाँ मैं और सिर्फ मैं होती.

शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2008

अंतरीप

रे मन तू अंतरीप बन जा
क्यों डूबा रहता है मन
अंहकार के घोर तिमिर में,
भटक न जाएँ कदम तुम्हारे
जीवन की इस कठिन डगर में ,
शांत, मूक औ' सजग दीप बन जा
रे मन तू अंतरीप बन जा।
भौतिकता के तेज दौड़ का
अनुगामी न होना तू,
पाकर शक्ति धन या जन की
अभिमानी न होना तू,
मोती वाली एक मूक सीप बन जा
रे मन तू अंतरीप बन जा।
सुख हो दुःख हो या हो धूप छाँव
शीतलता हो या बढे उष्णता ,
ज्वार-भाटों के आवेगों में
रखना सदा बनाये दृढ़ता ,
संतापों से दूर सदा शांत द्वीप बन जा
रे मन तू अंतरीप बन जा।
कितना ही सिर मारें लहरें
तूफानों का वेग प्रचंड सहो,
निश्चल, अटल, मध्य सागर के
खड़े सदा ही निर्संवेग रहो,
अंतर के भावों का भी तू महीप बन जा
रे मन तू अंतरीप बन जा.

सोमवार, 29 सितंबर 2008

एक वह भी जमाना था

  • फिल्मी दुनिया बचपन से ही मेरे इतने करीब रही कि ऐसा कभी नहीं लगा कि यह कुछ अलग दुनियाँ है। बचपन से ही छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी ख़बर से वाक़िफ़ रहती थी। मेरे पापा ख़ुद पढ़ने और लिखने के शौकीन थे। उस समय प्रकाशित होने वाली जितनी भी मैगज़ीन थी सब मेरे घर आती थी। चाहे वे साहित्यिक में सारिका, धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, कादम्बिनी हो या फिर फिल्मी में 'सुचित्रा' जो बाद में 'माधुरी के नाम से प्रकाशित हुई। फिल्मी कलियाँ, फिल्मी दुनियाँ, सुषमा यह सब फिल्मों के शौकीनों कि जान हुआ करती थी। उस समय इन मैगजीनों में फिल्मों के दृश्य, फिल्मी दुनियाँ कि हलचल, नई फिल्मों कि शूटिंग के दृश्य, फिल्मी समारोहों के चित्र सब रहते थे और साथ ही रहते थे नई फिल्मों के ड्रामे। जो पूरी कहानी और चित्रों के साथ दिए जाते थे। एक पत्रिका में करीब - ड्रामे हुआ करते थे और उस समय नई फिल्में छोटी जगहों पर तो जल्दी आती नहीं थी सो हम अपना शौक इसी से पूरा कर लिया करते थे। टीवी जैसी कोई चीज उस समय नहीं थी।
  • मेरे छोटे से कस्बे 'उरई ' में उस समय एक ही टाकीज हुआ करती थी, 'कृष्णा टाकीज' और उसके मालिक मेरे पापा के मित्रोंमें से हुआ करते थे। बस नई फिल्म आई नहीं कि गया बुलावा और हम सपरिवार चल देते थे। नई फिल्म के आने कि सूचनाभी उस समय बड़े रोचक ढंग से दी जाती थी। नई फिल्म के बड़े बड़े पोस्टर रिक्शों पर रख कर पूरी बारात कि तरह से बैंडबाजे के साथ निकली जाती थी। एक बंद रिक्शे में टाकीज का कोई आदमी लाउद्स्पीकर लिए बोलता रहता था कि अमुक टाकीज में आज से यह फिल्म गई है और इतने शो में देखने जरूर आइयेगा और उसके बाद उस फिल्म के गाने बजाने लगते थे। कुछ पैदल कर्मी हाथ में फिल्म के परचे लिए उनको बांटे चलते थे और बच्चे उनके पीछे पीछे उनको लेते जाते थे। हम लोग भी अपनी छत पर खड़े होकर यह तमाशा देखने से नहीं चूकते थे।

  • टाकीज में लेडीज क्लास अलग होता था , बालकनी को पार्टीशन करके बनाया गया था और सभी महिलायें उसी में बैठती थीं। हम भी अपनी दादी, माँ और चाची के साथ देखने के लिए जाते थे। फिर लौट कर अपनी सहेलियों को फिल्म कि स्टोरी भीसुनाया करते थे। अपने ग्रुप में सबसे अधिक फिल्म देखने वाले हमीं थे। शुरू में श्री गणेश, सम्पूर्ण रामायण, नाग कन्या, नागमणि , ही अच्छी लगती थी। महिपाल और अनीता गुहा कि आदर्श जोड़ी थी जो कि धार्मिक फिल्मों में दिखाई देती ऐसा नहीं था कि सिर्फ धार्मिक फिल्में ही देखते हों। बचपन कि यादों में कहीं गृहस्थी, गहरा दाग, दिल एक मन्दिर, हमराही, ताजमहल, सूरज, मेरे महबूब जैसी फिल्मों के दृश्य और गाने अभी भी बसे हुए हैं। इस बात से इनकार नहीं कर सकती कि वे कहानी और गीत आज भी लाजवाब है और रहेंगे।
  • फिल्म ' संगम ' का एक वाक़या अभी याद है - मेरे छोटे चाचा कि नई नई शादी हुई थी और हमारी चाची बड़ी शौकीन थी, लेकिन चाचा अकेले चाची को लेकर कैसे चले जाए। उस ज़माने के सभ्यता के खिलाफ था और मैं ही बच्चों में सबसे बड़ी थी और बस हम को लेकर चल देते। पहले से ही सुना था यह पिक्चर बहुत ही गन्दी है। मैं देख कर गई लेकिन मुझे समझ नहीं आया कि इसमें गन्दा क्या था? बहुत बाद में पता चला कि वैजयंतीमाला के नहाने वाला दृश्य ही सबसे गन्दा मन गया था उस समय।

