सोमवार, 30 जुलाई 2012

कोई हक नहीं !

सम्मान न भी दे सको 
तो अपमान तो न करो,
इंसान के भावों को 
आहत मत करो।
क्या हक है हमें?
किसी को लानत मलानत करने का,
हमने इससे पहले 
कुछ दिया था उसको 
अगर नहीं 
तो फिर 
आरोप -प्रत्यारोपों का भी हक नहीं।
दूसरे के घर की आग से 
हाथ सेंक लेना 
बहुत आसन है 
जलता है अपना घर 
तो पानी पानी चिल्लाते हैं .
वो तुम्हारा कोई भी न सही 
किसी का पिता, भाई और बेटा 
न सही 
पर इंसान तो है,
वैसे हम उनके कोई नहीं 
लेकिन  उनके चादर के छेद 
चश्मा लगा कर देखते हैं 
हमें कोई हक नहीं 
किसी के घर में झांकने का।
इसलिए खुद पर 
संयम रखो,
अगर साक्षी हो किसी बात के 
तब ही हकदार हो 
अगर नहीं तो फिर
आग मत उगलो .
शांत रहो और शांति बनाये रखो।
 



शनिवार, 28 जुलाई 2012

वो पल !

वो पल मेरे थे,
जिए भी मैंने  ही 
लेकिन 
वो समर्पित थे 
किसी अनजान के लिए 
 कोई रिश्ता नहीं था 
बस इंसानियत का रिश्ता 
देखते रहने का रिश्ता 
फिर उसकी मौत का अहसास 
हिला ही तो गया 
उस हादसे का शिकार देख 
अंतर तक काँप गया।
तप करने लगी 
विनती ईश्वर  से 
वापस कर दो 
वो किसी घर का चिराग है 
किसी माँ  का लाल 
औ 
किसी के मुंह का निवाला है 
किसी का भाई भी होगा 
उसे जीवन दो प्रभु 
चाहे कुछ दिन मेरे जीवन से 
लेकर उसको दे देना। 
उसे जीवन दे देना।
उसे जीवन दे देना।

बुधवार, 25 जुलाई 2012

मत कीजिये !

रास्ते के पत्थर को अनदेखा न कीजिये 
ऐसा न हो की उससे ठोकर लगे कभी।

घर में बैठे दुश्मन पर भरोसा न कीजिए,
ऐसा न हो की पीछे से वो वार करे कभी।

झूठी तारीफ करने का कभी मौका न  दीजिए, 
ऐसा न हो कि  दुश्मनों का निशाना बने कभी।

भरोसा भी  जिन्दगी में कभी ख़त्म न कीजिये,
किस पल किस्मत बदले औ सिकंदर बने कभी। 

खुद पे हंसने वालों को कभी निराश न कीजिये,
उनकी हंसी बने जोश और शुक्रिया करे कभी।

इंसान हो तो किसी से भी नफरत न  कीजिये,
बसता है खुदा उन्हीं  में मिल जाएगा कभी।
,

मंगलवार, 24 जुलाई 2012

हाइकू !

आशा का दीप 
जलने जा रहा है 
प्रतीक्षा करो 
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मशाल जली 
दो हाथों से थाम लो 
सफल होगे।
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 उदास  गीत 
सिसकती ग़ज़ल 
क्या गायें हम ?
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मनन कर 
मौन आत्मा से माँग 
अच्छा मिलेगा।
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देवता क्यों  
इंसान ही रहो न 
बहुत होगा। 
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जननी होना 
अभिशाप बना है 
सड़क मिली। 
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पत्नी रहते 
छत होती ऊपर 
अपना घर। 
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माँ बन कर 
अभिशप्त हो गयी 
घर न द्वार . 
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विश्वास टूटा 
बिखर गए हम 
अकेले अब 
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शनिवार, 21 जुलाई 2012

हाइकू !

