मंगलवार, 27 जुलाई 2010

मृग मरीचिका !

मृग मरीचिका सा
बाहर जाने का सुख
रंगीन सपनों की चमक
स्वर्ग सा जीवन
जीने की ललक
उड़ा ले गयी
उसे दूर बहुत दूर
अपनी जमीन से.
फिर दूसरी धरती पर
रखते ही कदम
फँस गए दल दल में
न जमीं अपनी

न आसमां अपना
रोने की आवाज भी
कोई नहीं सुनता.
कोई फरिश्ता ही
बचा ले
तो अपनी जमीन पर
आखिरी बार
सिजदा ही कर लूं.
या खुदा करे
तो फिर अपने वतन की
सरजमीं पर खुद को
कुर्बान ही कर दूं.

10 टिप्‍पणियां:

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बेहतरीन वाह...क्या ज़ज्बा है इस रचना में...लाजवाब...
नीरज

Udan Tashtari ने कहा…

ये तो हमारी कहानी लिख दी इस कविता में जैसे..बहुत उम्दा!

संजय भास्कर ने कहा…

तो अपनी जमीन पर
आखिरी बार
सिजदा ही कर लूं.
या खुदा करे
तो फिर अपने वतन की
सरजमीं पर खुद को
कुर्बान ही कर दूं.


गजब कि पंक्तियाँ हैं ...

बहुत सुंदर रचना.... अंतिम पंक्तियों ने मन मोह लिया...

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

समीर जी,



आपकी स्थिति और है जरा उनके बारे में सोचिये जो भुलावे में आकर घर छोड़ कर चल दिए और वहाँ बंधुआ मजदूर बन लिए गए हैं और न वहाँ से आ पा रहे हैं और न जी पा रहे हैं. इस दर्द को वही जानता है जिसके घर वाले इसे जी रहे हैं.

shikha varshney ने कहा…

हर प्रवासी के दिल कि आवाज़ लिख दी इस बार तो :)

ashish ने कहा…

प्रवासियों का छलकता दर्द , बखूबी पिरोया आपने कविता में.

निर्मला कपिला ने कहा…

प्रवासियों की बेबसी दिल का दर्द -- मार्मिकता से शब्दों मे पिरोया है। अच्छी लगी रचना। शुभकामनायें

rashmi ravija ने कहा…

प्रवासियों के दर्द को बहुत अच्छी तरह समझ कर उकेरा है

महफूज़ अली ने कहा…

बहुत सुंदर रचना......