  • साधना कट बाल उस समय बहुत ही लोकप्रिय थे और हमें भी भा गए सो एक दिन कमरा बंद करके अपने हाथ से साधना कट बाल काट लिए , जब बाहर आए तो पड़ी कस कर डांट - मन ही मन सोचा चलो डांट पड़ गई कोई बात नहीं बाल थोड़े ही ठीक हो जायेंगे। जब स्कूल गई तो टीचर ने लगाई डांट - तब लगा कि हाँ जरूर कुछ ग़लत हो गया है। आज अपने बचपने पर ख़ुद ही हँसी आती है।

  • कुछ सालों बाद एक टाकीज और खुल गई 'जयहिंद ' , तब तो और मजे कभी इसमें और कभी उसमें। उस समय मनोज कुमार, राजेंद्र कुमार , मीना कुमारी, माला सिन्हा, शर्मीला मेरे प्रिय कलाकार थे। अब फिल्म पसंद करने का स्तर बदल गया सामाजिक और गंभीर फिल्में मुझे बचपन से ही पसंद थी। उन कलाकारों में अपने को खोजने कि आदत भी आने लगी थी। हम सभी भाई बहन फिल्मों के बारे में चर्चा किया करते थे। भाई साहब हमारे कुछ अधिक जानकारी रखते थे सो हम उनसे जानकारी इकट्ठी करते रहते।

  • बचपन के दायरे से जब निकल कर बाहर आई तो पहली फिल्म मुझे पसंद आई वह थी - 'मेरे हुजूर' और उसका गाना 'गम उठाने के लिए ....' मेरा पहला पसंदीदा गाना था। मैं जीतेन्द्र कि फैन हो गई थी। जो अक्ल आने तक बनी रही। लेकिन उसके बाद फिल्में देखने पर पाबंदी लगा दी गई। फिर शिर्फ अच्छी और कम फिल्में ही देखने के लिए मिलती , मां ने भी बंद कर दीं।शायद यह किशोर लड़कियों कि दृष्टि से ठीक भी था।

  • जब कला फिल्मों का जमाना आया तो काफी समझ चुकी थी। 'अंकुर', 'निशांत', 'भूमिका ', जैसी फिल्मों कि जानकारी सिर्फ पत्रिकाओं से ही मिल पाती थी। छोटी जगह में आती भी नहीं थीं ऐसी फिल्में। मैंने हंसा वाडेकर लिखित 'भूमिका' का मूल उपन्यास भी पढ़ा था। कला फिल्में दिल को छू लेने वाली होती थी। इन फिल्मों को देखने कि हसरत दिल में ही रह गई इसके बाद कि पीढी में 'कभी-कभी', मौसम, आंधी' जैसी फिल्में मुझे बहुत पसंद आई। जो कि मेरी रूचि के अनुरूप थीं। पाबन्दी लगाने के बाद 'रेडियो' और 'पत्रियें' ही मेरा सहारा रह गई थी और उनसे लगता नहीं था कि मैं फिल्म नहीं देखि है। सारा कुछ पता चल जाता था। 'आल इंडिया रेडियो' से इतवार को आने वाले साउंड ट्रेक भी खूब मजा देते थे। रेडियो भी मेरी जान था , पढ़ती थी तो रेडियो बजाकर। जो हमारी दादी को कम ही पसंद आता था। बड़ों के सामने फिल्मी गाना गुनगुनाना भी मना था।

  • मेरे भाई साहब तो इतने शौकीन थे कि उन्होंने 'जानी मेरा नाम' करीब ४० बार देखी और अगर अब भी मिल जाए तो छोड़ते नहीं हैं लड़की होने के नाते अकेले तो कभी घर के बाहर नहीं निकलना होता था सिर्फ कालेज के लिए जा सकते थे। जब कहीं जाओ कोई साथ होना चाहिए। मेरे एक चाचा मेरे से थोड़े से बड़े थे उनकी शादी जल्दी कर दी गई और चाची आई मेरी हीउम्र कि जब पिक्चर जाना हो तो मां से कहती जाना है पापा से पूछो लो और मां पापा से पूछती कि रेखा पिक्चर जाना चाहतीहैं, तो वही सवाल किससे साथ। मां कह देती बहू के साथ जा रही है और इजाजत मिल जाती। भले ही चाची मेरे बराबर थी।लेकिन शादीशुदा होने का मतलब कि कोई जिम्मेदार व्यक्ती साथ जा रहा है। मजे कि बात यह थी कि चाची भी अकेले जा नहीं सकती थीं और चाचा तो बिल्कुल भी शौकीन नहीं थे. इसलिए चाची का सहारा मैं और मेरा सहारा चाची थी। यह थी उस कस्बे कि कहानी।
  • उस घटना को मैं कभी भूल नहीं सकती हूँ, १९७२ में मीनाकुमारी का निधन हो गया और मैंने 'माधुरी' में एक संवेदना पत्र लिखा जो प्रकाशित हुआ और फिर इतना पसंद किया गया कि लेख लिखने के प्रस्ताव आने लगे और मैंने अपना लेख ' फिल्मी दुनियां में नारी कि भूमिका' लिखा और प्रकाशित हुआ लेकिन शुभचिंतकों को कुछ अच्छा नहीं लगा. एक छोटी जगह कि लड़की फिल्मी लेख लिखे , लिहाजा सलाह दी गई कि लिखो मगर दिशा बदल दो और उसके बाद दिशाबदल गई कलम ने अपनी विधा ही बदल दी जो आज तक उसी दिशा में जा रही है।