 शिक्षा व्यापार
शिक्षण उगाही है
भविष्य काला .
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नील  गगन
शांत श्वेत  चाँद है
भू ज्वलित सी .
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नेता  हो  तुम
बहको मत आज
कल कैसा हो?
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वादे ही वादे
ढोल हों या ताशे
भूल जाओगे।
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रात अँधेरी
दिन भी काला काला
ख़ुशी कहाँ हो?
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बेटी जन्मी है 
बुझा दो सारे दिये 
रौशनी होगी।
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सड़क पर 
माँ बाप रहेंगे ही 
दिल तंग है।
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मंगलवार, 17 जुलाई 2012

हाइकू !

 **** मन बड़ा विच्छिन्न घट रही अमानुषिक घटनाओं से ,  ये कुछ हाइकू उसी विक्षोभ का प्रतिफल हैं. 




खिलौना नहीं 
धधकती आग है 
जल जाओगे। 
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मत सताओ 
कहीं सब्र न टूटे 
विस्फोट न हो।
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अरे मानव 
कुछ तो  ऐसा करो 
अमन रहे। 
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जब मौन हों 
भीष्म जैसे ज्ञानी भी 
न्याय  कैसे हो? 
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 रावण नहीं 
दुशासन है अब 
मर्यादा कहाँ ?
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 सखी   तुम्हारी 
सिसक रही जो  है  
किसना  आओ .
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अंतरिक्ष में  
जो बेटी गयी है वो 
औरों जैसी है। 
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अपराध है 
बेटियों का सौदा 
फाँसी दी जाय .
********
बस भी करो 
कहीं विवश न हों 
नाश के लिए .
*********

   

शनिवार, 14 जुलाई 2012

मौन और मौन !

मौन 
कर   जाता है 
अनर्थ 
सच सच   होकर भी 
मौन की गहराई में 
खामोश रह जाता है .
बात  अर्थ खो देती है 
सच का सफेद आवरण 
मौन के अँधेरे से 
धूमिल सा हो जाता है। 
भ्रम 
सच और झूठ के  बीच 
 इस तरह फैल जाता है 
कि 
सच को  अलग नहीं हो सकता ,
फिर  सब 
जो असत्य आरोपों के 
दावेदार  हैं  
जीत जाते  हैं।
ऐसा मौन या मर्यादा 
नीतिपरक नहीं 
या तो 
भयग्रस्त हैं 
या किसी 
अहसान का बदला 
लेकिन 
इस  जगह का मौन 
अगर तुम्हें ही  
दोषी बना दे  तो  
खोने  वाले भी तुम ही हो 
और पाने  (आरोप)  वाले भी तुम 
अगर मुंह नहीं खोल सकते हो 
तो मौन और मौन 
तुम्हारी  नियति है 
और  
आरोपों को मौन के साथ  ही 
जीते रहो ,
जलते रहो।

  

शुक्रवार, 13 जुलाई 2012

हाईकू !

शांत आँखों  में 
छलकते हैं राज 
 पढ़े तो कोई .
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दीप  जले हैं 
प्रकाश खो गया  है 
खोजे तो कोई।
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 सीता वो नहीं 
 अब दुर्गा  हो गयी  
 बच  के रहो .
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वो अबला है 
गलतफहमी है
चंडी भी तो हैं।
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 गंगा शांत है 
प्रलय आ जाएगी 
क्रुद्ध हुई तो। 
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 कम न आंको  
संहारिणी भी है वो
शांत ही रहे 
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गुरुवार, 5 जुलाई 2012

हाइकू !

मंजिलें दिखी
आग का  दरिया है
आ  पार करें।
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 देश के नेता
बरसाती  मेंढक 
बराबर हैं .
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सफेद कुर्ता
राजनैतिक वेश
 काला अतीत  .
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युवा चेहरे
कसकर पकड़ो
बागी बना दो .
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देश का मंत्र
अतिथि देवो भाव
आतंकी .बनो .
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फांसी  उन्हें दो
जो बेगुनाह हैं
वे अतिथि हैं।
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आशा की ज्योति
जो मन में जली है
 जलती रहे।
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 हवा के झोंके
 थक के  हार  गए
 अखंड लौ से .
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 ऑनर कहाँ
 किलिंग तो जुर्म है
  खोया भी है।
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सोच  हमारी 
कभी  बदलेगी  भी
बेटी - बेटे की ।
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बुधवार, 4 जुलाई 2012

नारी है ना - री !

