सोमवार, 3 नवंबर 2008

अभिशाप!

तेज रफ्तार जिंदगी
उस वक़्त ठहर गई
जब क्रमिक धमाकों ने
सबको स्तब्ध कर दिया।
जो जहाँ था
थम गए उसके कदम
कितनों का अन्तिम क्षण बन गया,
चीत्कारों, लाशों, घायलों
औ' रक्तरंजित ज़मीं
सब कुछ देख सुनकर
मानवता चुपचाप रोती रही।
हाय रे! दुर्भाग्य
हम फिर एक बार
उनकी चुनौती सह गए
हम इतने कमजोर तो नहीं
अगर ठान लें
तो जवाब बन सकते है,
थाम लें हाथ उनका
तो इतिहास रच सकते हैं।
इन प्र्लयंकरों की साजिश
नाकाम कर सकते हैं
दृढ़ संकल्प तो लें हम
इरादा तो करें हम
विजय हमारी होगी
विजय हमारी होगी.

3 टिप्‍पणियां:

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

बहुत ख़ूब...

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

सुंदर भाव लिखे हैं आपने

रंजना ने कहा…

sahi kaha......