बहुत चाह की लिखना छोड़ दूँ, और आज से ही इस कलम को तोड़ दूँ, पर जब भी कोई भोगा हुआ यथार्थ कर गया अन्तर पर आघात आंसू की स्याही बन भावों के हस्ताक्षर खुदबखुद कोरे कागज़ पर दर्ज हो गए.
मैं आई आई टी , कानपूर में मशीन अनुवाद प्रोजेक्ट में कार्य कर रही हूँ. इस दिशा में हिंदी के लिए किये जा रहे प्रयासों से वर्षों से जुड़ी हूँ. लेखन मेरा सबसे प्रिय और पुरानी आदत है. आदर्श और सिद्धांत मुझे सबसे मूल्यवान लगते हैं , इनके साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता है. गलत को सही दिशा का भान कराना मेरी मजबूरी है , वह बात और है कि मानने वाला उसको माने या न माने. सच को लिखने में कलम संकोच नहीं करती.
1 टिप्पणियाँ:
वाह.........बहुत ही सुंदर....संक्षिप्त शब्दों में आपने कितना बड़ा सत्य कह दिया.बहुत बहुत सुंदर.आभार.
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