नारी कीर्तिमान 
बना रही है,
धरती से आकाश तक 
बुलंदियों के परचम 
फहरा रही है।
जयजयकार भी 
सब जगह  पा  रही है।
लेकिन कितनी हैं? 
बस अँगुलियों पर 
गिन सकते हैं।
आज भी 
हाँ आज भी पुरुष 
पत्नी का रिमोट 
अपने हाथ में ही 
रखना चाहता है,
वह गृहिणी हो या हो कामकाजी 
अगर वह(पुरुष)) चाहे तो  
मुंह खोले 
न चाहे तो रहे खामोश 
प्रश्न करने का हक 
तो बस उसी का है ,
जब चाहे दे सकता है 
अपमान के थपेड़े 
जब वो चाहे तो 
करेगी तू समर्पण 
वो तेरा दायित्व है 
और उसका अधिकार।.
कब और किसे  तू जन्म देगी
 ये निश्चित भी तू नहीं
 वह करेगा .
सिर्फ और सिर्फ प्रजनन का 
एक यन्त्र हो तुम .
विरोध अपने प्रति अन्याय का 
ये हक तो पैदा होते ही 
खो दिया था।
नारी को समझो पहले,
हर बात पर ना - री 
पहले ही दिया गया है।
फिर सोचो अपने अस्तित्व को
 फिर उसके लिए 
आने वाली के अस्तित्व को 
बचाना ही .होगा
 खुद अधिकार नहीं मिले 
पर अब उसके लिए तुझे 
दुर्गा बन जाना होगा।
जब तक तू सीता रहेगी,
त्रसित स्वयं औ' उसे भी रखेगी।.
दुर्गा बन संहार न कर
बस अपनी शक्ति से अवगत करा उनको 
अगर विध्वंस पर उतरी तो 
ये सृष्टि रसातल में चली जायेगी 
तब इस ना-री का अर्थ
 सारी  दुनियां समझ जायेगी .
सारी  दुनियां  समझ जायेगी।.

सोमवार, 2 जुलाई 2012

बिखरते रिश्ते !

वो रिश्ते 
जो माँ ने दिए थे,
वो पल 
जो संग संग जिए थे,
 न जाने 
कितने काम मिलकर किये थे .
अब हम बड़े 
और वे हमसे भी बड़े हो लिए  है।
 घर की दीवारें 
जो मिल कर रची थीं,
अब दरकने लगीं हैं 
उन्हें कुछ समेटा 
मैंने इस तरह से 
चेहरे  पे शिकन भी 
आने न दी है।
अब दरारें बढ़ रही हैं,
हाथ छोटे  पड़  गए हैं
 उन्हें छिपाने में.
अब लोगों की निगाहें 
उन पर पड़ने लगी हैं 
सवालों की बौछार सी 
अब मुझ पर होने लगी है।
दंभ मैं ही भरा करता था,
ये घर एक उपवन है,
इसके फूल ऐसे खिलते रहेंगे ,
अब प्रश्नों के व्यूह में 
फंसा रास्ते खोज रहा हूँ।
उनके नहीं बस 
सिर्फ अपने दोषों को छांट  रहा हूँ। 
ऐसा नहीं कि 
सिर्फ मेरा घर दरका है 
लेकिन औरों से 
हमको लेना भी क्या  है?
फिर हम किसको 
सजा दें ?
किस मिटटी गारे से जोड़ें
इन दरकनों को  
दरारों को फिर से 
भरने चले हैं।
वे दीवार ऊँची चाहते हैं,
भूले से भी चेहरे 
कहीं दिख न जाएँ।
निगाहें निहारती हैं चेहरा हमारा 
क्या उत्तर दें ? 
बेटे बटें ये कब चाहा  था उनने 
लेकिन चलन तो 
अब ये ही चला है 
अपना घर संभालो 
ये ही बहुत है 
औरों के घर में न 
अब अपनी आस देखो। 
ये शाखाएं है 
दूर दूर और दूर ही जायेंगी 
उम्मीद इनसे न इतना करो तुम 
शाखें कभी एक होती नहीं है।
शाखें कभी एक होती नहीं है।