शनिवार, 18 अक्तूबर 2008

शब्द!

इन शब्दों ने
सारे जहाँ को
अपने से बाँध रखा है।
रोते हुए अंतर
को सहला कर
कहीं वही मरहम बन-
शीतलता का दे अहसास,
शांत हो मन
सब कुछ भूल
आशा से निहार
कष्ट भूल जाता है.
और कहीं
कहीं शब्दों को पीड़ा
बेध जाती है अंतर को,
बरछे की धार सा आघात
लहूलुहान कर जाता है
मन को,
किस किस को देखाए
उन घावों को
उन नामों की फेहरिस्त
जिन्होंने छेदा है,
मेरे मन को.

6 टिप्‍पणियां:

रंजना ने कहा…

सत्य कहा आपने.कहा जाता है कि शब्द सात द्वारों से होकर प्रकट होता है और उसे ऐसा नही होना चाहिए कि सुनने वाले का मन दुखे.काश लोग यह समझ पाते.........

ek nivedan hai...ho sake to comment section se word verification hata dijiye.

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

मन को छू लेने वाली पंक्तियां हैं...बधाई...

sumansourabh ने कहा…

बहुत सुंदर

विनय ने कहा…

किस किस को देखाए
उन घावों को
उन नामों की फेहरिस्त
जिन्होंने छेदा है,
मेरे मन को.

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ लिखी हैं।

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत उम्दा!! वाह!

Radhika Budhkar ने कहा…

अच्छा लिखा हैं आपने . शुभकामनाये !