इन शब्दों ने
सारे जहाँ को
अपने से बाँध रखा है।
रोते हुए अंतर
को सहला कर
कहीं वही मरहम बन-
शीतलता का दे अहसास,
शांत हो मन
सब कुछ भूल
आशा से निहार
कष्ट भूल जाता है.
और कहीं
कहीं शब्दों को पीड़ा
बेध जाती है अंतर को,
बरछे की धार सा आघात
लहूलुहान कर जाता है
मन को,
किस किस को देखाए
उन घावों को
उन नामों की फेहरिस्त
जिन्होंने छेदा है,
मेरे मन को.
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)

6 टिप्पणियाँ:
सत्य कहा आपने.कहा जाता है कि शब्द सात द्वारों से होकर प्रकट होता है और उसे ऐसा नही होना चाहिए कि सुनने वाले का मन दुखे.काश लोग यह समझ पाते.........
ek nivedan hai...ho sake to comment section se word verification hata dijiye.
मन को छू लेने वाली पंक्तियां हैं...बधाई...
बहुत सुंदर
किस किस को देखाए
उन घावों को
उन नामों की फेहरिस्त
जिन्होंने छेदा है,
मेरे मन को.
बहुत सुन्दर पंक्तियाँ लिखी हैं।
बहुत उम्दा!! वाह!
अच्छा लिखा हैं आपने . शुभकामनाये !
एक टिप्पणी भेजें