सोमवार, 22 दिसंबर 2008

विडंबना

आज अकेले, बीमार, बेवश
चुपचाप पड़ी पर
छत पर लटके पंखे
के हर कोने को देख रही है।
सारी बत्तियां
बुझ चुकी है कब की,
अब तो बंद हो चुकी है,
रसोई में बर्तनों की
खनक भी ,
वह भूखी
शायद कोई पूछे
खाना लाये,
पर यह क्या?
रात गहराती गई
वह भूखे पेट
करवटें बदलती रही
जिन्हें कभी
उठाकर, जगाकर खिलाया था
ख़ुद न सोकर
उनको सुलाया था
वे ख़ुद खाकर
सबको खाया समझने लगे
सब भूल गए।
वे जो भूखे
रहकर भी
उनको माफ कर गए,
एक लीक बना गए।
हम जनक जननी हैं,
क्षमा बडन को चाहिए.....
वाह री
विडम्बना
क्या सारी
मानवता
मेरे ही हिस्से में आई
ख़ुद माफ करो
दुआ दो
यह किस शास्त्र में
लिखा है।
जब वे बदल गए,
तो हम ही क्यों,
उस लीक को पीटते रहें।
बद्दुआ तो नहीं
पर अब दुआ भी तो
निकलती नहीं।
पेट की ज्वाला में
सब कुछ जल जाता है।
बस शून्य और' एक शून्य ही रह जाता है.

2 टिप्‍पणियां:

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

मन की अभिव्यक्ति को बहुत ही सुन्दर रूप में ढाला है आपने...
सच्चाई यही है कि जिनके लिये हम जीवन अर्पण कर देते हैं वह उसे माटी समझ कर पैरो तले रौंद देते हैं... बहुत कम लोग इस यतार्थ को समझते हैं और इसके अनुसार कार्य करते हैं

विनय ने कहा…

बहुत ही बढ़िया काव्य

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